Saturday, 16 November 2024
अगाध राग से भरी कवयित्री -डा. शांति सुमन
अगाध राग से भरी नवगीत कवयित्री - डॉ शांति सुमन
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गीत, जो आदिम काव्य रूप भी है, जिसने अभी-अभी अपना स्वर्णकाल जिया था। महाप्राण निराला, जयशंकर प्रसाद, महादेवी वर्मा, सुमित्रानंदन पंत जैसे शिखरस्थ रचनाजीवी मनीषी गीत लिख रहे थे, कि निराला की ही रचनाओं के सिरे पकड़कर गीत कविता को कविता के हासिये पर धकेलने के षड़यंत्र शुरू हो गए। निराला जी भी इस धूर्तता को जान-समझ चुके थे। यह यूँ ही नहीं हुआ, कि बीसवीं सदी के पाँचवें दशक के बाद उन्होंने केवल गीत ही लिखे, मुक्तछंद की कविताएँ नहीं लिखीं। यही वह समय था जब निराला के मुक्त छंद की चेतना, कविता के नये स्वर नई अनुभूति के साथ नयी कहन की गीत कवितायें भी आ रही थीं। एक तरफ प्रगतिवादी कविता, प्रयोगवादी कविता एक लय से आबद्धता के बीच 'लय' से विचलन की ओर बढ़ रही थी, तो दूसरी ओर गीत एक नई कथन भंगिमा, लोक संपृक्ति के साथ व्यष्टि केंद्रित अभिव्यक्ति को समष्टि की अभिव्यक्ति बनाने के लिए बेचैन था। यह वही बेचैनी थी, जिसके कारण महाप्राण निराला गीतों के स्वर्णिम समय में 'मुक्तछंद' में अपनी बात कहना शुरू करते हैं।
सन् 1930 में 'परिमल' का प्रकाशन हुआ। 'परिमल' की प्रस्तावना में निराला जी ने उस समय के महत्वपूर्ण कवियों यथा मैथिलीशरण गुप्त, सियारामशरण गुप्त प्रभृति कवियों की कविताओं को लक्षित कर अतुकांत हो रही कविताओं के उदाहरण दिए हैं। सुमित्रानंदन पंत भी मुक्तछंद लिखने लगे थे। ध्यान देने की बात यह है कि महाप्राण निराला सहित उस समय और उसके बहुत बाद तक भी किसी कवि ने मुक्तछंद कविता को केवल 'कविता' नहीं कहा। मुक्तछंद अथवा छंदमुक्त या स्वच्छंद छंद शब्दों का प्रयोग किया गया है। यहाँ तक कि निराला इस तरह की कविताओं के लिए केवल 'मुक्तछंद' कहना ही पर्याप्त समझते हैं। परिमल के प्रकाशन के बाद मुक्तछंद में खूब लिखा गया। सराहा भी गया। मुक्तछंद मात्र को कविता घोषित करने का षड़यंत्र अज्ञेय से शुरू होता है। ये पहले व्यक्ति हैं, जो गीत को कविता ही नहीं मानते। यद्यपि इन्हें हिन्दी में 'अंग्रेजी की कविताएँ' लिखने वाला कवि कहा जाता था। अज्ञेय ने ही मुक्तछंद कविता को अनुवाद की कविता बना दिया। इसका शिल्प पूरी तरह अनुवाद का शिल्प बन गया। निराला जी ने परिमल में मुक्तछंद की आवश्यकता के साथ उसके शिल्प पर भी खूब लिखा है। उन्होंने मुक्तछंद में अतुकांतता के साथ अलग-अलग पंक्तियों की लम्बाई अलग-अलग होने को मान्यता दी है, किन्तु उसमें कवित्त जैसी लय, अबाध प्रवाह की अनिवार्यता भी बताई है। मुक्तिबोध की कविताओं में, जो मुक्तछंद के अब तक के सबसे बड़े कवि हैं, में यह लय और प्रवाह निरन्तर मिलता है। लेकिन अज्ञेय ने तो सारा रायता ही फैला दिया। उन्होंने गीत और कविता नाम की दो अलग चीजें घोषित कर दीं। अज्ञेय ने तो यह तक लिख दिया कि "गीतकारों के गीतों को कविता की धारा में रखने के लिए मुझे कठिनाई होती है। यूँ तो कोई भी कई गीत लिख सकता है, लेकिन काव्य की धारा में गीत का स्थान गौड़ ही है। यह भी हो सकता है, कि कोई गीत ही गीत लिखे, पर उस दशा में उसे कवियों की पंक्ति में न रख कर संगीतकारों के बीच अधिक से अधिक संधि रेखा पर रखूंगा।" जैसे अज्ञेय जी ही उनके पूर्व की पूरी काव्यपरंपरा, उनके समय की काव्य परंपरा और उनके बाद की भी काव्य परंपरा में किसे कविता मानना है और किसे नहीं, इस बात के इकलौते निर्णायक ठेकेदार हैं। इस बात पर यह उक्ति याद आती है कि -" लाल बुझक्कड़ बूझ के, और न बूझो कोय।" लेकिन अज्ञेय के प्रभामण्डल के आगे उस समय के सभी नक्षत्रों ने भी अपनी आभा को अज्ञेय में विलीन कर दिया और उनकी अनर्गल मान्यता का प्रतिकार नहीं किया। आश्चर्य की बात तो यह है कि, गीत लिखने वालों ने भी इसका प्रतिकार नहीं किया। यद्यपि नागार्जुन और केदारनाथ सिंह जैसे कवियों ने अपनी कविता को अनुवाद और गद्य होने से न सिर्फ बचाए रखा, बल्कि इनकी कविताओं में एक विराट लय और अबाध प्रवाह मिलता है। इसीलिए नागार्जुन सार्वकालिक बड़े कवि सिद्ध हैं। मुक्तछंद में बहुत सारी और बहुत अच्छी कविताएँ लिखी गईं, किन्तु राम की शक्ति पूजा, अँधेरे में, कालिदास और असाध्य वीणा की परम्परा को कवि सम्हाल नहीं पाये और मुक्तछंद लगातार गद्य बनता चला गया। अब मुक्तछंद नहीं, बल्कि कविता के नाम पर अधिकांश गद्य कविता ही लिखी जा रही है।
इस आलेख में यह टिप्पणी अनावश्यक - सी बात लग सकती है, किन्तु आवश्यक भी है और आवश्यक इसलिए है, कि गद्य कविता के लिए 'कविता' मात्र शब्द के प्रयोग ने यह भ्रम फैलाने का काम किया है कि 'गद्य कविता' ही कविता है और गीत, गीत है। गीत को कविता नहीं कह सकते। इसलिए गद्य के प्रारूप में लिखी जा रही कविता को, यदि मुक्तछंद है, तो मुक्तछंद अथवा 'गद्य कविता' ही कहना चाहिए। ऐसा कहा और इसी तरह भी पहचाना भी जाने लगा है। इसी तरह नवगीत को भी 'नवगीत कविता' कहा जाना चाहिए, ताकि 'गद्य कविता ' मात्र को कविता कहने - मानने के अल्पवयस्क भ्रमकारी चलन को समाप्त किया जा सके। यही कारण है कि मैं नवगीत के लिए 'नवगीत कविता' संज्ञा का प्रयोग करता हूँ। यहाँ शांति सुमन जी के नवगीतों के लिए भी 'नवगीत कविता' ही कह रहा हूँ, इसलिए यह लिखना जरूरी लगा।
ऊपर गीत में जिस नयी कथन भंगिमा और लोक सम्पृक्ति के साथ व्यष्टि केन्द्रित अभिव्यक्ति से समष्टि केन्द्रित अभिव्यक्ति में जाने की बेचैनी की बात कही गई है, यह बेचैनी डाॅ शिव बहादुर सिंह भदौरिया, राजेन्द्र प्रसाद सिंह जैसे कवियों में ही नहीं, बल्कि तार सप्तक के कवियों के गीतों में भी यह बेचैन विचलन देखा जा सकता है। यह अलग बात है, कि वे सब इसमें समर्थ होते हुए भी इस लोकसम्पृक्त बेचैनी को सम्हाल नहीं पाए। या यह कहें, कि गीत कविता की संभावनाओं के कमतर आकलन के कारण एक सुविधाजनक मार्ग अपना लिया। किन्तु कुछ लोग थे, जो इस लोकधर्मी काव्य यात्रा पर निरन्तर चलते रहे। परिणाम का प्रथम पुष्प गुच्छ 1956 में 'गीतांगिनी' के रूप में आया।
किसी भी स्थापित विधा में रूपांतरण और उस रूपांतरित विधा के स्थापित होने में एक लंबा समय लगता है। गीत कविता के नवगीत कविता के रूप में स्थापित होने में भी लंबा समय लगा। इसमें जिन नवगीत रचनाधर्मियों का महत्वपूर्ण स्थान और योगदान है, उनमें प्रख्यात् नवगीत कवयित्री डॉ. शांति सुमन का नाम नींव और शीर्ष के कुछ गिने-चुने रचनाकारों में शामिल है। डॉ. शिव बहादुर सिंह भदौरिया, उमाशंकर मालवीय, उमाशंकर तिवारी, विद्यानंदन राजीव, रामचंद्र चंद्रभूषण, देवेंद्र शर्मा इंद्र, शलभ श्रीराम सिंह, मुकुट बिहारी सरोज, भगवान स्वरूप सरस, अमरनाथ श्रीवास्तव, सत्यनारायण, अनूप अशेष, नचिकेता, महेश अनघ, मधुकर अस्थाना, राम सेंगर, कुमार रवींद्र, माहेश्वर तिवारी, निर्मल शुक्ल आदि के साथ विशेष रूप से शांति सुमन जी का नाम कई-कई दृष्टिकोणों से महत्वपूर्ण और उल्लेखनीय है। यद्यपि सभी भिन्न-भिन्न ढब और ढंग के नवगीत कवि हैं।
जिन दिनों नवगीत कविता पर गद्य कविता के पैरोकार प्रहार कर रहे थे। उपेक्षित कर रहे थे। गीत की मृत्यु की घोषणा तक कर रहे थे। तब गीत कविता और वह भी नवगीत कविता के पक्ष में खड़े रहना किसी जोखिम से कम नहीं था। यह बहुत चुनौती भरा भी था। दिनेश्वर प्रसाद सिंह दिनेश कहते हैं - "ऐसे में बिहार के एक छोटे-से शहर मुजफ्फरपुर से नई उम्र की एक कवयित्री ने अपने को बेहिचक दाँव पर लगाया और नवगीत के पक्ष में उठ खड़ी हुई। वह शांति सुमन थीं, जिन्होंने समय के अनुसार अपनी गीत रचना की जमीन बदल कर जनवादी गीतों की रचना करती मिलती हैं। वे जनवादी गीतों के लिए चर्चित हुईं। उनके आत्मीय राग, आत्मीय संबंध और उनमें पगी पूरी लोक संवेदना से भरे नवगीत विद्वत् समाज के साथ-साथ भारतीय समाज में जन-जन के द्वारा स्वीकारे और सराहे गये। शांति सुमन नवगीत कविता को जीने वाली, अपनी निष्ठाओं के लिए चुनौती स्वीकारने और जोखिम उठाने वाली कवयित्री हैं। कविता में जहाँ एक ओर महीयसी महादेवी वर्मा थी, सुभद्रा कुमारी चौहान थीं, वहाँ और भी बहुत सारी कवयित्रियाँ रही हैं, किंतु नवगीत कविता जैसी उपेक्षित और सामर्थ्य से भरी कविता को जीना और उसमें रचना करने में दूसरी कोई गीत कवयित्री दूर-दूर तक नहीं थी। शांति सुमन सच में ही नवगीत कविता की पहली कवयित्री हैं।
अपनी रचनाधर्मिता पर शांति सुमन एक जगह लिखती हैं कि, - "समय की तमाम चुनौतियों और संघर्षों को अपने गीतों में रेखांकित करती हुई मैं अपनी रचनाधर्मिता में सक्रिय हूँ। संघर्षों से जूझने के लिए मेरे गीत मेरे औजार हैं। शोषण के खूनी जबड़ों को तोड़ना जहाँ इनका लक्ष्य रहा, वहीं जनता के हिस्से की धूप, उनके उजास, उनकी हरियाली, उनके बसंत, उनके सुख-चैन, उनके खेत- खलिहान, उनके घर, पास-पड़ोस, उनकी हँसी और उनकी बची हुई ज़िंदगी को बचा लेने की अनन्य आकांक्षा भी इन गीतों में भरी हुई है। "इस वक्तव्य की रोशनी में शांति सुमन जी की जनवादी नवगीत कविताओं को समझने का उपक्रम किया जा सकता है।
आमजन हर अन्याय, शोषण और दमन का प्रतिकार करने की भावना से गले तक भरा है। वह शुभचिंतकों की शुभचिंता के छद्म को भी जानता है। यह बात लोक-समाज की नब्ज़ को पहचानने वाली कवयित्री डॉ. शांति सुमन अच्छी तरह से जानती हैं, तभी तो वे अपने नवगीत 'भीतर-भीतर आग' में एक वर्ग को बेनकाब करते हुए लिखती हैं -" भीतर-भीतर आग बहुत है /बाहर तो सन्नाटा है। सड़कें सिकुड़ गई हैं भय से/ देख खून की छापें/ दहशत में डूबे हैं पत्ते /अंधकार भी काँपें/किसने है यह आग लगाई /जंगल किसने काटा। घर तक पहुँचाने वाले वे/ धमकाते हैं राहों में /जाने कब सींघा बज जाए /तीर चुभेंगे बाहों में/ कहने को तो तेज रोशनी/ कालिख को ही बाँटा।" नवगीत कविता का यह अंतरा अपने व्यञ्ज्यार्थ में तो बहुत दूर तक जाता है, किंतु अपने लक्ष्यार्थ में एक स्त्री और उसके कथित अपनों की मंशाओं, उनकी करगुजारियों को भी अनावृत्त करता है।
शांति सुमन वह नवगीत कवयित्री हैं, जिन्होंने लंबे, बहुत लंबे समय तक मंचों का उपयोग जन-जन तक नवगीत कविता को पहुँचाने के लिए किया। कवि सम्मेलन के मंचों पर मुकुट बिहारी सरोज, उमाशंकर मालवीय, कैलाश गौतम, माहेश्वर तिवारी, नचिकेता आदि कुछ नामों के साथ, जो एक स्वर नवगीत कविता की धूम मचा रहा था, वह शांति सुमन का स्वर था। यहाँ भी नवगीत कविता का यह इकलौता स्त्री स्वर था। आज मंचों पर नवगीत कवयित्री कीर्ति काले सक्रिय हैं, किंतु वह पूरी तरह मंचों को ही समर्पित हो चुकी हैं। आज नवगीत कविता में शरद सिंह, अरुणा दुबे, पूर्णिमा वर्मन, मधु प्रधान, रंजना गुप्ता, मंजूलता श्रीवास्तव, शीला पाण्डेय, सीमा अग्रवाल, शशि पुरवार, भावना तिवारी, गरिमा सक्सेना, मधु शुक्ला, अनामिका सिंह आदि अच्छे नवगीत लिख रही हैं। किन्तु, छठवें-सातवें दशक के आसपास स्त्री रचनाकार के रूप में अकेली शांति सुमन ही नवगीत कविता लिख रही थीं। इसे सामान्य घटना की तरह नहीं लिखा जा सकता। यह एक उल्लेखनीय घटना थी।
शांति सुमन का जन्म, पालन-पोषण और शिक्षा मध्यमवर्गीय परिवार, पड़ोस और संस्कृति में हुई। मध्यमवर्गीय संस्कृति की पूंजी आपसी संबंध, इन संबंधों के भीतर भरी अगाध रागात्मकता की निर्मल नदी है। इनके गीतों में ये संबंध और उनकी रागात्मकता के बड़े उल्लास भरे, करुणा भरे, जीवटता भरे और मार्मिकता भरे चित्र मिलते हैं। ये चित्र बहुत व्यञ्जना भरे भी हैं और भीतर तक प्रभावित करने वाले हैं। शांति सुमन का पहला नवगीत संग्रह 'ओ प्रतीक्षित' 1970 में प्रकाशित हुआ। तब से अब तक पन्द्रह नवगीत कविता संग्रह आ चुके हैं। अभी 2021 में उनका नया नवगीत कविता संग्रह 'सानिध्या' प्रकाशित हुआ है। इसमें इनके सन् 2017 से सन् 2021 की अवधि में लिखी गई कविताएँ हैं। इस तरह इन पाँच दशकों से भी अधिक की कालावधि में वे अपने जनगीतों के लिए भी चर्चित रहीं, किन्तु उनकी कविता के प्रमुख तत्वों में उनकी सामाजिक- सांस्कृतिक दृष्टि, पारिवारिक ताने-बाने में गुँथी भारतीय संस्कृति के बीच बहती अबाध निर्मल रागात्मकता और इसी के मध्य परिवारों के उत्कर्ष में अनबोले ही अपना सर्वस्व न्यौछावर करती स्त्री ही रहे हैं। सन् 1978 में प्रकाशित 'परछाईं टूटती है' से कुछ अंश देखते हैं -
"बरसों से फूल-पात हाथ में पड़े हुए
अंजुरी में उलझे कुछ धागे
सायेहीन साये हैं आगे
पत्थर के गमले में कल से पत्ते झड़े हुए।"
अथवा "माँ की परछाई - सी लगती
गोरी दुबली शाम
पिता - सरीखे दिन के माथे
चूने लगता घाम।"
या "केसर रंग रँगा मन मेरा
सुआपंखिया शाम है
बड़े प्यार से सात रंग में
लिखा तुम्हारा नाम है। " अथवा
(लय हरापन की)
" खुशबू ने तो खूब चला ली /हर पल अपने
मन की /खुशबू अब भागी फिरती है /मौसम
के डर से। " (लय हरापन की)।
यह तासीर 'लाल टहनी पर अड़हुल' प्रकाशन वर्ष 2016, में आकर और घनी होने लगती है। इसमें वे लिखती हैं -
"कसकर बोला किए न देखा /टूटा क्या कहाँ-कहाँ। था तो मन टीन नहीं /बज ले जब तक चाहे /शीशा दरकेगा ही /चाहे इसे बचा ले /कुछ पल में ही बढ़ आता है /अपनापन इस मन का /टूटा थोड़े में ही /मन में जहाँ - तहाँ। दुख देखे धरती ने /नभ यह कैसे जाने/रात सहज बो देती /कितने दुख अनजाने /सुख जब भी आता जीवन में /ढहते सभी किनारे /पुल बनने से पहले /सुख ने क्या नहीं सहा। ". और एक अंश यह भी -
" हम टूटे पुल से हुए / हो गये भीतर तक सूने
शांति सुमन की नवगीत कविताओं पर बात करते हुए अशोक शुभदर्शी ने लिखा है कि -" ये गीत शब्दों के सहारे शब्दातीत हो जाते हैं और शब्दातीत हुए बिना कोई गीत चरम तक नहीं पहुँचता। गीत चरम को तब छूता है, जब उसका अर्थ चरम को छूता है।" यहाँ जो शब्दातीत होने की बात अशोक शुभदर्शी कह रहे हैं, वह कविता मात्र के लिए भी महत्वपूर्ण है। कोई भी कविता शब्दातीत तब होती है, जब वह पाठक या श्रोता की अनुभूति बन जाती है। कोई भी पंक्ति कविता तभी बनती है, जब वह अनुभूति बनती है। इस अनुभूति को ही मुक्तिबोध 'संवेदन' कहते हैं। शांति सुमन की नवगीत कविताओं की सबसे बड़ी विशेषता उनका अनुभव जन्य होना और अनुभूति बन जाना है। इनकी नवगीत कवितायें पाठक और श्रोता की भी अनुभूति बन जाती हैं। और इसका कारण उनके आसपास का लोक और उसका जीवन, उसकी संस्कृति, उसके संघर्ष और इस सबके प्रति शांति सुमन जी की अबाध-अगाध रागात्मकता है। एक नवगीत देखते हैं -
खुशबू चली हवा के घर से / रोये से कचनार
जैसे बढ़ते पाँव विदा के / मन के फाँक हजार
आशीषों में हाथ उठे हैं / अड़हुल के जूही के
खेतों के मेड़ों पर बादल / आते हैं फूही के
दोनों पाँव महावर भर के / चलती दो पग चार
महफा के झालर में उड़ते / रंग नहाये द्वार
लिखते हुए रचनाकार की संवेदना को अनुभव करना भावक को, पाठक को भी उन रागात्मकता भरी मार्मिक अनुभूतियों में डुबो सकता है।
मुहावरे लोक भाषा ही नहीं, लोक जीवन में भी प्राणों की तरह बसते हैं। शांति सुमन कहती हैं - "मुहावरों से भरी भाषा देशज शब्दों के प्रयोग के साथ बिम्बों में प्रकृति और मानव जीवन के संस्पर्श नवगीत की विशेष सम्पदा हैं।" नवगीत कविता मनुष्य जीवन की आशाओं-आकांक्षाओं, संघर्षों से भरे जीवन की, उसके राग-विराग की कविता है। ये आशाएं-आकांक्षाएँ, संघर्ष, राग- विराग जिस मनुष्य की हैं, जिस मनुष्य का जीवन हैं, वह मनुष्य ही तो लोक को रचता है। यही कारण है, कि नवगीत कविता लोक की भी कविता है। नवगीत कविता में लोक-जीवन, लोक-भाषा, लोक- आकांक्षा, सब कुछ अपने जीवन्त रूप में चित्रित होता है। यही लोक डॉ. शांति सुमन की कविता का प्राण है। यद्यपि मिथिला का जीवन उनके गीतों में भरा हुआ है, किंतु यहाँ चित्रित जीवन यहाँ का संघर्ष, यहाँ की आत्मीयता, यहाँ की भाषा भी इस तरह चित्रित है, कि वह मिथिला और मैथिली की खुशबू रखने के साथ पूरे भारतीय निम्नवर्गीय एवं निम्न मध्यमवर्गीय जीवन-संघर्ष, जीवन-स्थितियों, आशाओं का ही चित्रांकन लगती हैं। शांति सुमन के सृजन का कोई ऐसा अंश ढूंढ़ना कठिन काम है, जो इस लोक के संस्पर्श से अछूता हो।
मनुष्य का और उसकी मनुष्यता का प्रमाणपत्र है जीवन के प्रति निष्ठा होना। और, कवि के लिए यह प्रथमत: परम् आवश्यक है, कि उसमें जीवन के प्रति निष्ठा हो। जीवन के प्रति यह निष्ठा मनुष्य जीवन ही नहीं, अपितु सृष्टि में विद्यमान सभी तरह के जीवन के प्रति होना जरुरी है। यहाँ तक, कि समस्त जीव-जन्तुओं, वनस्पतियों के साथ नदी, तालाब, समुद्र, पर्वत-पहाड़, सूर्य, चन्द्रमा, तारे इत्यादि, इन सबके अस्तित्व के प्रति निष्ठा आवश्यक है। निष्ठा की यह विराटता ही कवि को अगाध संवेदना, अप्रतिम, अबाध रागात्मकता, दया, ममता, करुणा और क्षोभ से भरती है। यह संवेदना और राग ही मनुष्य को मनुष्यता के पक्ष में, अनय के विपक्ष में स्थिर करता और रखता है। डॉ शांति सुमन के विपुल कविता संसार में और प्रकारांतर से उनके व्यक्तित्व में, उनके मन में इसी विराट निष्ठा को लगातार महसूस करते-देखते और पाते हैं।
यह अकारण नहीं है, कि शांति सुमन के गीत संसार के ज्यादा हिस्से को नदी और हवा के प्रवाह, उनकी निर्मलता, हवा में फैलती सुगंध, फसलों की लहलहाहट, रिश्तों की गर्माहट, चंद्रमा की शीतलता, चन्दमा का मन, सूरज की गर्मी और जीवनी शक्ति, फूलों के रंग और उनकी सुन्दरता, विविधवर्णी वनस्पतियाँ और न जाने क्या - क्या घेरे हुए हैं। इनकी उपस्थिति केवल स्थान घेरने के लिए नहीं अपितु मनुष्य मन की संवेदनाओं, रागों, उसके रिश्तो की गर्माहट और उसमें आते ठहराव में न जाने कितने अन्य जीवन-रंगों को बिम्बायित करते हुए हुई है। शांति सुमन की कविता में जीवन के प्रति यह राग निरंतर बना रहता है।
शांति सुमन प्रकृति के उपादानों के मानवीकरण की अप्रतिम कवित्री है।
"नहीं न आराम एक पल भी / उलझी रही हवा कामों में / बदल न पाई तीन दिनों से / चादर पीली हरियाली की / खिड़की की सादे घाटों पर / सूखा पत्ता भी है बाकी / बच्चों के उठते आएगी /अपने खेतों खलिहानों में।"
यहाँ शांति सुमन जी हवा की अति व्यस्तता की बात और बहुत सारे कामों की बात गीत में करती है। वहीं, हर अंतरे में इसका रहस्य भी खोलती चलती हैं। कविता की अंतिम अंतरे में इस अतिव्यस्तता की बेचैनी को भी कह देती हैं -
" तीन दिनों से ही पड़ोस से /नहीं हुई कुछ भी है बातें / अकुलाई है भीतर मन से /इस दिन की तरह न हो रातें /मन को भी तो बाँध दिया है/ बाकी सारे सामानों में।"
यह समझना कठिन नहीं है, कि यह व्यस्तता और यह बेचैनी घर परिवार में किसके हिस्से में आई है। स्त्री मन की पीड़ा, उसकी जीवन- स्थितियों और उसके धैर्य को शांति सुमन जी ने जितने मन से लिखा है और उसके यथार्थ में ही लिखा है, वह उनकी अपार संवेदना और अनुभूति से ही संभव है। ऐसे अनुभूतिजन्य और संवेदना से भरे चित्र और कथानक उनकी नवगीत कविताओं में भरे पड़े हैं।
स्त्री मन की पीड़ा, उसकी जीवन स्थितियाँ और उसके धैर्य को शांति सुमन जी ने खूब मन से, और खूब, उसके यथार्थ में लिखा है। ऐसे चित्र और कथानक उनकी नवगीत कविताओं में भरे पड़े हैं। एक चित्र देखते हैं -
"मन की बेचैनी कहने की आदत उसे नहीं/ तितली ने कबीर की चादर ओढ़ी /भले सही/ उड़ती रहती दिनभर बहता रहता उसे पसीना।"
शांति सुमन अपने जनगीतों और जनपक्षधर नवगीत कविताओं के लिए जानी जाती हैं। 'सानिध्या' प्रकाशन क्रम में उनकी कविताओं की पन्द्रहवीं किताब है और इसमें उनके सन् 2016 के बाद लिखी नवगीत कवितायें संकलित हैं। इसकी नवगीत कविताओं को पढ़ते हुए आद्यांत एक अनुराग की नदी बहती है। यह कभी प्रतीक्षा में है, कभी उल्लास में, कभी व्याकुलता में, तो कभी मनुहार की दशा में भी है। वह अनुराग ही है, जिसे सानिध्य और मिलन का सुख मिलता है, तो विरह का दुख भी उसी की धरती के हिस्से में जन्मता है। 'किसी' के पास नहीं होने से कितने तरह की पीड़ाएँ सताती हैं, देखिए एक गीत में - "कुछ जरूर फूल ने कहा /तेरा मन अनमना हुआ/ तू तो जाने वासंती/ आँखों की हो तुम पुतली /तेरे बिन उदास रहता आँगन पीले फूलों का /मना नहीं पाती पुरवा/ हठ इन हरे दुकुलों का... .... बहुत दुखाती है जैसे/ चमकी धूप दोपहर की /सपने भरी आँखें खड़ी /रह जाती है इस घर की/ पोखर में जैसे बूँदों के मन की बातें /उछली हवाएँ कील सी चुभतीं"
शांति सुमन की नवगीत कविताओं की बनावट और बुनावट की कलात्मकता पर विचार करते हुए मैनेजर पांडे इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि -" शांति सुमन के गीतों का महत्व उनके विशिष्ट रचाव में है। लगता है की लोकगीत की आत्मा नई देह पा गई है या कि नई चेतना लोकगीत में समा गई है।" तो यह आकारण नहीं है। लोक में जितनी, जो कुछ भी चीजें हैं, उनमें मनुष्य का पूरा जीवन समाया हुआ है। लोक की अभिव्यक्ति में मनुष्य की संपूर्ण दिनचर्या से लेकर उसके भाव, उसकी अनुभूतियाँ, उसके राग-विराग, भौतिक-अभौतिक व लौकिक-अलौकिक प्रतिक्रियाएँ सभी कुछ शामिल हैं। लोक इस सब को अभिव्यक्त ही नहीं करता, वह तो उसको भोगता भी है। दरअसल यह अनुभव संसार लोक का ही है, जो कवि, कलाकार या लेखक इस लोक को जितना अपनी कविता या कला में व्यक्त कर पाता है, दरअसल वह उतना ही अपनी जड़ों से, अपने लोक से जुड़ा हुआ होता है। उतना ही वह अपने लोक को जीने और पहचानने वाला होता है। शांति सुमन ऐसी कवयित्री हैं, जो न केवल अपने लोक को जानती-पहचानती हैं, बल्कि वह अपने लोक से जुड़ी हुई हैं और उसे ही जीती हैं। अपने लोक को वे जीती हैं अपनी कविता में, उसके शब्दों में, उसकी लय में और उसके प्रवाह में। उनकी नवगीत कविताएँ उनके इस जुड़ाव की गवाही देती है। ऐसी नवगीत कविताएँ दो-चार नहीं बल्कि उनके रचना संसार का अधिकांश ऐसा ही है।
डाॅ. शांति सुमन अपनी जनपक्षधर नवगीत कविताओं के लिए अधिक चर्चित रहीं, किन्तु सही अर्थों में नवगीत कवयित्री हैं और नवगीत कविता जीवन को उसकी समग्रता में देखने की दृष्टि है। इस अर्थ में जनपक्षधरता नवगीत कविता की ही एक विशेषता है। यद्यपि नवगीत कविता के आरम्भिक काल में यह जनपक्षधरता ज्यादातर नवगीत कवियों में न्यूनतम स्तर पर है, किन्तु बाद में लगातार यह बढ़ती ही गई है। यह जनपक्षधरता शांति सुमन जी की कविताओं में इनके प्रारम्भिक दिनों में ही अच्छा उभार पा गई थी।
शांति सुमन ऐसी नवगीत कवयित्री हैं, जिनपर सबसे अधिक लिखा गया है। इनके अपने विपुल रचना संसार के अलावा इनके रचना संसार पर लगभग आठ सौ पृष्ठों के दो ग्रन्थ प्रकाशित हो चुके हैं। ऐसे में किसी कवि पर कुछ कहने का अर्थ कहे हुए को दोहराने के संकट से जूझने जैसा है। फिर भी इनकी नवगीत कविताओं के बीच कुछ ऐसा स्पेस, जहाँ अभी काफी कुछ अनकहा है, मैने उसे ही देखने-पढ़ने की कोशिश की है। बावजूद इसके कहने के लिए अभी बहुत अधिक बाकी ही है।
दिनांक - 10/02/2024
राजा अवस्थी
गाटरघाट, आजाद चौक
कटनी-483501 (मध्य प्रदेश)
मोबा 9131675401
Email - raja.awasthi52@gmail.com
Wednesday, 18 September 2024
किस्सा कोताह का चतुर्थ द्विवार्षिक सम्मेलन अवनिज लघुकथा सम्मान के रूप में सम्पन्न
किस्सा कोताह का चौथा द्विवार्षिक उत्सव यमुना चंबल के दोआबा बाह जिला आगरा की धरती पर 14 15 16 सितंबर 24 को देश के जाने-माने रचनाकारों के बीच संपन्न हुआ।
आयोजन के सूत्रधार मनोज शुक्ल अर्णव, पवन शर्मा टाइगर, शिवराम शांति, शाहिद महक, गणेश शर्मा विद्यार्थी आदि के जीतोड़ प्रयास से इस शानदार आयोजन के लिए देश के जाने-माने साहित्यकार सुदीरवर्ती क्षेत्रों से बाह की धरती पर पधारे।
इस तीन दिवसीय गरिमामय आयोजन के प्रथम दिवस सत्येंद्र कुमार रघुवंशी की अध्यक्षता एवं राजा अवस्थी के मुख्यातिथ्य में किस्सा कोताह के लघुकथा विशेषांक के विमोचन के साथ ही नौ अन्य कृतियों- गुमशुदा चाबियों की तलाश (कविता संग्रह -अरुण सातले), शब्दों से तुम तक (काव्य-संग्रह-डॉ शिव यादव) ,हिरनुआ और अन्य कहानियाॅं (बालकथा-संग्रह-शिवमंगल सिंह), करूॅं भरोसा (काव्य-संग्रह-डॉ. मधुबाला सिन्हा), चहट चंपा (कथा-संग्रह-उर्मिला आचार्य), पिकासो की उदास लड़कियाॅं (कविता-संग्रह-शैलेंद्र शरण), नियुक्ति पत्र (लघुकथा-संगह-नीलम राकेश), काश हमारे पंख होते (बाल-काव्य-माता प्रसाद शुक्ल) एवं हमरे हिया की तुहीं चंदनिया (काव्य-डॉ देवेंद्र तोमर) की कृतियों का विमोचन किया गया। इस अवसर पर सत्येंद्र कुमार रघुवंशी द्वारा सार्थक अध्यक्षीय वक्तव्य के साथ राजा अवस्थी के द्वारा नवगीत कविता पर विशिष्ट वक्तव्य दिया गया।
दूसरे सत्र में रात्रि 8:00 बजे सांस्कृतिक प्रस्तुति हुई। जिसमें हल्बी गीत एवं नृत्य भजन तथा फिल्मी गीत डॉ. सुषमा झा, अनिता राज तथा उर्मिला आचार्य ने प्रस्तुत किए।
तीन दिवसीय कार्यक्रम की श्रृंखला में दूसरे दिन 15 सितंबर को आगन्तुक साहित्यकारों ने प्रातः 9:00 बजे से बटेश्वर तथा शौरीपुर तीर्थस्थल का भ्रमण किया। दोपहर 2:00 बजे से लघुकथा-पाठ रखा गया है। जिसमें सविता पाण्डेय नई दिल्ली, माता प्रसाद शुक्ल बहादुरगढ़ (हरियाणा), रश्मि स्थापक (इंदौर), नीलम राकेश (लखनऊ), सतीश सरदाना (गुरुग्राम हरियाणा), शिव अवतार पाल (इटावा उत्तर प्रदेश), डॉ निर्मला शर्मा (दौसा राजस्थान), सुरेश बरनवाल (सिरसा हरियाणा) ने अपनी लघुकथाओं का पाठ किया। इस अवसर पर किस्सा कोताह द्वारा दिया जाने वाला डाॅ.सूबेदार सिंह 'अवनिज' लघुकथा सम्मान के लिए आयोजित प्रतियोगिता के आयोजक विजयानन्द विजय (नालंदा, बिहार) के द्वारा अवनिज सम्मान के लिए चयनित लघुकथाओं के रचनाकारों को प्रतियोगिता के निर्णायक सत्येंद्र रघुवंशी जी के साथ सम्मानित किया गया एवं एक महत्वपूर्ण वक्तव्य भी दिया गया। शाम 4:00 बजे शैलेन्द्र शरण एवं श्यामसुंदर तिवारी द्वारा किस्सा कोताह लघुकथा पुरस्कार वितरण कार्यक्रम संपन्न हुआ। तत्पश्चाप डॉ शिशिर पाण्डेय एवं उर्मिला आचार्य ने कथापाठ किया जिसकी सत्येंद्र कुमार रघुवंशी द्वारा समीक्षा की गई।
सांस्कृतिक संध्या के क्रम में रात्रि 8:00 बजे डॉ. मधुबाला सिन्हा द्वारा भोजपुरी गायन तथा स्थानीय गायकों शिवानी एवं कमल द्वारा भदावरी गायन की प्रस्तुति की गई।
इसी श्रृंखला में 16 सितंबर 2024 को प्रातः 9:00 बजे से आगन्तुकों को चंबल सफारी का भ्रमण कराया गया जिसमें चंबल घाटी तथा अटेर दुर्ग की दुर्लभ यात्रा शामिल थी।
दोपहर 2:00 बजे कृति-सम्मान एवं कहानी-पाठ हुआ, जिसमें दीर्घ नारायण की कृति 'रामघाट में कोरोना' को किस्सा कोताह कृति सम्मान - 24 से नवाजा गया।
अपराह्न 3:00 अखिल भारतीय कवि सम्मेलन शुरू हुआ,जिसकी अध्यक्षता हरगोविंद ठाकुर ने की तथा मुख्य अतिथि प्रसिद्ध कवि नंदू भदोरिया रहे। इस अवसर पर लगभग 40 साहित्यकारों को किस्सा कोताह के अध्यक्ष डॉ शिव यादव, सचिव शिवमंगल सिंह एवं स्थानीय आयोजक देवनारायण शर्मा द्वारा प्रमाण-पत्र, अंग वस्त्र देकर सम्मानित किया गया। तत्पश्चात इस अखिल भारतीय कवि सम्मेलन में -
राजा अवस्थी कटनी, प्रेम प्रकाश चौबे कुरवाई, डॉ सुषमा झा जगदलपुर, शैलेंद्र शरण खंडवा, सत्येंद्र कुमार रघुवंशी लखनऊ, श्यामसुंदर तिवारी खंडवा, बलवीर सिंह पाल इटावा, रामजनम सिंह इटावा, डॉ. मधुबाला सिन्हा मोतीहारी बिहार, गायत्री मिश्रा बाह, सविता पांडेय दिल्ली, शिवराम शांति, देवनारायण शर्मा, शाहिद महक बाह, मुकेश श्रीवास्तव कानपुर ने प्रभावशाली काव्य पाठ किया।
इस सत्र के साथ ही श्री गुरुकुल पब्लिक स्कूल बाह के सौजन्य से आयोजित यह तीन दिवसीय साहित्यिक आयोजन संपन्न हो गया, जिसमें श्रीमती ममता शर्मा, सुस्पा राजावत एवं डेविड ने पुस्तक प्रदर्शनी लगाई। इस ऐतिहासिक और विशिष्टताओं से भरे कार्यक्रम के सभी सत्रों का संचालन महत्वपूर्ण और चर्चित पत्रिका किस्सा कोताह के संपादक अशोक असफल जी ने किया।
-अशोक असफल
संपादक-प्रकाशक किस्सा कोताह
Friday, 6 September 2024
नवगीत कविता - नई सदी का आलोचना परिदृश्य
नवगीत कविता - नई सदी का आलोचना परिदृश्य
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सन् 1958 में गीतांगिनी के प्रकाशन के साथ ही नवगीत पर एक आलोचना दृष्टि विकसित होने-करने का सूत्रपात हो गया था। उसके बाद कविता 64 में प्रकाशित आलेखों, पाँच जोड़ बांसुरी और नवगीत दशकों में नवगीत कवियों के दृष्टिबोध तथा उनके सम्पादक डाॅ शम्भुनाथ सिंह की भूमिकाओं से नवगीत कविता की आलोचना के सूत्र और उनको देखने-समझने की एक दृष्टि निकल रही थी। नवगीत दशकों के प्रकाशन के बाद ही सन्1984 में डॉ राजेंद्र गौतम का 'नवगीत - उद्भव और विकास' तथा 1985 मे डाॅ रमेश गौतम एवं डाॅ वीणा गौतम का नवगीत - इतिहास और उपलब्धि' प्रकाशित हुआ। सन् 1988 में डॉ शिवनारायण सिंह और उमाशंकर तिवारी के संपादन में 'नवगीत के प्रतिमान और आयाम' शीर्षक से बहुत महत्वपूर्ण समीक्षा ग्रंथ प्रकाशित हुआ। इसमें नवगीत के वे प्रतिमान और आयाम एक घोषणा पत्र के रूप में प्रकाशित किए गये, जो नवगीत दशक योजना में शामिल नवगीत कवियों ने तय किए थे। इन्हीं आयामों और प्रतिमानों को आधार बनाकर नवगीत आलोचना को एक दिशा देने की प्रबल कोशिश के रूप में भी इसे देखा जा सकता है।
बीसवीं सदी के अंतिम दो दशकों में नवगीत कविता की आलोचना पर बहुत काम हुआ। किंतु, 21वीं सदी में नवगीत की आलोचना पर, जो काम हुआ वह कई कारणों से महत्वपूर्ण है। एक तो यह कि इस सदी के आरम्भ के दो दशकों में ही कई समवेत संकलन प्रकाशित हुए, जिनके माध्यम से समग्र नवगीत कविता को और नवगीत कवियों को एक साथ समेटने का काम हुआ। इस सदी का आरम्भ होते-होते नवगीत कविता के एकल संग्रहों के रूप में शोध, समीक्षा - आलोचना के लिए विपुल सामग्री उपलब्ध होने के साथ विश्वविद्यालयों में शोध कार्य भी हो रहे हैं । दूसरा यह कि इन्हीं समवेत संकलनों की भूमिकाओं में इनके सम्पादकों ने नवगीत के इतिहास, नवगीत साहित्य के काल विभाजन का भी महत्वपूर्ण काम किया। इस तरह का काल विभाजन नचिकेता, डाॅ ओम प्रकाश सिंह एवं डाॅ. रामसनेही लाल शर्मा 'यायावर' ने अपने मजबूत और वैज्ञानिक तर्कों के आधार पर किया है, किन्तु तीनों ही विद्वानों के काल विभाजन अलग-अलग हैं। तीसरा यह कि इन विद्वानों की आलोचना दृष्टि को समझते हुए एक समग्र और संतुलित आलोचना दृष्टि विकसित होने की राह भी खुलती हैं। इनके अतिरिक्त डाॅ वीरेन्द्र आस्तिक (धार पर हम - दो) की भूमिका में भी नवगीत के तत्वों और समीक्षा पर गहराई से विचार किया है।
नचिकेता, डॉ. राधेश्याम बंधु, डॉ. ओमप्रकाश सिंह, डॉ. निर्मल शुक्ल, डॉ. रामसनेही लाल शर्मा यायावर, डाॅ. वीरेंद्र आस्तिक, कुमार रवीन्द्र आदि नवगीत कवियों ने नवगीत की आलोचना पर काफी काम किया है। इन नवगीत कवियों का महत्वपूर्ण योगदान नवगीत कविताओं के समवेत संकलन निकालने के साथ नवगीत कविता के आरंभ से उसे उसके अत्यावश्यक तर्कसंगत वैज्ञानिक सोच के साथ यथार्थबोधी दृष्टि लेकर आलोचना एवं उसके तत्वों की विवेचना का है। किंतु, इनके अपने कार्यों को भी एक दूसरे के सापेक्ष देखें तो डॉ राधेश्याम बंधु ने 'नवगीत और उसका युगबोध' 2004 में अपने संपादन में प्रकाशित किया। यह ग्रंथ अपने आप में बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि नवगीत की मान्यताओं को लेकर, नवगीत की आलोचना को लेकर इस ग्रंथ में बहुत महत्वपूर्ण आलेख लिये गए हैं। जिनसे आलोचना को एक दिशा मिलती है। इसके बाद डॉ. राधेश्याम बंधु ने ही 'नवगीत के नए प्रतिमान', 'नवगीत का लोकधर्मी सौंदर्य', 'नवगीत का मानवतावाद' का संपादन भी किया और जहाँ इन संकलनों में देश भर के नवगीत कवियों के नवगीत शामिल किये, वहीं इनकी भूमिका एवं प्रथम खंड में कई बड़े-बड़े आलेख भी शामिल किये। डाॅ. राधेश्याम बंधु ने नवगीत कविता के चार समवेत संकलन संपादित किये। इनके पहले समवेत संकलन' नवगीत और उसका युगबोध' के बाद आए तीनों समवेत संकलनों में बंधु जी की एक विशेषता अति की सीमा तक मुखर हुई है। वह यह है, कि डॉ राधेश्याम बंधु ऐसा मानते हैं कि आदि से अंत तक नवगीत ने जो भी यात्रा की है, उसकी जो भी स्थापना हुई है, उसकी जितनी भी उपलब्धियां हैं, उनके सूत्रधार एकमात्र डॉ राधेश्याम बंधु जी ही हैं। उनकी इस मान्यता की आंधी में इन समवेत संकलनों की प्रमाणिकता भी उड़ जाती है।
नचिकेता समकालीन नवगीत-जनगीत के प्रबल पक्षधर हैं। इन्होंने पत्रिकाओं के संपादन व अपने द्वारा संपादित समवेत नवगीत संकलनों 'गीत वसुधा' व 'समकालीन गीत कोश' की बहुत लंबी भूमिकाओं के साथ अतिरिक्त लेखन के रूप में भी आलोचना पर काम किया है। 'गीत रचना की नई जमीन' नवगीत कविता की आलोचना की महत्वपूर्ण पुस्तक है। अभी नचिकेता जी की नवगीत कविता - आलोचना की नयी पुस्तक 'प्रतिरोध में खड़ा समकालीन गीत' के नाम से श्वेतवर्णा प्रकाशन से आई है। यद्यपि इसमें शामिल लगभग सभी आलेख इनके संपादन में प्रकाशित समवेत संकलनों में अथवा कहीं और पहले ही शामिल हैं। फिर भी इनका एक साथ आना महत्वपूर्ण है। अपने आलोचनात्मक आलेखों में वे जहाँ नवगीत - जनगीत के उद्भव, विकास, रचनादृष्टि, संवेदना आदि पर बहुत गहराई से विचार करते हैं, वहीं एक बात सामान्य रूप से इनके आलेखों या कहें कि इनकी समीक्षा दृष्टि में मिलती है, वह यह है, कि ये नवगीत कविता को जनगीत के सापेक्ष दोयम दर्जे का ठहराते हैं। उल्लेखनीय यह भी है कि जनगीत कोई स्वतंत्र विधा नहीं, बल्कि यह नवगीत के भीतर ही यथार्थ चेतना से भरा, प्रतिरोध व संघर्ष चेतना से सम्पृक्त गीत है, जो लोक और मानव आकांक्षा को प्रबलता के साथ व्यक्त करता है। उसका पक्षधर है, उसके संघर्ष का साक्षी और संघर्ष का हथियार भी है। समय की माँग के अनुसार ही यह जनचेतना, मुक्ति की कामना, प्रतिरोध की आवाज काव्य में और लोक में उठती और बढ़ती है।
नचिकेता जी के आलेखों की एक दूसरी खासियत यह भी है कि वह अपनी आलोचना के कई पृष्ठ अपने समय में आए समवेत संकलन और आलोचनाओं की मान्यताओं को खारिज करने में व्यय कर देते हैं। इन मान्यताओं को कसौटी पर कसने और इनकी स्वीकृति अथवा अस्वीकृति की योग्यता की तार्किक विवेचना जरूरी है और नचिकेता जी यह करते भी हैं, किंतु इस महत्वपूर्ण तथ्य के प्रवाह में वे और अनावश्यक तत्व भी मिलाते हैं, जिससे उनकी वैज्ञानिक सोच वाले तार्किक निष्कर्ष भी कहीं व्यक्तिगत आक्षेप की तरह प्रस्तुत हुए-से लगते हैं। इससे महत्वपूर्ण और जरूरी तथ्य भी कहीं छूट जाने का डर बना रहता है।
डाॅ ओमप्रकाश सिंह इस धारा के तीसरे महत्वपूर्ण आलोचक व नवगीत कवि हैं। उन्होंने जहाँ नवगीत और नई कविता के तुलनात्मक अध्ययन के साथ 'नई सदी के नवगीत - नया मूल्यांकन' के संपादन एवं 'समकालीन नवगीत - अवधारणा और मूल्यबोध ' शीर्षक से आलोचना लिखी, वहीं इनका सबसे महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक काम 'नई सदी के नवगीत' (पांच खंडों) का संपादन है। ऊपर वर्णित सभी समवेत संकलनों में नवगीत कविता के डॉ. शंभुनाथ सिंह के नवगीत दशकों के बाद का अब तक का यह सबसे अधिक प्रामाणिक दस्तावेज है। इस काम का पूरा मूल्यांकन अभी तुरंत संभव न हो, तो भी एक स्पष्ट राय तो बनती ही है। इन पाँचों खंडों की भूमिका भी बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि इन्हीं भूमिकाओं में डॉ ओमप्रकाश सिंह की आलोचना दृष्टि से संपन्न नवगीत कविता की आलोचना देखी जा सकती है। इसी भूमिका में डाॅ. ओमप्रकाश सिंह ने नवगीत कविता का काल विभाजन भी किया है और इस कालविभाजन की अपनी दृष्टि को सही ठहराने के लिए उन्होंने अपने तर्क भी दिए हैं। इन पाँच खंडों की एक सीमा तो यह है, कि इनमें नवगीत कविता के कई महत्वपूर्ण नाम छूट गए हैं, इन महत्वपूर्ण नवगीत कवियों को इस श्रृंखला में होना चाहिए था। दूसरा शामिल नवगीत कवियों का क्रम भी तर्कसंगत नहीं है। इसका कारण संभवतः यह रहा हो कि प्रत्येक खंड में मात्र 15 नवगीत कवियों को लेने की सीमा के कारण सभी नवगीत कवि नहीं आ पाये। दूसरा बड़ा कारण यह भी है कि सभी पाँच खंडों की योजना एक साथ न बनने के कारण कुछ नये लोग तो ले लिए गये, किंतु कुछ वरिष्ठ नवगीत कवि छूट गये। एक और कारण समय पर सामग्री की अनुपलब्धता भी हो सकता है। किंतु, इन पाँचों खंडों की विशेषता और मजबूत पक्ष यह है कि, जैसा दूसरे सभी संकलनों में नवगीत और गीत कविता का कोई बड़ा भेद दिखाई नहीं पड़ता, सभी गीत कवि भी नवगीत कवियों में शामिल कर लिए गये हैं। ऐसा यहाँ नहीं है। 'नई सदी के नवगीत' के पाँच खंडों में नवगीत कवि और उनकी नवगीत कवितायें ही शामिल है। इसीलिए 'नई सदी के नवगीत', नवगीत दशकों के बाद नवगीत कविता के इतिहास में समग्रता के प्रयास का यह सबसे अधिक प्रामाणिक काम माना जाएगा। अभी डाॅ ओमप्रकाश सिंह के सम्पादन में साहित्य अकादमी से 101 नवगीत कवियों के नवगीतों का संग्रह 'समकालीन नवगीत कोश' आया है। इसकी भूमिका ने भी डाॅ ओमप्रकाश सिंह की आलोचना दृष्टि और नवगीत आलोचना को कुछ आगे बढ़ाया है।
डाॅ. रामसनेही लाल शर्मा यायावर का काम एक अलग दृष्टि से महत्वपूर्ण और उल्लेखनीय है। इन्होंने 'समकालीन गीत काव्य - संवेदना और शिल्प' तथा नवगीत- नए संदर्भ' नाम से दो समीक्षा ग्रंथ लिखे, वहीं एमेरिट्स फेलोशिप की परियोजना में' 'नवगीत कोश' नाम से एक महत्वपूर्ण शोधकार्य पूर्व किया। यह संपूर्ण शोधकार्य 'नवगीत कोश' के नाम से निखिल पब्लिशर्स एंड डिस्ट्रीब्यूटर्स, आगरा से प्रकाशित भी हो गया है। अब तक नवगीत के लिए किए गए ऐतिहासिक कार्यों में नवगीत कोश का प्रकाशन एक ऐतिहासिक घटना के रूप में भी देखा जा सकता है। नवगीत कोश की विशेषताओं में जहाँ एक तो यह है कि 640 पृष्ठों की इस पुस्तक में आरम्भ के 12 पृष्ठ, जिसमें प्रस्तावना के रूप में गीत की परिभाषा, गीत का स्वरूप, भारतीय गीत परम्परा, हिन्दी गीत परम्परत, गीत-आधुनिक युग की दहलीज पर, नवगीत-उद्भव और विकास, गीत और नवगीत, नवगीत और नई कविता, नवगीत का संवेदना-संसार, आभासी दुनिया में नवगीत, नवगीत का शिल्प-सौंदर्य, नवगीत का भविष्य - संभावनाओं की आहट 'इन बारह उपशीर्षकों के माध्यम से नवगीत कविता की एक पुष्ट प्रस्तावना प्रस्तुत की है, वहीं इसमें नवगीत - उद्भव और विकास' उप शीर्षक के अन्तर्गत नवगीत का काल विभाजन भी किया है। डाॅ यायावर ने नवगीत कविता के रचना समय का काल विभाजन करते हुए उसे
बीजवपन काल (1936-1954),
अंकुरण काल (1955-1965),
पल्लवन काल (1966-1980),
पुष्पन काल (1981-2000),
एवं सुफलन काल (इक्कीसवीं सदी) इन पाँच भागों में विभाजित किया है। कोश के द्वितीय खण्ड में पृष्ठ 125 से 266 तक अब तक प्रकाशित 681 एकल नवगीत संग्रहों की सूची उनके प्रकाशन वर्ष, प्रकाशक, पृष्ठ संख्या आदि के साथ दी गई है। इसी खण्ड के उपखण्ड में 66 समवेत संकलनों का परिचय उनके संपादक, शामिल रचनाकर, प्रकाशन वर्ष सहित यायावर जी की एक विशेष टिप्पणी के साथ दिया गया है। कोश का एक बड़ा हिस्सा पृष्ठ 315 से 466 तक नवगीतकारों के परिचय से समृद्ध है। इस खण्ड में नवगीत कवि का संक्षिप्त किन्तु लगभग पूरा परिचय दिया गया है। चतुर्थ खण्ड में नवगीत कविता की आलोचना - समीक्षा पर अब तक प्रकाशित - अप्रकाशित ग्रन्थों का परिचय दिया गया है। इसमें 103 प्रकाशित समीक्षा ग्रन्थों के साथ 75 अप्रकाशित समीक्षा ग्रन्थों का परिचय शामिल है। पृष्ठ 533 से 640 तक का पंचम खण्ड भी बहुत महत्वपूर्ण खण्ड है। इस खण्ड में एक साथ 30 नवगीत कवियों से साक्षात्कार के माध्यम से नवगीत कविता को जानने - समझने का महत्वपूर्ण कार्य किया गया है। इस तरह हम देखते हैं कि डॉ रामसनेही लाल शर्मा का यह शोध ग्रन्थ 'नवगीत कोश' नवगीत के सम्बन्ध में विपुल जानकारी के साथ एक आलोचना - दृष्टि और नवगीत को जानने - समझने के लिए जरूरी ग्रन्थ के रूप में आया है।
डाॅ यायावर का यह 'नवगीत कोश' भी सीमाओं से परे नहीं होगा। किन्तु, इसका मूल्यांकन समय करेगा। 'नवगीत के सृजन-सारथी' नाम से डाॅ. यायावर अब तक के सभी नवगीत कवियों पर एक-एक समग्र समीक्षात्मक आलेख लेकर भी एक ग्रन्थ का सम्पादन कर रहे हैं। इसके तीन खण्ड प्रकाशित हो रहे हैं। संभवतः इसके पाँच खण्ड आने हैं। इससे भी नवगीत कविता को समग्र रूप से समझने की दृष्टि मिलेगी।
बड़े समवेत संकलनों के संपादन में एक बड़ा काम डॉ निर्मल शुक्ल का भी है। शब्दायन, नवगीत - नई दस्तकें, शब्दपदी जैसे बड़े समवेत संकलनों के माध्यम से नवगीत कवियों को एक साथ लाने का बड़ा काम इन्होंने किया है। साथ ही डॉ वीरेंद्र आस्तिक की पुस्तक 'समीक्षा के नये आयाम' भी नवगीत आलोचना पर प्रकाशित हुई है। डॉ रणजीत पटेल ने 'सहयात्री समय के' नाम से नवगीत कविता का महत्वपूर्ण समवेत संकलन आया हैं। इनके अलावा और भी कई समवेत संकलन इस सदी में प्रकाशित हुए हैं, किन्तु इन सबमें किसी समग्र दृष्टि के दर्शन नहीं होते। ये 10 - 15 कवियों को लेकर प्रकाशित किए गए हैं। इसलिए इनके महत्व को नकारा तो नहीं जा सकता, किन्तु बहुत गहरी लाइन से रेखांकित भी नहीं किया जा सकता। यद्यपि नवगीत कविता के इतिहास में ये सदैव उल्लेखनीय रहेंगे।
अभी मधुकर अष्ठाना के आलोचनात्मक आलेखों का एक संग्रह 'नवगीत मूल्यबोध और प्रतिरोध' शीर्षक से आया है। इसके पहले इनकी नवगीत आलोचना पर 'नवगीत के विविध आयाम' और 'नवगीत की पृष्ठभूमि' भी आ चुकी है। इस श्रृंखला में कुमार रवीन्द्र के आलेखों का संकलन 'नवगीत की अस्मिता' उल्लेखनीय किताब है।
नवगीत पुस्तकों की समीक्षा और आलोचना का छिटपुट काम तो हो रहा है, किन्तु नवगीत - कविता की आलोचना को स्थापित होना अभी बाकी है। इस दिशा में नचिकेता, डाॅ. ओमप्रकाश सिंह और डॉ. रामसनेही लाल शर्मा 'यायावर' की मान्यताओं को लेकर आगे की संभावनाएँ निकल सकती हैं।
राजा अवस्थी
गाटरघाट रोड, आजाद चौक
कटनी - 483501 (मध्यप्रदेश)
मोबा. 9131675401
9617913287
Email - raja.awasthi52@gmail.com
नवगीत कविता - नई सदी का आलोचना परिदृश्य
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सन् 1958 में गीतांगिनी के प्रकाशन के साथ ही नवगीत पर एक आलोचना दृष्टि विकसित होने-करने का सूत्रपात हो गया था। उसके बाद कविता 64 में प्रकाशित आलेखों, पाँच जोड़ बांसुरी और नवगीत दशकों में नवगीत कवियों के दृष्टिबोध तथा उनके सम्पादक डाॅ शम्भुनाथ सिंह की भूमिकाओं से नवगीत कविता की आलोचना के सूत्र और उनको देखने-समझने की एक दृष्टि निकल रही थी। नवगीत दशकों के प्रकाशन के बाद ही सन्1984 में डॉ राजेंद्र गौतम का 'नवगीत - उद्भव और विकास' तथा 1985 मे डाॅ रमेश गौतम एवं डाॅ वीणा गौतम का नवगीत - इतिहास और उपलब्धि' प्रकाशित हुआ। उसके साथ ही सन् 1988 में डॉ शिवनारायण सिंह और उमाशंकर तिवारी के संपादन में 'नवगीत के प्रतिमान और आयाम' शीर्षक से बहुत महत्वपूर्ण समीक्षा ग्रंथ प्रकाशित हुआ। इसमें नवगीत के वे प्रतिमान और आयाम एक घोषणा पत्र के रूप में प्रकाशित किए गये, जो दशक योजना में शामिल नवगीत कवियों ने तय किए थे। इन्हीं आयामों और प्रतिमानों को आधार बनाकर इसे नवगीत आलोचना को एक दिशा देने की प्रबल कोशिश के रूप में इसे देखा जा सकता है।
बीसवीं सदी के अंतिम दो दशकों में नवगीत कविता की आलोचना पर बहुत काम हुआ। किंतु, 21वीं सदी में नवगीत की आलोचना पर, जो काम हुआ वह कई कारणों से महत्वपूर्ण है। एक तो यह कि इस सदी के आरम्भ के दो दशकों में ही कई समवेत संकलन प्रकाशित हुए, जिनके माध्यम से समग्र नवगीत कविता को और नवगीत कवियों को एक साथ समेटने का काम हुआ।इस सदी का आरम्भ होते-होते नवगीत कविता के एकल संग्रहों के रूप में शोध, समीक्षा - आलोचना के लिए विपुल सामग्री उपलब्ध होने के साथ विश्वविद्यालयों में शोध कार्य भी हो रहे हैं । दूसरा यह कि इन्हीं समवेत संकलनों की भूमिकाओं में इनके सम्पादकों ने नवगीत के इतिहास, नवगीत साहित्य के काल विभाजन का भी महत्वपूर्ण काम किया। इस तरह का काल विभाजन नचिकेता, डाॅ ओम प्रकाश सिंह एवं डाॅ रामसनेही लाल शर्मा 'यायावर' ने अपने मजबूत और वैज्ञानिक तर्कों के आधार पर किया है, किन्तु तीनों ही विद्वानों के काल विभाजन अलग-अलग हैं। चौथा यह कि इन विद्वानों की आलोचना दृष्टि को समझते हुए एक समग्र और संतुलित आलोचना दृष्टि विकसित होने की राह भी खुलती हैं। इनके अतिरिक्त डाॅ वीरेन्द्र आस्तिक (धार पर हम - दो) की भूमिका में भी नवगीत के तत्वों और समीक्षा पर गहराई से विचार किया है।
नचिकेता, डॉ राधेश्याम बंधु, डॉ ओमप्रकाश सिंह, डॉ निर्मल शुक्ल, डॉ रामसनेही लाल शर्मा यायावर, डाॅ वीरेंद्र आस्तिक, कुमार रवीन्द्र आदि नवगीत कवियों ने नवगीत की आलोचना पर काफी काम किया है। इन नवगीत कवियों का महत्वपूर्ण योगदान नवगीत कविताओं के समवेत संकलन निकालने के साथ नवगीत कविता के आरंभ से उसे उसके अत्यावश्यक तर्कसंगत वैज्ञानिक सोच के साथ यथार्थबोधी दृष्टि लेकर आलोचना एवं उसके तत्वों की विवेचना का है। किंतु, इनके अपने कार्यों को भी एक दूसरे के सापेक्ष देखें तो डॉ राधेश्याम बंधु ने 'नवगीत और उसका युगबोध' 2004 में अपने संपादन में प्रकाशित किया। यह ग्रंथ अपने आप में बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि नवगीत की मान्यताओं को लेकर, नवगीत की आलोचना को लेकर इस ग्रंथ में बहुत महत्वपूर्ण आलेख लिये गए हैं। जिनसे आलोचना को एक दिशा मिलती है। इसके बाद डॉ. राधेश्याम बंधु ने ही 'नवगीत के नए प्रतिमान', 'नवगीत का लोकधर्मी सौंदर्य', 'नवगीत का मानवतावाद' का संपादन भी किया और जहाँ इन संकलनों में देश भर के नवगीत कवियों के नवगीत शामिल किये, वहीं इनकी भूमिका एवं प्रथम खंड में कई बड़े-बड़े आलेख भी शामिल किये। डाॅ. राधेश्याम बंधु ने नवगीत कविता के चार समवेत संकलन संपादित किये। इनके पहले समवेत संकलन' नवगीत और उसका युगबोध' के बाद आए तीनों समवेत संकलनों में बंधु जी की एक विशेषता अति की सीमा तक मुखर हुई है। वह यह है, कि डॉ राधेश्याम बंधु ऐसा मानते हैं कि आदि से अंत तक नवगीत ने जो भी यात्रा की है, उसकी जो भी स्थापना हुई है, उसकी जितनी भी उपलब्धियां हैं, उनके सूत्रधार एकमात्र डॉ राधेश्याम बंधु जी ही हैं। उनकी इस मान्यता की आंधी में इन समवेत संकलनों की प्रमाणिकता भी उड़ जाती है।
नचिकेता समकालीन नवगीत-जनगीत के प्रबल पक्षधर हैं। इन्होंने पत्रिकाओं के संपादक व अपने द्वारा संपादित समवेत नवगीत संकलनों 'गीत वसुधा' व 'समकालीन गीत कोश'
की बहुत लंबी भूमिकाओं के साथ अतिरिक्त लेखन के रूप में भी आलोचना पर काम किया है।
'गीत रचना की नई जमीन' नवगीत कविता की आलोचना की महत्वपूर्ण पुस्तक है। अभी नचिकेता जी की नवगीत कविता - आलोचना की नयी पुस्तक 'प्रतिरोध में खड़ा समकालीन गीत' के नाम से श्वेतवर्णा प्रकाशन से आई है। यद्यपि इसमें शामिल लगभग सभी आलेख इनके संपादन में प्रकाशित समवेत संकलनों में अथवा कहीं और पहले ही शामिल हैं। फिर भी इनका एक साथ आना महत्वपूर्ण है। इनके आलोचनात्मक आलेखों में जहाँ नवगीत - जनगीत के उद्भव, विकास, रचनादृष्टि, संवेदना आदि पर बहुत गहराई से विचार करते हैं, वहीं एक बात सामान्य रूप से इनके आलेखों या कहें कि इनकी समीक्षा दृष्टि में मिलती है, वह यह है, कि ये नवगीत कविता को जनगीत के सापेक्ष दोयम दर्जे का ठहराते हैं। उल्लेखनीय यह भी है कि जनगीत कोई स्वतंत्र विधा नहीं, बल्कि यह नवगीत के भीतर ही यथार्थ चेतना से भरा, प्रतिरोध व संघर्ष चेतना से सम्पृक्त गीत है, जो लोक और मानव आकांक्षा को प्रबलता के साथ व्यक्त करता है। उसका पक्षधर है, उसके संघर्ष का साक्षी और संघर्ष का हथियार भी है। समय की माँग के अनुसार ही यह जनचेतना, मुक्ति की कामना, प्रतिरोध की आवाज काव्य में और लोक में उठती और बढ़ती है।
नचिकेता जी के आलेखों की एक दूसरी खासियत यह भी है कि वह अपनी आलोचना के कई पृष्ठ अपने समय में आए समवेत संकलन और आलोचनाओं की मान्यताओं को खारिज करने में व्यय कर देते हैं। इन मान्यताओं को कसौटी पर कसने और इनकी स्वीकृति अथवा अस्वीकृति की योग्यता की तार्किक विवेचना जरूरी है और नचिकेता जी यह करते भी हैं, किंतु इस महत्वपूर्ण तथ्य के प्रवाह में वे और अनावश्यक तत्व भी मिलाते हैं, जिससे उनकी वैज्ञानिक सोच वाले तार्किक निष्कर्ष भी कहीं व्यक्तिगत आक्षेप की तरह प्रस्तुत हुए-से लगते हैं। इससे महत्वपूर्ण और जरूरी तथ्य भी कहीं छूट जाने का डर बना रहता है।
डाॅ ओमप्रकाश सिंह इस धारा के तीसरे महत्वपूर्ण आलोचक व नवगीत कवि हैं। उन्होंने जहाँ नवगीत और नई कविता के तुलनात्मक अध्ययन के साथ 'नई सदी के नवगीत - नया मूल्यांकन' के संपादन एवं 'समकालीन नवगीत - अवधारणा और मूल्यबोध ' शीर्षक से आलोचना लिखी, वहीं इनका सबसे महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक काम 'नई सदी के नवगीत' (पांच खंडों) का संपादन है। ऊपर वर्णित सभी समवेत संकलनों में नवगीत कविता के डॉ. शंभुनाथ सिंह के नवगीत दशकों के बाद का अब तक का यह सबसे अधिक प्रामाणिक दस्तावेज है। इस काम का पूरा मूल्यांकन अभी तुरंत संभव न हो, तो भी एक स्पष्ट राय तो बनती ही है। इन पाँचों खंडों की भूमिका भी बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि इन्हीं भूमिकाओं में डॉ ओमप्रकाश सिंह की आलोचना दृष्टि से संपन्न नवगीत कविता की आलोचना देखी जा सकती है। इसी भूमिका में डाॅ. ओमप्रकाश सिंह ने नवगीत कविता का काल विभाजन भी किया है और इस कालविभाजन की अपनी दृष्टि को सही ठहराने के लिए उन्होंने अपने तर्क भी दिए हैं। इन पाँच खंडों की एक सीमा तो यह है, कि इनमें नवगीत कविता के कई महत्वपूर्ण नाम छूट गए हैं, इन महत्वपूर्ण नवगीत कवियों को इस श्रृंखला में होना चाहिए था। दूसरा शामिल नवगीत कवियों का क्रम भी तर्कसंगत नहीं है। इसका कारण संभवतः यह रहा हो कि प्रत्येक खंड में मात्र 15 नवगीत कवियों को लेने की सीमा के कारण सभी नवगीत कवि नहीं आ पाये। दूसरा बड़ा कारण यह भी है कि सभी पाँच खंडों की योजना एक साथ न बनने के कारण कुछ नये लोग तो ले लिए गये, किंतु कुछ वरिष्ठ नवगीत कवि छूट गये। एक और कारण समय पर सामग्री की अनुपलब्धता भी हो सकता है। किंतु, इन पाँचों खंडों की विशेषता और मजबूत पक्ष यह है कि, जैसा दूसरे सभी संकलनों में नवगीत और गीत कविता का कोई बड़ा भेद दिखाई नहीं पड़ता, सभी गीत कवि भी नवगीत कवियों में शामिल कर लिए गये हैं। ऐसा यहाँ नहीं है। 'नई सदी के नवगीत' के पाँच खंडों में नवगीत कवि और उनकी नवगीत कवितायें ही शामिल है। इसीलिए 'नई सदी के नवगीत', नवगीत दशकों के बाद नवगीत कविता के इतिहास में समग्रता के प्रयास का यह सबसे अधिक प्रामाणिक काम माना जाएगा।
डाॅ. रामसनेही लाल शर्मा यायावर का काम एक अलग दृष्टि से महत्वपूर्ण और उल्लेखनीय है। इन्होंने 'समकालीन गीत काव्य - संवेदना और शिल्प' तथा नवगीत- नए संदर्भ' नाम से दो समीक्षा ग्रंथ लिखे, वहीं एमेरिट्स फेलोशिप की परियोजना में' 'नवगीत कोश' नाम से एक महत्वपूर्ण शोधकार्य पूर्व किया। यह संपूर्ण शोधकार्य 'नवगीत कोश' के नाम से निखिल पब्लिशर्स एंड डिस्ट्रीब्यूटर्स, आगरा से प्रकाशित भी हो गया है। अब तक नवगीत के लिए किए गए ऐतिहासिक कार्यों में नवगीत कोश का प्रकाशन एक ऐतिहासिक घटना के रूप में भी देखा जा सकता है। नवगीत कोश की विशेषताओं में जहाँ एक तो यह है कि 640 पृष्ठों की इस पुस्तक में आरम्भ के 12 पृष्ठ, जिसमें प्रस्तावना के रूप में गीत की परिभाषा, गीत का स्वरूप, भारतीय गीत परम्परा, हिन्दी गीत परम्परत, गीत-आधुनिक युग की दहलीज पर, नवगीत-उद्भव और विकास, गीत और नवगीत, नवगीत और नई कविता, नवगीत का संवेदना-संसार, आभासी दुनिया में नवगीत, नवगीत का शिल्प-सौंदर्य, नवगीत का भविष्य - संभावनाओं की आहट 'इन बारह उपशीर्षकों के माध्यम से नवगीत कविता की एक पुष्ट प्रस्तावना प्रस्तुत की है। इसमें नवगीत - उद्भव और विकास' उप शीर्षक के अन्तर्गत नवगीत का काल विभाजन भी किया है। डाॅ यायावर ने नवगीत कविता को बीजवपन काल (1936-1954),अंकुरण काल (1955-1965),पल्लवन काल (1966-1980),पुष्पन काल (1981-2000),एवं सुफलन काल (इक्कीसवीं सदी) इन पाँच भागों में विभाजित किया है। कोश के द्वितीय खण्ड में पृष्ठ 125 से 266 तक अब तक प्रकाशित 681 एकल नवगीत संग्रहों की सूची उनके प्रकाशन वर्ष, प्रकाशक, पृष्ठ संख्या आदि के साथ दी गई है। इसी खण्ड के उपखण्ड में 66 समवेत संकलनों का परिचय उनके संपादक, शामिल रचनाकर, प्रकाशन वर्ष सहित यायावर जी की एक विशेष टिप्पणी के साथ दिया गया है। कोश का एक बड़ा हिस्सा पृष्ठ 315 से 466 तक नवगीतकारों के परिचय से समृद्ध है। इस खण्ड में नवगीत कवि का संक्षिप्त किन्तु लगभग पूरा परिचय दिया गया है। चतुर्थ खण्ड में नवगीत कविता की आलोचना - समीक्षा पर अब तक प्रकाशित - अप्रकाशित ग्रन्थों का परिचय दिया गया है। इसमें 103 प्रकाशित समीक्षा ग्रन्थों के साथ 75 अप्रकाशित समीक्षा ग्रन्थों का परिचय शामिल है। पृष्ठ 533 से 640 तक का पंचम खण्ड भी बहुत महत्वपूर्ण खण्ड है। इस खण्ड में एक साथ 30 नवगीत कवियों से साक्षात्कार के माध्यम से नवगीत कविता को जानने - समझने का महत्वपूर्ण कार्य किया गया है। इस तरह हम देखते हैं कि डॉ रामसनेही लाल शर्मा का यह शोध ग्रन्थ 'नवगीत कोश' नवगीत के सम्बन्ध में विपुल जानकारी के साथ एक आलोचना - दृष्टि और नवगीत को जानने - समझने के लिए जरूरी ग्रन्थ के रूप में आया है।
डाॅ यायावर का यह 'नवगीत कोश' भी सीमाओं से परे नहीं होगा। किन्तु, इसका मूल्यांकन समय करेगा।
बड़े समवेत संकलनों के के संपादन में एक बड़ा काम डॉ निर्मल शुक्ल का भी है। शब्दायन, नवगीत - नई दस्तकें, शब्दपदी जैसे बड़े समवेत संकलनों के माध्यम से नवगीत कवियों को एक साथ लाने का बड़ा काम इन्होंने किया है। साथ ही डॉ वीरेंद्र आस्तिक की पुस्तक 'समीक्षा के नये आयाम' भी नवगीत आलोचना पर प्रकाशित हुई है। डॉ रणजीत पटेल ने 'सहयात्री समय के' नाम से नवगीत कविता का महत्वपूर्ण समवेत संकलन आया हैं। इनके अलावा और भी कई समवेत संकलन इस सदी में प्रकाशित हुए हैं, किन्तु इन सबमें किसी समग्र दृष्टि के दर्शन नहीं होते। ये 10 - 15 कवियों को लेकर प्रकाशित किए गए हैं। इसलिए इनके महत्व को नकारा तो नहीं जा सकता, किन्तु बहुत गहरी लाइन से रेखांकित भी नहीं किया जा सकता। यद्यपि नवगीत कविता के इतिहास में ये सदैव उल्लेखनीय रहेंगे।
अभी मधुकर अष्ठाना के आलोचनात्मक आलेखों का एक संग्रह 'नवगीत मूल्यबोध और प्रतिरोध' शीर्षक से आया है। इसके पहले इनकी नवगीत आलोचना पर 'नवगीत के विविध आयाम' और 'नवगीत की पृष्ठभूमि' भी आ चुकी है। इस श्रृंखला में कुमार रवीन्द्र के आलेखों का संकलन 'नवगीत की अस्मिता' उल्लेखनीय किताब
नवगीत पुस्तकों की समीक्षा और आलोचना का छिटपुट काम तो हो रहा है, किन्तु नवगीत - कविता की आलोचना को स्थापित होना अभी बाकी है। इस दिशा में नचिकेता, डाॅ. ओमप्रकाश सिंह और डॉ. रामसनेही लाल शर्मा 'यायावर' की मान्यताओं को लेकर आगे की संभावनाएँ निकल सकती हैं।
राजा अवस्थी
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मोबा. 9131675401
9617913287
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