Monday, 18 November 2019

राम सेंगर के नवगीतों में शिल्पगत प्रयोग


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From: "shiksha guruji" <raja.awasthi52@gmail.com>
Date: 05-Nov-2019 5:11 PM
Subject: राम सेंगर के नवगीतों में शिल्पगत प्रयोग
To: <infotecharush@gmail.com>
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      राम सेंगर के नवगीतों में शिल्पगत प्रयोग
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                    कविता वक्तव्य नहीं होती, कविता सिर्फ विचार या विचारधारा भी नहीं होती, लेकिन, कविता में उसके कथ्य के साथ सगुम्फित  विचार और विचारधारा भाव-धारा के साथ प्रवाहित होते रहते हैं। यह प्रवाह ही कविता में लय और नाद की स्थितियाँ पैदा करता है। किसी भी कथ्य को कविता बन जाने की सामर्थ्य प्रदान करता है। प्रत्येक रचनाकार अपने कथ्य के प्रवाह को एक विशिष्ट लय, भाव-धारा, दिशा और दशा से संम्पृक्त करने के क्रम में ही कविता में कहीं खुद को भी छोड़ता-जोड़ता चलता है। कविता में कवि का होना, उसकी जीवन स्थितियों का होना भी है। इन जीवन स्थितियों के उबड़-खाबड़, बंजर-उपजाऊ क्षेत्रों की उपस्थिति के बीच भी कविता को कविता बनाए रखना ही उसकी कला का वैशिष्ट्य होता है। यह वैशिष्ट्य उसकी कला में, कविता में देखने के लिए, दिखने के लिए कविता में काव्य लक्षणों की उपस्थिति अनिवार्य होती है, ताकि, कविता में कविता ही रहे। कविता के प्रमुख लक्षणों में भी प्रमुख यह है, कि, कविता में कवित्व हो, काव्यत्व हो। काव्यत्व का तात्पर्य  चमत्कारिक भाषा से नहीं, बल्कि, एक अटूट और आवर्ती लय से है। जीवन प्रकृति और उसके व्यापार में एक चक्र है। हर स्थिति, घटना एक अंतराल के बाद स्वयं को दोहराती है, यानी अपने उत्स को बार-बार छूती है। अपने उत्स के पास बार-बार लौटना ही कविता की आवर्ती लय है। कविता, सृष्टि में अपने उत्स के समय से ही इस लय और आवर्ती लय को पकड़ने की कोशिश में लगी हुई है। जब-जब कविता ने अपनी लय को छोड़ा, वह जीवन और जन से से दूर हो गई। कविता के जिस रूप में भी लय होती है, वह जन और जीवन को भी प्रिय होती है। लय का गुण ही है, उसकी प्रकृति ही है, कि उसमें प्रवाह होगा और प्रवाह में अनेकों तरह के जीव-जंतु, विचार, भाव, कंकड़-पत्थर, रेत आदि अपने गंतव्य तक पहुंचने के लिए गतिमान रहते हैं। कविता में यदि लय नहीं है, तो उसके साथ सिर्फ उसका रचनाकार ही बह सकता है, किन्तु यदि है लय है, तो कवि के साथ पाठक और श्रोता भी उसमें बहते ही नहीं, डुबकियाँ भी लगाते हैं। लयात्मक, प्रवाहमयी कविता ही कवि के साथ पढ़ी व गुनगुनाई जा सकती है। गुनगुनाई जाती है।
                    मूल रूप से और पूरी तरह काव्य के तत्वों की उपस्थिति यदि किसी काव्य-रूप में मिलती है, तो वह उसका छांदसिक रूप ही है। आज पारंपरिक छंदों के साथ रचनाकार विशिष्ट प्रयोगधर्मी और छोटे-छोटे छंदों में स्वयं को अभिव्यक्त कर रहा है। यह अभिव्यक्ति विधान बीसवीं सदी के मध्य से ही गीत कवियों में आने लगा था और सदी के उत्तरार्द्ध की ओर आते-आते इसे नवगीत संज्ञा से स्थापना भी मिल गई। नवगीत की अभिव्यक्ति सामर्थ्य नवगीतों को पढ़कर-सुनकर ही जानी जा सकती है। और, इस सामर्थ्य का भरपूर उपयोग जिन नवगीत कवियों ने किया है उनमें राम सेंगर का नाम बहुत महत्वपूर्ण है। डॉक्टर शंभू नाथ सिंह की नवगीत दशक योजना से वे काफी निकट से जुड़े रहे हैं।
                    नवगीतकार राम सेंगर, पूरे नवगीत कविता संसार में कुछ अनूठी कहन व तेवर के कवि हैं।अब तक उनके पाँच नवगीत संग्रह प्रकाशित हुए हैं। यूँ तो नवगीत दशक दो में नवगीत शामिल किए जाने के बाद ही उनकी एक पहचान बन गई थी, किन्तु बाद के दिनों में जिस अनूठे शिल्प विधान को लेकर उनके नवगीत आये, वे अनुपम हैं।
 
  राम सेंगर के नवगीत-संसार पर बात करें, तो जो एक बात पहली नजर में उनकी अपनी पीढ़ी और उनके बाद की पीढ़ियों से उन्हें अलग करती है, काफी हद तक अद्वितीय भी बनाती है, वह है उनका शिल्प-विधान।
                  संसार का प्रत्येक सर्जक, चाहे वह चित्रकार हो, मूर्तिकार हो, वास्तुकार हो या साहित्यकार हो, अपने अनुभव को शिल्प के माध्यम से ही स्थापित करता है। रचनाकार के रचनात्मक अनुभव से ही उसका शिल्प परिष्कृत और परिवर्तित भी होता है। शिल्प के द्वारा ही सर्जक अपने अनुभव को व्यक्त करता है। साहित्यकार अपने साहित्य में संबंधों का ताना-बाना, समाज का बदलता परिवेश, समाज के भीतर पलती-पनपती नई प्रवृत्तियां और उनका संभावित प्रभाव आदि को रूपायित करता है। यह सब करने के लिए उसे निश्चित शिल्प का आश्रय लेना पड़ता है।      शिल्प, शिल्प-विधि शिल्प विधान का अर्थ शैली से अधिक व्यापक है। यह वह उपादान है, जिसके द्वारा रचनाकार अपनी भावनाओं, अपने अनुभव व अपने दृष्टिकोण को विशेष ढंग से व्यक्त करता है। शिल्प-विधान रचना का व्यापक तत्व होता है। साहित्य-सृजन में शिल्प की महत्वपूर्ण और उल्लेखनीय भूमिका होती है। शिल्प के माध्यम से ही रचनाकार अपने अनुभवों को अभिव्यक्ति दे पाता है। रचनाकार के भीतर, उसकी अनुभूतियों में जो कुछ भी है, उसे व्यञ्जित करने का काम किसी विशेष शिल्प विधि के बिना संभव नहीं है।
                   शिल्प-विधि पर डॉ जवाहर सिंह लिखते हैं - "शिल्प-विधि से तात्पर्य किसी कृति के निर्माण की उन सारी प्रक्रियाओं तथा रचना पद्धतियों से है, जिनके माध्यम से रचनाकार अपनी अमूर्त जीवनानुभूतियों व मन पर पड़े प्रभावों और भावों को मूर्त रूप देकर अधिकाधिक संवेद्य, सौंदर्यमूलक बनाता है। रचनाकार अपने अनुभव के आधार पर अपने भावों, विचारों को अभिव्यक्ति देता है, तब वह शिल्प का सहारा लेता है। शिल्प के द्वारा ही रचना को संवारा जा सकता है। "जटिल भाव बोध की अभिव्यंजना को शिल्प विशेष के द्वारा ही व्यञ्जित किया जाता है। रचनाकार का शिल्प-विधान रूप-अरूप के बीच, अनुभूति-अभिव्यक्ति के बीच, लेखक-कवि और पाठक के बीच एक अनिवार्य माध्यम है। शिल्प-विधि के द्वारा ही संप्रेषणीयता, जटिलता, दुरूहता, सांकेतिक, बिम्ब आदि का प्रभाव रचनाकार पर पड़ता है। शिल्प किसी कृति की रचना प्रणाली का ही नाम है। शिल्प विधान का आशय किसी साहित्यिक-कृति का रूप-निर्माण, रूप-रचना, रचना-विधान या रूप-विधायक तत्वों के आधार पर संयोजन से है।
                    रचनाकार के मनोभावों, आवेगों, संवेदनाओं, दृष्टि, अनुभवों, अनुभूतियों का संपूर्ण प्रभाव उसकी रचनाओं में परिलक्षित होता है। अपने इन्हीं निज-तत्वों को अभिव्यक्त करने, यानि सार्वजनिक करने के लिए रचनाकार किसी भी विधा के भीतर, जिस ढंग या तकनीक को अपनाता है, वही उसका शिल्प विधान है। शिल्प विशिष्ट हो, तो वह रचनाकार की पहचान का कारण भी बनता है।  वरिष्ठ नवगीतकार राम सेंगर के संदर्भ में पूरी प्रामाणिकता के साथ कहा जा सकता है। आमजन अपनी बात कहने के लिए अपनी कहन में व्यंग्य की, जैसी धारदार व्यंजना को अपनाता है, वही ढंग राम सेंगर, उतनी ही सहजता से अपनाते हैं। लेकिन, कथ्य की धार, कहन का वहीं ढंग प्राप्त करने प्राप्त करने के लिए, जिस  विशिष्ट  शिल्प की की जरूरत होती है, उसे वे गढ़ ही लेते हैं। देखें -
      सुनो भाई!
      तुम कहो सो ठीक,
                       लो हम,
                       कीच को कहते मलाई!
     तुम्ही खाओ
     हमें सेहतमंद
     और गरिष्ठ चीजें हजम करने में
                      बड़ी तकलीफ होती है।
     दाल रोटी के पले को
     स्वाद का चस्का न  डालें,
     हैसियत भरमा न जाये
                      बहुत छोटी है।
     आपके
      सद्भाव की तकनीक
      भीतर कहाँ रोपें
            भूमि तक हम को न मन की दे दिखाई। 
      सुनो भाई!
      तुम कहो सो ठीक,
      लो हम,
      कीच को कहते मलाई!
             (रेत की व्यथा-कथा, पृष्ठ 13)
                 राम सेंगर ने मात्र एक अंतरे वाले भी कई गीत रचे हैं और एक अंतरे में भी वह अपनी बात पूरी त्वरा और गहनता से कह पाए हैं। ऊपर उद्धृत गीत भी एक अंतरे का ही है। वे छोटे मोटर के गीतों में भी जीवन-स्थितियों के बहुत प्रामाणिक चित्र उकेरते हैं। देखें
      जाँगर टूटी, ठिलिया न खिंचे
            घर चला रहे कैसे-कैसे।
     चूल्हा सुलगे, रोटी महके
     कुछ साग बने या दाल चढ़े
                    यह उम्मीदें लेकर लौटें
     नित धूल-पसीने में लिथड़े
     जन-बच्चों से आंखें जोड़ें
               दिल जला रहे कैसे-कैसे।
      घर बैठे तो खाएँगे क्या
      इकलौते हमीं कमेरे हैं
                    गो,हमसे और गए बीते
      परिवार यहां बहुतेरे हैं।
     सुविधा का देय, प्रसाद समझ
                खलबला रहे कैसे-कैसे।
 
                     राम सेंगर ने अपने नवगीतों के मुखड़ों के शिल्प विधान में बहुत अधिक प्रयोग किए हैं। लय का आवर्त पूरा करने के लिए वे मुखड़े के अंतिम हिस्से को आधार बनाते हैं, किन्तु कविता के केंद्र में जिस भाव की व्याप्ति होती है, उसे वे आधार देने के लिए काफी बड़े-बड़े मुखड़ों की रचना करते हैं। देखें -
      खेत-कोनिया-पार
      सभी गरकी में आये
      बारिश ने सब
      इस गरीब के रंग उड़ाये
      कैसा कहर हमारे ऊपर प्रभु ने ढाया है।
     अबकी यह आषाढ़ तबाही लेकर आया।

      कोठा गिरा
      झमाझम ऐसे मेहा बरसे
      भैंस मर गई
      मठा-दूध को बच्चे तरसे
      दाने-दाने पर साहू ने नाम लिखाया है।
                 (रेत की व्यथा - कथा, पृ. 19)
                     राम सेंगर बहुत बड़े-बड़े मुखड़ों के साथ बहुत छोटे-छोटे, एक पंक्ति वाले मुखड़ों का भी अर्थवत्ता से भरपूर शब्द समूह को लेकर नवगीत रचते हैं। देखें -
       डूब गया शिवदान
       नहर में
              हुई बावरी माई।
       सुनी खबर पर
       बदहवास-सी
              एक रुलाई फूटी
       डोल कुँये में गिरा
       हाथ की
       रस्सी  सहसा छूटी।
       घिरनी घूमी घर्र घरर घर
             गिरी, पछाड़ लगाई।
            (रेत की व्यथा-कथा, पृ. 21)
                 शिल्प मात्र मीटर नहीं है। शिल्प किसी छंद का प्रकार मात्र भी नहीं है। शिल्प से ही कहन विकसित होती है। शिल्प के भीतर ही एक शैली भी विकसित होती है। जब हम राम सेंगर के नवगीतों में मुखड़े के साथ अंतरों  को भी दृष्टि में लाते हैं, यानी पूरे नवगीत को देखते हैं, तो यह कहन बहुत स्पष्ट और प्रभावी रूप से दिखाई पड़ती है। यहीं उनके चमत्कृत करते प्रयोग भी देखे जा सकते हैं। देखें - 
      अस्वीकृति के तमगे लटकाये
      हम अपने पार के अंधेरे के साथ-साथ
      दूर, बहुत दूर निकल आए।
    
      ऊँची चीजें सारी
      देख लीं नज़र भरकर
              क्या अपने और क्या पराये
    
      चमरौधा
      खुद सिर पर मार-मार लगातार
               भीतर के चोर से लगे रहे
               अनुभव का पिया उगलवाने
       तार पर चले
      दिल को जबड़ों के बीच दबा
                खेद है मदारी को
                हम भला
                क्यों अब तक नाचना न  जाने   
       सँकरे गलियारे के
       मोड़ों पर क्या झींकें
       एँठी कुचली बाँहों की जेहनी ताकत से
              भारी-बेडौल
              यही पत्थर अब खींचना
                 गर्दन में रस्सियाँ फँसाये
                (जिरह फिर कभी होगी पृ. 26) 
                                        राम सेंगर ने अपने एक अंतरे वाले नवगीतों में शिल्प-विधान के अधिकाधिक प्रयोग किए हैं।भाव, विचार संवेदना और अनुभूतिगत कथ्य को पूरी सघनता एवं गहनता के साथ एक अंतरे में ही कहने के लिए इस तरह की प्रयोगशीलता आवश्यक और अवश्यंभावी भी थी। देखते हैं ऐसा ही एक और गीत - 
      निकल जाए हाथी
      हम पाँव के निशानों में अब नहीं
     खोजेंगे बाल
     यादों की चंबल घाटी में
     प्रेत कथा सुनकर के डरे हुए बच्चे-से
        अपनी बाहों में भर अपने आप को
                    हुच्च-हुच्च कर
                    हिलके, रोये
      जीने का कर कोरम पूरा
      हालातों की बदली सूरत में ढल-ढलकर
        घोड़ी पर चढ़े हुए कुबड़ों को देख-देख
       धागे में दिवस है पिरोये
      राम कहानी लेकर
      कब तक कोई बैठे
       बस्ती के कब्रगाह को नजरों में रखकर
  अपनी क्षमताओं का भेद अब लगाना है
                    बिना बजाए थोथे गाल।
              (जिरह फिर कभी होगी, पृ 36)
               राम सेंगर के नवगीतों में शिल्पगत प्रयोगों पर विचार करते हुए यह बात भी सामने आती है, कि अब तक शिल्प के रूप में वर्णों, मात्राओं को आधार बनाकर ही छांदसिक कविता के शिल्प पर अधिकाधिक चर्चा हुई है। इसी आधार पर छंदों के  नामकरण भी हुए हैं। मात्रिक, वार्णिक छंदों के साथ मापनी युक्त और मापनी मुक्त छंदों की अवधारणा भी आई है। नवगीत कविता का अंकुरण, पल्लवन व पुष्पन, जिस कालावधि में हुआ, वह पारम्परिक छंद की वर्जनाओं से मुक्ति के लिए संघर्ष का युग था, बल्कि, यह कहें कि कथ्य के दबाव और संत्रास के तनाव के साथ लिखी जाने वाली कविता समय के वास्तव को पारम्परिक छंद-विधान के बीच न ला पाने विवशता के परिणाम स्वरुप कविता का छंद विधान गड़बड़ा रहा था। इस गड़बड़ी के बीच भी जो लोग छांदसिकता छोड़ने को तैयार नहीं थे, वे अपने छंद विधान के भीतर ही अभिव्यक्ति के औजार खोजते हुए  कविता लिख रहे थे। यहाँ आकर हम पाते हैं, कि कवि नवीन अनुभूतियाँ, उम्मीदों के विपरीत हताशा और संत्रास का वातावरण, अपनी सरकारों के खिलाफ अपने विचार, संस्कार व परिवार- संस्कृति में लगती सेंध, इस सबके बीच, जिस कथ्य को छांदस कवि कहना चाहता था, उसके लिए कवि ने अपने अंतरंग क्षेत्र के अनुकूल छंद-विधान निर्मित किया  और  नवगीत कविता ने उन्हें उनकी मनोनुकूल प्रयोग की स्वतंत्रता दी।
                राम सेंगर का अनुभव संसार अधिक व्यापक है। मध्यम वर्गीय चेतना का जैसा विकट रूप उनके यहाँ है, अन्यत्र विरल ही मित्र मिलता है। उनके अनुभव-संसार में संत्रास, घुटन, संघर्ष, अभाव, विडंबना, विघटन की अनुभूतियाँ व उनके गुँजलक अधिक सघन हैं। इन अनुभूतियों वाले कथ्य को गीत में अभिव्यक्त करने की कोशिश में राम सेंगर अपने नवगीतों को एक नया शिल्प देते हैं।  और यही कारण है कि उनका कोई विधान स्थायी नहीं है। वे कोई स्थायी ढाँचा या फरमा नहीं अपनाते, चाहे वह उनका अपना ही बनाया हुआ क्यों न हो। वे स्वयं अपने पिछले नवगीत के विधान को नया गीत रचते हुए ठीक उसी तरह प्रायः अपनाते। अब बात आती है कि राम सेंगर के विधान को परिभाषित करना हो तो कैसे करें? मेरी दृष्टि में राम सेंगर के नवगीत  मापनी मुक्त छंद विधान पर आश्रित हैं। इनमें कवि 'कल' की सृष्टि करता है और यह 'कल' ही कविता में एक निरंतरता, लयता, प्रवाह और नादात्मकता का सृजन करता है। इस तरह का सृजन करते लिए हुए  वे अपने नवगीतों के लिए कथ्य जहाँ से लेते हैं, वे क्षेत्र बहुत दुर्गम, संत्रास और संघर्ष व अभावों से भरे हुए क्षेत्र हैं। अपने इसी तरह के कथ्य को शब्द देने के लिए नवगीत के शिल्प में उन्हें प्रयोगशील होना पड़ता है। देखते हैं, उनके नवगीत  'छोटा बाबू' का मुखड़ा -
      कोने की उस छुतहा
      मेज पर झुका हुआ
     भीतर के गुणा-भाग में गहरे डूबा-सा
           दबा फाइलों के अंबार के तले
           वह जो कीड़ा है आदम की शक्ल में
      वह छोटा बाबू है
            जी हाँ, जी हाँ हुजूर!
                      यही रामबाबू है!
        शिल्प की प्रविधि मात्राभार गणना, 'कल' सृष्टि या लय-प्रवाह से ही सम्बद्ध नहीं है।शिल्प का महत्वपूर्ण हिस्सा कवि की भाषा भी है। वह अपने भाषागत रचाव से किस तरह के चित्र रचता है, किस तरह के बिम्बविधान की सृष्टि करता है और उसकी प्रतीक योजना जीवन के किन क्षेत्रों को व्यञ्जित करती है, यह सब भी उसके शिल्प को प्रभावित ही नहीं करता, बल्कि शिल्प का ही हिस्सा होता है। उक्त नवगीत - मुखड़े से हम शिल्प-विधि के दूसरे क्षेत्र में भी राम सेंगर के नवगीत - संसार की पड़ताल करते हैं।
                   किसी व्यक्ति की मानसिक स्थिति का चित्र कविता में खोजना हो, तो उसे राम सेंगर के नवगीत पढ़ने चाहिए। 'छोटा बाबू' उनका ऐसा ही गीत है।
                 यद्यपि किसी रचनाकार के समूचे व्यक्तित्व को पहचानने के लिए उसके पूरे रचना संसार की पड़ताल करनी पड़ती है, किन्तु, नवगीत कवि राम सेंगर एक ऐसा छद्म रहित, आडम्बरविहीन, पारदर्शी रचनाकार है,कि उनके एक नवगीत से भी उन्हें पहचाना जा सकता है। वे जिन त्रासद स्थितियों को देखते-भोगते हैं, उन्हें बिना लाग-लपेट के उनकी पूरी जटिलता-सरलता के साथ अपने नवगीतों में रचते हैं। ऐसे अनेकों नवगीत उनके संग्रहों में देखे जा सकते हैं, जिनमें उनके सृजन की प्रवृत्तियों, संघर्षों, स्थितियों और लयकारी से उनका रूपाकार गढ़ा जा सकता है, उन्हें पहचाना जा सकता है। 'छोटा बाबू' भी उन्हीं नवगीतों में से एक है।
               राम सेंगर की भाषा को जटिल संस्कारों की भाषा कहा जा सकता है। उनके नवगीत एकबारगी पढ़ने-सुनने पर एक प्रभाव छोड़ते हैं, किन्तु गीत का समूचा और गहरा मंतव्य थोड़ा ठहर कर पढ़ने और सुनने में समझ में आता है।इनके नवगीतों को पढ़ते हुए बरबस मुक्तिबोध याद आते हैं। इनके नवगीतों में भुतहा घर, बघनखी झपट्टे, घर के अंधे कोने, धुँधुआते कोठे के भीतर का सच, शीशे में मढ़ी हुई धूप, थकी जीवचेतना, नैसर्गिक तेवर जैसे अर्थों के गुँजलक समेटे भाषा-शब्दों के प्रयोग देखने को मिलते हैं। राम सेंगर ऐसे कथ्य को भी अपनी कविता का विषय बना लेते हैं, जिस पर अमूमन गीत लिखना मुश्किल है। यानी, इन विषयों को गीतात्मक कहना थोड़ा मुश्किल है, किन्तु, ऐसे अनगढ़ अबूझ और जटिल-संश्लिष्ट विषयों को भी इनके यहाँ नवगीत में पूरी गीतात्मकता के , कथ्य के साथ पूरा न्याय करते हुए सहेजा गया है।
                  राम सेंगर जीवन के क्षण-क्षण के संघर्ष को रेशे-रेशे को वाणी देते हैं। महत्वपूर्ण बात यह भी है, कि वे नृशंस हालातों को बेनकाब करते हुए कमजोर नहीं पड़ते। विराट वैषम्यकारी स्थितियों के बीच से सारे अवरोधों को लाँघकर बाहर निकलते हैं। व्यक्ति को हताश करने वाली स्थितियों के चित्र तो उनके नवगीतों में हैं, किन्तु, उनमें कहीं उनका रोदन नहीं है, रिरियाना नहीं है। उनके नवगीत 'सेंहुड़बाड़ी' का एक अंतरा देखें -
     अनुपस्थित मन की निष्ठा से
     अपनों ने
     गले पड़ी चीज की तरह उतार फेंका
     अनुभव की मौलिकता के लिए इसी गँदले
     नादान में
     सोखीं पड़े-पड़े टर्राते
     बदहवास रातों की स्याहियाँ;
    कौड़ी-कंचों की पूँजी पर
  जीवन के अर्थ और मर्म के लिए प्यासे भटके    प्याज की तरह, बकला-दर-बकला उधड़ गये
      ताजा दम रहकरके
          गर्म हवा फाँक-फाँक
               फाँदी हैं सब खंदक-खाइयाँ;
   नैसर्गिक तेवर को साधे
   अपने से बाहर आ, देख रहा छू-छूकर
   जीवन स्थितियों के रेशे-रेशे सच को
                  पिटा हुआ उम्र का जुआरी।"
                  यहाँ, जिसे, अपनत्वहीनता से, यानी उपेक्षा से गले पड़ी चीज की तरह उतार फेंका  है, वह गँदले नावदान में बदहवास रातों की स्याही को सोखकर अनुभव की मौलिकता, जीवन के अर्थ और मर्म के लिए प्यासा भटकता हुआ प्याज की तरह उधड़ता है, किन्तु, इतने पर भी जीवटता इतनी विकट है, कि ताजादम रहकर सारे खाई-खंदक लाँघता हुआ आगे बढ़ता है। जीवन के अर्थ और मर्म की प्यास इतनी तीव्र है, कि अपने आप से बाहर आ निरपेक्ष भाव से नैसर्गिक तेवर को साधे जीवन-स्थितियों के रेशे-रेशे सच को छू-छूकर देख रहा है।
                   राम सेंगर आदि से अंत तक विकट जीवन-स्थितियों के बीच उनसे जूझते हुए न केवल जीवन के अर्थ और मर्म की खोज करते हैं बल्कि इन विकट, लोमहर्षक, पीड़ादायी, वैषम्यकारी जीवन-स्थितियों को परास्त करते हैं। हर पल उन से आंखें मिलाकर रखते हैं। उन्हें बदलने और पटखनी देने की भरपूर और निरंतर कोशिश करते हैं। उनके सारे नवगीत इस बात के साक्षी हैं। यही कारण है कि नवगीत कविता का अब तक का जितना साहित्य है, उसमें राम सेंगर अद्वितीय हैं। शिल्प के जितने प्रयोग, जितना वैविध्य, कथ्य का जितना पैना और धारदार रूप उनके यहाँ मिलता है, अन्यत्र दुर्लभ है।
                 कवि इस बात को लेकर पूरी तरह आश्वस्त है कि एक न एक दिन लोग अनाचार और अत्याचार-अन्याय के खिलाफ अवश्य खड़े होंगे और आवाज उठाएंगे। वे छुप-छुपकर दर्द सहने के खिलाफ हैं। देखें -
      "छुप-छुपकर रोना मत
      ओ रे कंदील!
      पिघलेगी दुख की यह जमी हुई झील!
      माना, तू टूटा ज्यों काँच का गिलास
      ओढ़े रह तो भी यह गंध का लिबास
       विभ्रम कोलाहल का
      हो जाएगा हल्का
      टूटेगी जबड़ों पर लगी हुई सील!
     अपना हर साक्षी क्षण, क्यों रहा झँझोड़
      कुण्ठा की जहर भरी शीशी को फोड़
      मेहराबें हिलने दे
      पीठ और छिलने दे
      उतरेगी धरती पर उड़ी हुई चील!
      उबरेगी माथे में गड़ी हुई कील! "
                  राम सेंगर स्थूल बिम्ब को भी हल्के से स्पर्श से सूक्ष्म बना देने में माहिर हैं।
       " चूल्हे में सिर दे कर
         कुछ तो भी थोप लिया
         आहत विश्वासों की पंगत को खाने।"  
'यहाँ कुछ तो भी थोप लिया', रोटी बनाने का और 'पंगत' सामूहिक भोज के लिए बैठे हुए लोगों की पंक्तियों का अर्थ सृजित करते हैं, किन्तु, जैसे ही वे इसे आहत विश्वासों की पंगत कहते हैं, वैसे ही पूरा अंतरा जटिल व्यञ्जना से भर जाता है। इस तरह के ढेरों उदाहरण उनके नवगीतों में आसानी से मिलते हैं।  भारतीय मध्यम वर्गीय समाज में आर्थिक अभावों के बीच अपना पल-पल दाव पर लगाकर अपनी संतानों की शिक्षा के लिए संघर्षरत पिता और पुत्र के बीच सेतु बनती माँ के माध्यम से "ऊँट चल रहा है" के नवगीत 'चुपचाप दुख' में वे लिखते हैं -
      बिन खाए, बिना पिये
      सारा दिन लोहे से लड़कर लौटा तेरा बाप।
    सुन बेटा, अधपेटा उठ न जाय थाली से
    तू ही अब हो जा चुपचाप।
   पढ़ी लिखी बिटियों को
   हाँक दे कहाँ, बतला
         जंगल के हिंसक हैं जीव।
   बँधी अक्ल पर पट्टी
   मुँह सबके खुले हुए
          हतप्रभ हैं देखकर गरीब।
   पंजा शैतान का मरोड़े इकला कैसे
  जारी है अंतर्संलाप।
            पेट काटकर कैसे
            पढ़ा रहा है तुझको
                    विश्वासों का जीवट देख
            अनुभव की भट्टी पर
            चढ़ी इस पतीली में
                   क्या खौले जानते कितेक
   दबी भाप जब ढक्कन खोलेगी, दीखेगा
   लोगों को भाप का प्रताप। "
" रेत की व्यथा - कथा "राम सेंगर के रचना-संसार की प्रतिनिधि नवगीत कविताओं में से एक है। इस गीत में, जहाँ आर्थिक  अभाव यानी गरीबी का चित्र है, वहीं आंखों की उम्मीद पूरे होने को लेकर प्रश्न भी हैं, साथ ही पूँजी की कारस्तानी को समझते हुए उसके आक्रोश की भी एक झलक दिख जाती है, यानी अपने स्थितियों के कारणों की पहचान ही नहीं उनके प्रति विद्रोह का भाव भी दिख जाता है।
      "घर बगैर छत वाला
       जोड़ों का दर्द आग पेट की
       कौन सुने व्यथा-कथा रेत की।
      प्रश्नाहत आंखों में
       फूलेगी जाने कब केतकी।
....................................
      तर्कों का जहर और हम
      कब तक इस खून में उतारें
     कुर्सी के इस चरित्र पर
      मन करता लात एक मारें
     पूँजी के घोड़ों ने
     रौंदी सब खड़ी फसल खेत की।
                कौन सुने व्यथा-कथा रेत की। "
                 राम सेंगर किसी ढर्रे या किसी बनी हुई लीक पर या स्वयं भी कोई ढर्रा या लीक बनाकर उस पर चलने वाले कवि नहीं हैं। मुक्तिबोध कहते हैं - ढर्रे में सब खप जाता है। एक बार शिल्प विधान पर अधिकार हो जाए बस.... ।राम सेंगर लगातार ढर्रा बदलते हैं। कोई तय शिल्प-विधान नहीं है उनका। वे लगातार शिल्पगत प्रयोग करते हैं। पहले के  नवगीतों में वे एक शिल्प रूढ़ि में फँसते दिखाई देते हैं। लगातार बहुत लंबे-लंबे मीटरों में जटिल संवेदनाओं से उद्भूत कथ्य को गद्यात्मक व्याकरण के नियमों में न्यूनतम शिथिलता लेते हुए गीत  उन्होंने लिखे, किन्तु, एक अंतराल के बाद वह अपनी ही रची शिल्प रूढ़ि  को तोड़ते दिखाई पड़ते हैं। इस शिल्प रूढ़ि को तोड़ने का ही परिणाम है, कि, जितने शिल्पगत प्रयोग हमें राम सेंगर की कविता में मिलते हैं, उतने किसी और नवगीतकार के यहाँ दुर्लभ हैं। उन्होंने अत्यंत छोटे मीटर से लेकर बहुत बड़े-बड़े मीटर के अंतरे और मुखड़े वाले नवगीत लिखे।
                 इनके गीतों में जीवन जीने की एक दुर्धर्ष चेतना दिखाई पड़ती है, जो विकट जिजीविषा और जीवटता के रूप में चित्रित होती है। राम सेंगर नवगीत में प्रतिरोध की नई शैली का आविष्कार करते हैं। जीवन को सकारात्मक दृष्टि के साथ अनुभवों की संपदा इकट्ठी करते हुए जीने से उत्पन्न साहस, निडरता इनके गीतों की पूँजी है।  नवगीत काव्यधारा  में राम सेंगर जहां वरिष्ठ नवगीत कवि हैं, वहीं वे अपने शिल्प और कथ्य को लेकर चर्चित भी रहे हैं, किन्तु, अभी तक उनकी कविता के मूल्यांकन की शुरुआत भी नहीं हुई है। दरअसल, राम सेंगर जोड़-जुगाड़ और मुँहदेखी की प्रशंसा करने वाले कवि नहीं है। यह कारण भी रहा है कि उनके नवगीत-काव्य का मूल्यांकन या उस पर,  जैसी चर्चा होनी चाहिए थी,  वह नहीं हुई। यह चर्चा जरूरी थी। जरूरी इसलिए भी थी, कि इस चर्चा से नवगीत की आलोचना के भी नए द्वार खुलने की संभावना है। कविता की आलोचना के  अनेक सूत्र इनकी  कविता में निबद्ध हैं। आत्मप्रशंसा और शिविर बद्धता से जितना अधिक नुकसान नवगीत और उसकी आलोचना का हुआ, कविता के इतिहास में ऐसा दूसरा उदाहरण शायद ही हो। यद्यपि यह शिविर बद्धता और मठाधीशी की प्रवृत्ति अब तक  कम होने की बजाय बढ़ी ही है।
               राम सेंगर के नवगीतों की विलक्षणता कई स्तरों पर देखी जा सकती है। वे ऐसे शब्दों का अपनी कविताओं में प्रयोग करते हैं, जो बिल्कुल नवीन भाव- बोध से भरे और मुहावरे की तरह दिखाई पड़ते हैं। देखें - नई लय का घाव, प्यास हुई ताड़ से बड़ी, एक बार का पिया प्रकाश, सहमति के सड़ियल मुहावरे, बीड़ीभाँज, चिकनौटी भट्टी, भीतरी-असंगति, मनोदशा का तल्ला, नि:श्रेयस की नहीं तमन्ना, अंधी-अपेक्षा आदि। इनके नवगीतों में शब्दों के स्तर पर साधारणत: बेमेल समझे जाने वाले और गीत के उपयुक्त न समझे जाने वाले शब्दों का प्रयोग इतने कलात्मक ढंग से देखा जा सकता है, कि जटिल कथ्य भी अपनी पूरी संवेदना के साथ अर्थ खोलने लगता है। राम सेंगर एक ही पंक्ति में विशुद्ध तत्सम, तद्भव और उर्दू फारसी के शब्दों का ऐसा रचाव रचते हैं,  कि वहाँ सब सहज दिखाई पड़ता है। कठिन तत्सम शब्द भी उनके नवगीतों में लय-प्रवाह में  कहीं बाधक नहीं बनते। यह अपने नवगीतों में ऐसे रूपचित्र गढ़ते हैं, कि कथ्यानुकूल सौंदर्यविधान  तो सृजित होता ही है, साथ ही मनुष्य का  उल्लास, जिजीविषा, जीवन शैली, आक्रोश, संघर्ष सब कुछ रूपायित हो जाता है। ये चित्र खेतिहर मजदूरों से लेकर महुआ बीनती हुई सुकुमारियों, लोहे के साथ खटते मजदूरों, ऑफिस में काम करते बाबू, यानी निम्न वर्गीय जीवन से लेकर मध्यमवर्गीय संघर्ष, संत्रास की कहानी कहते हैं, तो इन्हीं नवगीतों में राजनीति के पाखंड, छल-छद्म, वादाखिलाफी और पूँजी के कुचक्र में फँसे जन के भी चित्र हैं। आम घर- परिवार की समस्याएँ और उनसे जूझते - टूटते- संभलते व्यक्ति के चित्र हैं।
                   राम सेंगर के नवगीतों  को पढ़ना, उनको समझना कविता की परंपरा में सन् 66 के बाद से अब तक कविता में आई प्रवृत्तियों से होकर गुजरने जैसा है। जैसी जटिल भाषा और संवेदना से होकर मुक्तिबोध गुजरते हैं, ठीक वैसे ही जटिल भाषा और संवेदना के नवगीतकवि राम सेंगर भी हैं। इनके नवगीतों का मूल्यांकन, जब भी होगा तब इनके नवगीतों के और कई-कई स्तर सामने आएँगे।
                                  राजा अवस्थी
                                        कटनी