Wednesday, 18 September 2024
किस्सा कोताह का चतुर्थ द्विवार्षिक सम्मेलन अवनिज लघुकथा सम्मान के रूप में सम्पन्न
किस्सा कोताह का चौथा द्विवार्षिक उत्सव यमुना चंबल के दोआबा बाह जिला आगरा की धरती पर 14 15 16 सितंबर 24 को देश के जाने-माने रचनाकारों के बीच संपन्न हुआ।
आयोजन के सूत्रधार मनोज शुक्ल अर्णव, पवन शर्मा टाइगर, शिवराम शांति, शाहिद महक, गणेश शर्मा विद्यार्थी आदि के जीतोड़ प्रयास से इस शानदार आयोजन के लिए देश के जाने-माने साहित्यकार सुदीरवर्ती क्षेत्रों से बाह की धरती पर पधारे।
इस तीन दिवसीय गरिमामय आयोजन के प्रथम दिवस सत्येंद्र कुमार रघुवंशी की अध्यक्षता एवं राजा अवस्थी के मुख्यातिथ्य में किस्सा कोताह के लघुकथा विशेषांक के विमोचन के साथ ही नौ अन्य कृतियों- गुमशुदा चाबियों की तलाश (कविता संग्रह -अरुण सातले), शब्दों से तुम तक (काव्य-संग्रह-डॉ शिव यादव) ,हिरनुआ और अन्य कहानियाॅं (बालकथा-संग्रह-शिवमंगल सिंह), करूॅं भरोसा (काव्य-संग्रह-डॉ. मधुबाला सिन्हा), चहट चंपा (कथा-संग्रह-उर्मिला आचार्य), पिकासो की उदास लड़कियाॅं (कविता-संग्रह-शैलेंद्र शरण), नियुक्ति पत्र (लघुकथा-संगह-नीलम राकेश), काश हमारे पंख होते (बाल-काव्य-माता प्रसाद शुक्ल) एवं हमरे हिया की तुहीं चंदनिया (काव्य-डॉ देवेंद्र तोमर) की कृतियों का विमोचन किया गया। इस अवसर पर सत्येंद्र कुमार रघुवंशी द्वारा सार्थक अध्यक्षीय वक्तव्य के साथ राजा अवस्थी के द्वारा नवगीत कविता पर विशिष्ट वक्तव्य दिया गया।
दूसरे सत्र में रात्रि 8:00 बजे सांस्कृतिक प्रस्तुति हुई। जिसमें हल्बी गीत एवं नृत्य भजन तथा फिल्मी गीत डॉ. सुषमा झा, अनिता राज तथा उर्मिला आचार्य ने प्रस्तुत किए।
तीन दिवसीय कार्यक्रम की श्रृंखला में दूसरे दिन 15 सितंबर को आगन्तुक साहित्यकारों ने प्रातः 9:00 बजे से बटेश्वर तथा शौरीपुर तीर्थस्थल का भ्रमण किया। दोपहर 2:00 बजे से लघुकथा-पाठ रखा गया है। जिसमें सविता पाण्डेय नई दिल्ली, माता प्रसाद शुक्ल बहादुरगढ़ (हरियाणा), रश्मि स्थापक (इंदौर), नीलम राकेश (लखनऊ), सतीश सरदाना (गुरुग्राम हरियाणा), शिव अवतार पाल (इटावा उत्तर प्रदेश), डॉ निर्मला शर्मा (दौसा राजस्थान), सुरेश बरनवाल (सिरसा हरियाणा) ने अपनी लघुकथाओं का पाठ किया। इस अवसर पर किस्सा कोताह द्वारा दिया जाने वाला डाॅ.सूबेदार सिंह 'अवनिज' लघुकथा सम्मान के लिए आयोजित प्रतियोगिता के आयोजक विजयानन्द विजय (नालंदा, बिहार) के द्वारा अवनिज सम्मान के लिए चयनित लघुकथाओं के रचनाकारों को प्रतियोगिता के निर्णायक सत्येंद्र रघुवंशी जी के साथ सम्मानित किया गया एवं एक महत्वपूर्ण वक्तव्य भी दिया गया। शाम 4:00 बजे शैलेन्द्र शरण एवं श्यामसुंदर तिवारी द्वारा किस्सा कोताह लघुकथा पुरस्कार वितरण कार्यक्रम संपन्न हुआ। तत्पश्चाप डॉ शिशिर पाण्डेय एवं उर्मिला आचार्य ने कथापाठ किया जिसकी सत्येंद्र कुमार रघुवंशी द्वारा समीक्षा की गई।
सांस्कृतिक संध्या के क्रम में रात्रि 8:00 बजे डॉ. मधुबाला सिन्हा द्वारा भोजपुरी गायन तथा स्थानीय गायकों शिवानी एवं कमल द्वारा भदावरी गायन की प्रस्तुति की गई।
इसी श्रृंखला में 16 सितंबर 2024 को प्रातः 9:00 बजे से आगन्तुकों को चंबल सफारी का भ्रमण कराया गया जिसमें चंबल घाटी तथा अटेर दुर्ग की दुर्लभ यात्रा शामिल थी।
दोपहर 2:00 बजे कृति-सम्मान एवं कहानी-पाठ हुआ, जिसमें दीर्घ नारायण की कृति 'रामघाट में कोरोना' को किस्सा कोताह कृति सम्मान - 24 से नवाजा गया।
अपराह्न 3:00 अखिल भारतीय कवि सम्मेलन शुरू हुआ,जिसकी अध्यक्षता हरगोविंद ठाकुर ने की तथा मुख्य अतिथि प्रसिद्ध कवि नंदू भदोरिया रहे। इस अवसर पर लगभग 40 साहित्यकारों को किस्सा कोताह के अध्यक्ष डॉ शिव यादव, सचिव शिवमंगल सिंह एवं स्थानीय आयोजक देवनारायण शर्मा द्वारा प्रमाण-पत्र, अंग वस्त्र देकर सम्मानित किया गया। तत्पश्चात इस अखिल भारतीय कवि सम्मेलन में -
राजा अवस्थी कटनी, प्रेम प्रकाश चौबे कुरवाई, डॉ सुषमा झा जगदलपुर, शैलेंद्र शरण खंडवा, सत्येंद्र कुमार रघुवंशी लखनऊ, श्यामसुंदर तिवारी खंडवा, बलवीर सिंह पाल इटावा, रामजनम सिंह इटावा, डॉ. मधुबाला सिन्हा मोतीहारी बिहार, गायत्री मिश्रा बाह, सविता पांडेय दिल्ली, शिवराम शांति, देवनारायण शर्मा, शाहिद महक बाह, मुकेश श्रीवास्तव कानपुर ने प्रभावशाली काव्य पाठ किया।
इस सत्र के साथ ही श्री गुरुकुल पब्लिक स्कूल बाह के सौजन्य से आयोजित यह तीन दिवसीय साहित्यिक आयोजन संपन्न हो गया, जिसमें श्रीमती ममता शर्मा, सुस्पा राजावत एवं डेविड ने पुस्तक प्रदर्शनी लगाई। इस ऐतिहासिक और विशिष्टताओं से भरे कार्यक्रम के सभी सत्रों का संचालन महत्वपूर्ण और चर्चित पत्रिका किस्सा कोताह के संपादक अशोक असफल जी ने किया।
-अशोक असफल
संपादक-प्रकाशक किस्सा कोताह
Friday, 6 September 2024
नवगीत कविता - नई सदी का आलोचना परिदृश्य
नवगीत कविता - नई सदी का आलोचना परिदृश्य
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सन् 1958 में गीतांगिनी के प्रकाशन के साथ ही नवगीत पर एक आलोचना दृष्टि विकसित होने-करने का सूत्रपात हो गया था। उसके बाद कविता 64 में प्रकाशित आलेखों, पाँच जोड़ बांसुरी और नवगीत दशकों में नवगीत कवियों के दृष्टिबोध तथा उनके सम्पादक डाॅ शम्भुनाथ सिंह की भूमिकाओं से नवगीत कविता की आलोचना के सूत्र और उनको देखने-समझने की एक दृष्टि निकल रही थी। नवगीत दशकों के प्रकाशन के बाद ही सन्1984 में डॉ राजेंद्र गौतम का 'नवगीत - उद्भव और विकास' तथा 1985 मे डाॅ रमेश गौतम एवं डाॅ वीणा गौतम का नवगीत - इतिहास और उपलब्धि' प्रकाशित हुआ। सन् 1988 में डॉ शिवनारायण सिंह और उमाशंकर तिवारी के संपादन में 'नवगीत के प्रतिमान और आयाम' शीर्षक से बहुत महत्वपूर्ण समीक्षा ग्रंथ प्रकाशित हुआ। इसमें नवगीत के वे प्रतिमान और आयाम एक घोषणा पत्र के रूप में प्रकाशित किए गये, जो नवगीत दशक योजना में शामिल नवगीत कवियों ने तय किए थे। इन्हीं आयामों और प्रतिमानों को आधार बनाकर नवगीत आलोचना को एक दिशा देने की प्रबल कोशिश के रूप में भी इसे देखा जा सकता है।
बीसवीं सदी के अंतिम दो दशकों में नवगीत कविता की आलोचना पर बहुत काम हुआ। किंतु, 21वीं सदी में नवगीत की आलोचना पर, जो काम हुआ वह कई कारणों से महत्वपूर्ण है। एक तो यह कि इस सदी के आरम्भ के दो दशकों में ही कई समवेत संकलन प्रकाशित हुए, जिनके माध्यम से समग्र नवगीत कविता को और नवगीत कवियों को एक साथ समेटने का काम हुआ। इस सदी का आरम्भ होते-होते नवगीत कविता के एकल संग्रहों के रूप में शोध, समीक्षा - आलोचना के लिए विपुल सामग्री उपलब्ध होने के साथ विश्वविद्यालयों में शोध कार्य भी हो रहे हैं । दूसरा यह कि इन्हीं समवेत संकलनों की भूमिकाओं में इनके सम्पादकों ने नवगीत के इतिहास, नवगीत साहित्य के काल विभाजन का भी महत्वपूर्ण काम किया। इस तरह का काल विभाजन नचिकेता, डाॅ ओम प्रकाश सिंह एवं डाॅ. रामसनेही लाल शर्मा 'यायावर' ने अपने मजबूत और वैज्ञानिक तर्कों के आधार पर किया है, किन्तु तीनों ही विद्वानों के काल विभाजन अलग-अलग हैं। तीसरा यह कि इन विद्वानों की आलोचना दृष्टि को समझते हुए एक समग्र और संतुलित आलोचना दृष्टि विकसित होने की राह भी खुलती हैं। इनके अतिरिक्त डाॅ वीरेन्द्र आस्तिक (धार पर हम - दो) की भूमिका में भी नवगीत के तत्वों और समीक्षा पर गहराई से विचार किया है।
नचिकेता, डॉ. राधेश्याम बंधु, डॉ. ओमप्रकाश सिंह, डॉ. निर्मल शुक्ल, डॉ. रामसनेही लाल शर्मा यायावर, डाॅ. वीरेंद्र आस्तिक, कुमार रवीन्द्र आदि नवगीत कवियों ने नवगीत की आलोचना पर काफी काम किया है। इन नवगीत कवियों का महत्वपूर्ण योगदान नवगीत कविताओं के समवेत संकलन निकालने के साथ नवगीत कविता के आरंभ से उसे उसके अत्यावश्यक तर्कसंगत वैज्ञानिक सोच के साथ यथार्थबोधी दृष्टि लेकर आलोचना एवं उसके तत्वों की विवेचना का है। किंतु, इनके अपने कार्यों को भी एक दूसरे के सापेक्ष देखें तो डॉ राधेश्याम बंधु ने 'नवगीत और उसका युगबोध' 2004 में अपने संपादन में प्रकाशित किया। यह ग्रंथ अपने आप में बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि नवगीत की मान्यताओं को लेकर, नवगीत की आलोचना को लेकर इस ग्रंथ में बहुत महत्वपूर्ण आलेख लिये गए हैं। जिनसे आलोचना को एक दिशा मिलती है। इसके बाद डॉ. राधेश्याम बंधु ने ही 'नवगीत के नए प्रतिमान', 'नवगीत का लोकधर्मी सौंदर्य', 'नवगीत का मानवतावाद' का संपादन भी किया और जहाँ इन संकलनों में देश भर के नवगीत कवियों के नवगीत शामिल किये, वहीं इनकी भूमिका एवं प्रथम खंड में कई बड़े-बड़े आलेख भी शामिल किये। डाॅ. राधेश्याम बंधु ने नवगीत कविता के चार समवेत संकलन संपादित किये। इनके पहले समवेत संकलन' नवगीत और उसका युगबोध' के बाद आए तीनों समवेत संकलनों में बंधु जी की एक विशेषता अति की सीमा तक मुखर हुई है। वह यह है, कि डॉ राधेश्याम बंधु ऐसा मानते हैं कि आदि से अंत तक नवगीत ने जो भी यात्रा की है, उसकी जो भी स्थापना हुई है, उसकी जितनी भी उपलब्धियां हैं, उनके सूत्रधार एकमात्र डॉ राधेश्याम बंधु जी ही हैं। उनकी इस मान्यता की आंधी में इन समवेत संकलनों की प्रमाणिकता भी उड़ जाती है।
नचिकेता समकालीन नवगीत-जनगीत के प्रबल पक्षधर हैं। इन्होंने पत्रिकाओं के संपादन व अपने द्वारा संपादित समवेत नवगीत संकलनों 'गीत वसुधा' व 'समकालीन गीत कोश' की बहुत लंबी भूमिकाओं के साथ अतिरिक्त लेखन के रूप में भी आलोचना पर काम किया है। 'गीत रचना की नई जमीन' नवगीत कविता की आलोचना की महत्वपूर्ण पुस्तक है। अभी नचिकेता जी की नवगीत कविता - आलोचना की नयी पुस्तक 'प्रतिरोध में खड़ा समकालीन गीत' के नाम से श्वेतवर्णा प्रकाशन से आई है। यद्यपि इसमें शामिल लगभग सभी आलेख इनके संपादन में प्रकाशित समवेत संकलनों में अथवा कहीं और पहले ही शामिल हैं। फिर भी इनका एक साथ आना महत्वपूर्ण है। अपने आलोचनात्मक आलेखों में वे जहाँ नवगीत - जनगीत के उद्भव, विकास, रचनादृष्टि, संवेदना आदि पर बहुत गहराई से विचार करते हैं, वहीं एक बात सामान्य रूप से इनके आलेखों या कहें कि इनकी समीक्षा दृष्टि में मिलती है, वह यह है, कि ये नवगीत कविता को जनगीत के सापेक्ष दोयम दर्जे का ठहराते हैं। उल्लेखनीय यह भी है कि जनगीत कोई स्वतंत्र विधा नहीं, बल्कि यह नवगीत के भीतर ही यथार्थ चेतना से भरा, प्रतिरोध व संघर्ष चेतना से सम्पृक्त गीत है, जो लोक और मानव आकांक्षा को प्रबलता के साथ व्यक्त करता है। उसका पक्षधर है, उसके संघर्ष का साक्षी और संघर्ष का हथियार भी है। समय की माँग के अनुसार ही यह जनचेतना, मुक्ति की कामना, प्रतिरोध की आवाज काव्य में और लोक में उठती और बढ़ती है।
नचिकेता जी के आलेखों की एक दूसरी खासियत यह भी है कि वह अपनी आलोचना के कई पृष्ठ अपने समय में आए समवेत संकलन और आलोचनाओं की मान्यताओं को खारिज करने में व्यय कर देते हैं। इन मान्यताओं को कसौटी पर कसने और इनकी स्वीकृति अथवा अस्वीकृति की योग्यता की तार्किक विवेचना जरूरी है और नचिकेता जी यह करते भी हैं, किंतु इस महत्वपूर्ण तथ्य के प्रवाह में वे और अनावश्यक तत्व भी मिलाते हैं, जिससे उनकी वैज्ञानिक सोच वाले तार्किक निष्कर्ष भी कहीं व्यक्तिगत आक्षेप की तरह प्रस्तुत हुए-से लगते हैं। इससे महत्वपूर्ण और जरूरी तथ्य भी कहीं छूट जाने का डर बना रहता है।
डाॅ ओमप्रकाश सिंह इस धारा के तीसरे महत्वपूर्ण आलोचक व नवगीत कवि हैं। उन्होंने जहाँ नवगीत और नई कविता के तुलनात्मक अध्ययन के साथ 'नई सदी के नवगीत - नया मूल्यांकन' के संपादन एवं 'समकालीन नवगीत - अवधारणा और मूल्यबोध ' शीर्षक से आलोचना लिखी, वहीं इनका सबसे महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक काम 'नई सदी के नवगीत' (पांच खंडों) का संपादन है। ऊपर वर्णित सभी समवेत संकलनों में नवगीत कविता के डॉ. शंभुनाथ सिंह के नवगीत दशकों के बाद का अब तक का यह सबसे अधिक प्रामाणिक दस्तावेज है। इस काम का पूरा मूल्यांकन अभी तुरंत संभव न हो, तो भी एक स्पष्ट राय तो बनती ही है। इन पाँचों खंडों की भूमिका भी बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि इन्हीं भूमिकाओं में डॉ ओमप्रकाश सिंह की आलोचना दृष्टि से संपन्न नवगीत कविता की आलोचना देखी जा सकती है। इसी भूमिका में डाॅ. ओमप्रकाश सिंह ने नवगीत कविता का काल विभाजन भी किया है और इस कालविभाजन की अपनी दृष्टि को सही ठहराने के लिए उन्होंने अपने तर्क भी दिए हैं। इन पाँच खंडों की एक सीमा तो यह है, कि इनमें नवगीत कविता के कई महत्वपूर्ण नाम छूट गए हैं, इन महत्वपूर्ण नवगीत कवियों को इस श्रृंखला में होना चाहिए था। दूसरा शामिल नवगीत कवियों का क्रम भी तर्कसंगत नहीं है। इसका कारण संभवतः यह रहा हो कि प्रत्येक खंड में मात्र 15 नवगीत कवियों को लेने की सीमा के कारण सभी नवगीत कवि नहीं आ पाये। दूसरा बड़ा कारण यह भी है कि सभी पाँच खंडों की योजना एक साथ न बनने के कारण कुछ नये लोग तो ले लिए गये, किंतु कुछ वरिष्ठ नवगीत कवि छूट गये। एक और कारण समय पर सामग्री की अनुपलब्धता भी हो सकता है। किंतु, इन पाँचों खंडों की विशेषता और मजबूत पक्ष यह है कि, जैसा दूसरे सभी संकलनों में नवगीत और गीत कविता का कोई बड़ा भेद दिखाई नहीं पड़ता, सभी गीत कवि भी नवगीत कवियों में शामिल कर लिए गये हैं। ऐसा यहाँ नहीं है। 'नई सदी के नवगीत' के पाँच खंडों में नवगीत कवि और उनकी नवगीत कवितायें ही शामिल है। इसीलिए 'नई सदी के नवगीत', नवगीत दशकों के बाद नवगीत कविता के इतिहास में समग्रता के प्रयास का यह सबसे अधिक प्रामाणिक काम माना जाएगा। अभी डाॅ ओमप्रकाश सिंह के सम्पादन में साहित्य अकादमी से 101 नवगीत कवियों के नवगीतों का संग्रह 'समकालीन नवगीत कोश' आया है। इसकी भूमिका ने भी डाॅ ओमप्रकाश सिंह की आलोचना दृष्टि और नवगीत आलोचना को कुछ आगे बढ़ाया है।
डाॅ. रामसनेही लाल शर्मा यायावर का काम एक अलग दृष्टि से महत्वपूर्ण और उल्लेखनीय है। इन्होंने 'समकालीन गीत काव्य - संवेदना और शिल्प' तथा नवगीत- नए संदर्भ' नाम से दो समीक्षा ग्रंथ लिखे, वहीं एमेरिट्स फेलोशिप की परियोजना में' 'नवगीत कोश' नाम से एक महत्वपूर्ण शोधकार्य पूर्व किया। यह संपूर्ण शोधकार्य 'नवगीत कोश' के नाम से निखिल पब्लिशर्स एंड डिस्ट्रीब्यूटर्स, आगरा से प्रकाशित भी हो गया है। अब तक नवगीत के लिए किए गए ऐतिहासिक कार्यों में नवगीत कोश का प्रकाशन एक ऐतिहासिक घटना के रूप में भी देखा जा सकता है। नवगीत कोश की विशेषताओं में जहाँ एक तो यह है कि 640 पृष्ठों की इस पुस्तक में आरम्भ के 12 पृष्ठ, जिसमें प्रस्तावना के रूप में गीत की परिभाषा, गीत का स्वरूप, भारतीय गीत परम्परा, हिन्दी गीत परम्परत, गीत-आधुनिक युग की दहलीज पर, नवगीत-उद्भव और विकास, गीत और नवगीत, नवगीत और नई कविता, नवगीत का संवेदना-संसार, आभासी दुनिया में नवगीत, नवगीत का शिल्प-सौंदर्य, नवगीत का भविष्य - संभावनाओं की आहट 'इन बारह उपशीर्षकों के माध्यम से नवगीत कविता की एक पुष्ट प्रस्तावना प्रस्तुत की है, वहीं इसमें नवगीत - उद्भव और विकास' उप शीर्षक के अन्तर्गत नवगीत का काल विभाजन भी किया है। डाॅ यायावर ने नवगीत कविता के रचना समय का काल विभाजन करते हुए उसे
बीजवपन काल (1936-1954),
अंकुरण काल (1955-1965),
पल्लवन काल (1966-1980),
पुष्पन काल (1981-2000),
एवं सुफलन काल (इक्कीसवीं सदी) इन पाँच भागों में विभाजित किया है। कोश के द्वितीय खण्ड में पृष्ठ 125 से 266 तक अब तक प्रकाशित 681 एकल नवगीत संग्रहों की सूची उनके प्रकाशन वर्ष, प्रकाशक, पृष्ठ संख्या आदि के साथ दी गई है। इसी खण्ड के उपखण्ड में 66 समवेत संकलनों का परिचय उनके संपादक, शामिल रचनाकर, प्रकाशन वर्ष सहित यायावर जी की एक विशेष टिप्पणी के साथ दिया गया है। कोश का एक बड़ा हिस्सा पृष्ठ 315 से 466 तक नवगीतकारों के परिचय से समृद्ध है। इस खण्ड में नवगीत कवि का संक्षिप्त किन्तु लगभग पूरा परिचय दिया गया है। चतुर्थ खण्ड में नवगीत कविता की आलोचना - समीक्षा पर अब तक प्रकाशित - अप्रकाशित ग्रन्थों का परिचय दिया गया है। इसमें 103 प्रकाशित समीक्षा ग्रन्थों के साथ 75 अप्रकाशित समीक्षा ग्रन्थों का परिचय शामिल है। पृष्ठ 533 से 640 तक का पंचम खण्ड भी बहुत महत्वपूर्ण खण्ड है। इस खण्ड में एक साथ 30 नवगीत कवियों से साक्षात्कार के माध्यम से नवगीत कविता को जानने - समझने का महत्वपूर्ण कार्य किया गया है। इस तरह हम देखते हैं कि डॉ रामसनेही लाल शर्मा का यह शोध ग्रन्थ 'नवगीत कोश' नवगीत के सम्बन्ध में विपुल जानकारी के साथ एक आलोचना - दृष्टि और नवगीत को जानने - समझने के लिए जरूरी ग्रन्थ के रूप में आया है।
डाॅ यायावर का यह 'नवगीत कोश' भी सीमाओं से परे नहीं होगा। किन्तु, इसका मूल्यांकन समय करेगा। 'नवगीत के सृजन-सारथी' नाम से डाॅ. यायावर अब तक के सभी नवगीत कवियों पर एक-एक समग्र समीक्षात्मक आलेख लेकर भी एक ग्रन्थ का सम्पादन कर रहे हैं। इसके तीन खण्ड प्रकाशित हो रहे हैं। संभवतः इसके पाँच खण्ड आने हैं। इससे भी नवगीत कविता को समग्र रूप से समझने की दृष्टि मिलेगी।
बड़े समवेत संकलनों के संपादन में एक बड़ा काम डॉ निर्मल शुक्ल का भी है। शब्दायन, नवगीत - नई दस्तकें, शब्दपदी जैसे बड़े समवेत संकलनों के माध्यम से नवगीत कवियों को एक साथ लाने का बड़ा काम इन्होंने किया है। साथ ही डॉ वीरेंद्र आस्तिक की पुस्तक 'समीक्षा के नये आयाम' भी नवगीत आलोचना पर प्रकाशित हुई है। डॉ रणजीत पटेल ने 'सहयात्री समय के' नाम से नवगीत कविता का महत्वपूर्ण समवेत संकलन आया हैं। इनके अलावा और भी कई समवेत संकलन इस सदी में प्रकाशित हुए हैं, किन्तु इन सबमें किसी समग्र दृष्टि के दर्शन नहीं होते। ये 10 - 15 कवियों को लेकर प्रकाशित किए गए हैं। इसलिए इनके महत्व को नकारा तो नहीं जा सकता, किन्तु बहुत गहरी लाइन से रेखांकित भी नहीं किया जा सकता। यद्यपि नवगीत कविता के इतिहास में ये सदैव उल्लेखनीय रहेंगे।
अभी मधुकर अष्ठाना के आलोचनात्मक आलेखों का एक संग्रह 'नवगीत मूल्यबोध और प्रतिरोध' शीर्षक से आया है। इसके पहले इनकी नवगीत आलोचना पर 'नवगीत के विविध आयाम' और 'नवगीत की पृष्ठभूमि' भी आ चुकी है। इस श्रृंखला में कुमार रवीन्द्र के आलेखों का संकलन 'नवगीत की अस्मिता' उल्लेखनीय किताब है।
नवगीत पुस्तकों की समीक्षा और आलोचना का छिटपुट काम तो हो रहा है, किन्तु नवगीत - कविता की आलोचना को स्थापित होना अभी बाकी है। इस दिशा में नचिकेता, डाॅ. ओमप्रकाश सिंह और डॉ. रामसनेही लाल शर्मा 'यायावर' की मान्यताओं को लेकर आगे की संभावनाएँ निकल सकती हैं।
राजा अवस्थी
गाटरघाट रोड, आजाद चौक
कटनी - 483501 (मध्यप्रदेश)
मोबा. 9131675401
9617913287
Email - raja.awasthi52@gmail.com
नवगीत कविता - नई सदी का आलोचना परिदृश्य
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सन् 1958 में गीतांगिनी के प्रकाशन के साथ ही नवगीत पर एक आलोचना दृष्टि विकसित होने-करने का सूत्रपात हो गया था। उसके बाद कविता 64 में प्रकाशित आलेखों, पाँच जोड़ बांसुरी और नवगीत दशकों में नवगीत कवियों के दृष्टिबोध तथा उनके सम्पादक डाॅ शम्भुनाथ सिंह की भूमिकाओं से नवगीत कविता की आलोचना के सूत्र और उनको देखने-समझने की एक दृष्टि निकल रही थी। नवगीत दशकों के प्रकाशन के बाद ही सन्1984 में डॉ राजेंद्र गौतम का 'नवगीत - उद्भव और विकास' तथा 1985 मे डाॅ रमेश गौतम एवं डाॅ वीणा गौतम का नवगीत - इतिहास और उपलब्धि' प्रकाशित हुआ। उसके साथ ही सन् 1988 में डॉ शिवनारायण सिंह और उमाशंकर तिवारी के संपादन में 'नवगीत के प्रतिमान और आयाम' शीर्षक से बहुत महत्वपूर्ण समीक्षा ग्रंथ प्रकाशित हुआ। इसमें नवगीत के वे प्रतिमान और आयाम एक घोषणा पत्र के रूप में प्रकाशित किए गये, जो दशक योजना में शामिल नवगीत कवियों ने तय किए थे। इन्हीं आयामों और प्रतिमानों को आधार बनाकर इसे नवगीत आलोचना को एक दिशा देने की प्रबल कोशिश के रूप में इसे देखा जा सकता है।
बीसवीं सदी के अंतिम दो दशकों में नवगीत कविता की आलोचना पर बहुत काम हुआ। किंतु, 21वीं सदी में नवगीत की आलोचना पर, जो काम हुआ वह कई कारणों से महत्वपूर्ण है। एक तो यह कि इस सदी के आरम्भ के दो दशकों में ही कई समवेत संकलन प्रकाशित हुए, जिनके माध्यम से समग्र नवगीत कविता को और नवगीत कवियों को एक साथ समेटने का काम हुआ।इस सदी का आरम्भ होते-होते नवगीत कविता के एकल संग्रहों के रूप में शोध, समीक्षा - आलोचना के लिए विपुल सामग्री उपलब्ध होने के साथ विश्वविद्यालयों में शोध कार्य भी हो रहे हैं । दूसरा यह कि इन्हीं समवेत संकलनों की भूमिकाओं में इनके सम्पादकों ने नवगीत के इतिहास, नवगीत साहित्य के काल विभाजन का भी महत्वपूर्ण काम किया। इस तरह का काल विभाजन नचिकेता, डाॅ ओम प्रकाश सिंह एवं डाॅ रामसनेही लाल शर्मा 'यायावर' ने अपने मजबूत और वैज्ञानिक तर्कों के आधार पर किया है, किन्तु तीनों ही विद्वानों के काल विभाजन अलग-अलग हैं। चौथा यह कि इन विद्वानों की आलोचना दृष्टि को समझते हुए एक समग्र और संतुलित आलोचना दृष्टि विकसित होने की राह भी खुलती हैं। इनके अतिरिक्त डाॅ वीरेन्द्र आस्तिक (धार पर हम - दो) की भूमिका में भी नवगीत के तत्वों और समीक्षा पर गहराई से विचार किया है।
नचिकेता, डॉ राधेश्याम बंधु, डॉ ओमप्रकाश सिंह, डॉ निर्मल शुक्ल, डॉ रामसनेही लाल शर्मा यायावर, डाॅ वीरेंद्र आस्तिक, कुमार रवीन्द्र आदि नवगीत कवियों ने नवगीत की आलोचना पर काफी काम किया है। इन नवगीत कवियों का महत्वपूर्ण योगदान नवगीत कविताओं के समवेत संकलन निकालने के साथ नवगीत कविता के आरंभ से उसे उसके अत्यावश्यक तर्कसंगत वैज्ञानिक सोच के साथ यथार्थबोधी दृष्टि लेकर आलोचना एवं उसके तत्वों की विवेचना का है। किंतु, इनके अपने कार्यों को भी एक दूसरे के सापेक्ष देखें तो डॉ राधेश्याम बंधु ने 'नवगीत और उसका युगबोध' 2004 में अपने संपादन में प्रकाशित किया। यह ग्रंथ अपने आप में बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि नवगीत की मान्यताओं को लेकर, नवगीत की आलोचना को लेकर इस ग्रंथ में बहुत महत्वपूर्ण आलेख लिये गए हैं। जिनसे आलोचना को एक दिशा मिलती है। इसके बाद डॉ. राधेश्याम बंधु ने ही 'नवगीत के नए प्रतिमान', 'नवगीत का लोकधर्मी सौंदर्य', 'नवगीत का मानवतावाद' का संपादन भी किया और जहाँ इन संकलनों में देश भर के नवगीत कवियों के नवगीत शामिल किये, वहीं इनकी भूमिका एवं प्रथम खंड में कई बड़े-बड़े आलेख भी शामिल किये। डाॅ. राधेश्याम बंधु ने नवगीत कविता के चार समवेत संकलन संपादित किये। इनके पहले समवेत संकलन' नवगीत और उसका युगबोध' के बाद आए तीनों समवेत संकलनों में बंधु जी की एक विशेषता अति की सीमा तक मुखर हुई है। वह यह है, कि डॉ राधेश्याम बंधु ऐसा मानते हैं कि आदि से अंत तक नवगीत ने जो भी यात्रा की है, उसकी जो भी स्थापना हुई है, उसकी जितनी भी उपलब्धियां हैं, उनके सूत्रधार एकमात्र डॉ राधेश्याम बंधु जी ही हैं। उनकी इस मान्यता की आंधी में इन समवेत संकलनों की प्रमाणिकता भी उड़ जाती है।
नचिकेता समकालीन नवगीत-जनगीत के प्रबल पक्षधर हैं। इन्होंने पत्रिकाओं के संपादक व अपने द्वारा संपादित समवेत नवगीत संकलनों 'गीत वसुधा' व 'समकालीन गीत कोश'
की बहुत लंबी भूमिकाओं के साथ अतिरिक्त लेखन के रूप में भी आलोचना पर काम किया है।
'गीत रचना की नई जमीन' नवगीत कविता की आलोचना की महत्वपूर्ण पुस्तक है। अभी नचिकेता जी की नवगीत कविता - आलोचना की नयी पुस्तक 'प्रतिरोध में खड़ा समकालीन गीत' के नाम से श्वेतवर्णा प्रकाशन से आई है। यद्यपि इसमें शामिल लगभग सभी आलेख इनके संपादन में प्रकाशित समवेत संकलनों में अथवा कहीं और पहले ही शामिल हैं। फिर भी इनका एक साथ आना महत्वपूर्ण है। इनके आलोचनात्मक आलेखों में जहाँ नवगीत - जनगीत के उद्भव, विकास, रचनादृष्टि, संवेदना आदि पर बहुत गहराई से विचार करते हैं, वहीं एक बात सामान्य रूप से इनके आलेखों या कहें कि इनकी समीक्षा दृष्टि में मिलती है, वह यह है, कि ये नवगीत कविता को जनगीत के सापेक्ष दोयम दर्जे का ठहराते हैं। उल्लेखनीय यह भी है कि जनगीत कोई स्वतंत्र विधा नहीं, बल्कि यह नवगीत के भीतर ही यथार्थ चेतना से भरा, प्रतिरोध व संघर्ष चेतना से सम्पृक्त गीत है, जो लोक और मानव आकांक्षा को प्रबलता के साथ व्यक्त करता है। उसका पक्षधर है, उसके संघर्ष का साक्षी और संघर्ष का हथियार भी है। समय की माँग के अनुसार ही यह जनचेतना, मुक्ति की कामना, प्रतिरोध की आवाज काव्य में और लोक में उठती और बढ़ती है।
नचिकेता जी के आलेखों की एक दूसरी खासियत यह भी है कि वह अपनी आलोचना के कई पृष्ठ अपने समय में आए समवेत संकलन और आलोचनाओं की मान्यताओं को खारिज करने में व्यय कर देते हैं। इन मान्यताओं को कसौटी पर कसने और इनकी स्वीकृति अथवा अस्वीकृति की योग्यता की तार्किक विवेचना जरूरी है और नचिकेता जी यह करते भी हैं, किंतु इस महत्वपूर्ण तथ्य के प्रवाह में वे और अनावश्यक तत्व भी मिलाते हैं, जिससे उनकी वैज्ञानिक सोच वाले तार्किक निष्कर्ष भी कहीं व्यक्तिगत आक्षेप की तरह प्रस्तुत हुए-से लगते हैं। इससे महत्वपूर्ण और जरूरी तथ्य भी कहीं छूट जाने का डर बना रहता है।
डाॅ ओमप्रकाश सिंह इस धारा के तीसरे महत्वपूर्ण आलोचक व नवगीत कवि हैं। उन्होंने जहाँ नवगीत और नई कविता के तुलनात्मक अध्ययन के साथ 'नई सदी के नवगीत - नया मूल्यांकन' के संपादन एवं 'समकालीन नवगीत - अवधारणा और मूल्यबोध ' शीर्षक से आलोचना लिखी, वहीं इनका सबसे महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक काम 'नई सदी के नवगीत' (पांच खंडों) का संपादन है। ऊपर वर्णित सभी समवेत संकलनों में नवगीत कविता के डॉ. शंभुनाथ सिंह के नवगीत दशकों के बाद का अब तक का यह सबसे अधिक प्रामाणिक दस्तावेज है। इस काम का पूरा मूल्यांकन अभी तुरंत संभव न हो, तो भी एक स्पष्ट राय तो बनती ही है। इन पाँचों खंडों की भूमिका भी बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि इन्हीं भूमिकाओं में डॉ ओमप्रकाश सिंह की आलोचना दृष्टि से संपन्न नवगीत कविता की आलोचना देखी जा सकती है। इसी भूमिका में डाॅ. ओमप्रकाश सिंह ने नवगीत कविता का काल विभाजन भी किया है और इस कालविभाजन की अपनी दृष्टि को सही ठहराने के लिए उन्होंने अपने तर्क भी दिए हैं। इन पाँच खंडों की एक सीमा तो यह है, कि इनमें नवगीत कविता के कई महत्वपूर्ण नाम छूट गए हैं, इन महत्वपूर्ण नवगीत कवियों को इस श्रृंखला में होना चाहिए था। दूसरा शामिल नवगीत कवियों का क्रम भी तर्कसंगत नहीं है। इसका कारण संभवतः यह रहा हो कि प्रत्येक खंड में मात्र 15 नवगीत कवियों को लेने की सीमा के कारण सभी नवगीत कवि नहीं आ पाये। दूसरा बड़ा कारण यह भी है कि सभी पाँच खंडों की योजना एक साथ न बनने के कारण कुछ नये लोग तो ले लिए गये, किंतु कुछ वरिष्ठ नवगीत कवि छूट गये। एक और कारण समय पर सामग्री की अनुपलब्धता भी हो सकता है। किंतु, इन पाँचों खंडों की विशेषता और मजबूत पक्ष यह है कि, जैसा दूसरे सभी संकलनों में नवगीत और गीत कविता का कोई बड़ा भेद दिखाई नहीं पड़ता, सभी गीत कवि भी नवगीत कवियों में शामिल कर लिए गये हैं। ऐसा यहाँ नहीं है। 'नई सदी के नवगीत' के पाँच खंडों में नवगीत कवि और उनकी नवगीत कवितायें ही शामिल है। इसीलिए 'नई सदी के नवगीत', नवगीत दशकों के बाद नवगीत कविता के इतिहास में समग्रता के प्रयास का यह सबसे अधिक प्रामाणिक काम माना जाएगा।
डाॅ. रामसनेही लाल शर्मा यायावर का काम एक अलग दृष्टि से महत्वपूर्ण और उल्लेखनीय है। इन्होंने 'समकालीन गीत काव्य - संवेदना और शिल्प' तथा नवगीत- नए संदर्भ' नाम से दो समीक्षा ग्रंथ लिखे, वहीं एमेरिट्स फेलोशिप की परियोजना में' 'नवगीत कोश' नाम से एक महत्वपूर्ण शोधकार्य पूर्व किया। यह संपूर्ण शोधकार्य 'नवगीत कोश' के नाम से निखिल पब्लिशर्स एंड डिस्ट्रीब्यूटर्स, आगरा से प्रकाशित भी हो गया है। अब तक नवगीत के लिए किए गए ऐतिहासिक कार्यों में नवगीत कोश का प्रकाशन एक ऐतिहासिक घटना के रूप में भी देखा जा सकता है। नवगीत कोश की विशेषताओं में जहाँ एक तो यह है कि 640 पृष्ठों की इस पुस्तक में आरम्भ के 12 पृष्ठ, जिसमें प्रस्तावना के रूप में गीत की परिभाषा, गीत का स्वरूप, भारतीय गीत परम्परा, हिन्दी गीत परम्परत, गीत-आधुनिक युग की दहलीज पर, नवगीत-उद्भव और विकास, गीत और नवगीत, नवगीत और नई कविता, नवगीत का संवेदना-संसार, आभासी दुनिया में नवगीत, नवगीत का शिल्प-सौंदर्य, नवगीत का भविष्य - संभावनाओं की आहट 'इन बारह उपशीर्षकों के माध्यम से नवगीत कविता की एक पुष्ट प्रस्तावना प्रस्तुत की है। इसमें नवगीत - उद्भव और विकास' उप शीर्षक के अन्तर्गत नवगीत का काल विभाजन भी किया है। डाॅ यायावर ने नवगीत कविता को बीजवपन काल (1936-1954),अंकुरण काल (1955-1965),पल्लवन काल (1966-1980),पुष्पन काल (1981-2000),एवं सुफलन काल (इक्कीसवीं सदी) इन पाँच भागों में विभाजित किया है। कोश के द्वितीय खण्ड में पृष्ठ 125 से 266 तक अब तक प्रकाशित 681 एकल नवगीत संग्रहों की सूची उनके प्रकाशन वर्ष, प्रकाशक, पृष्ठ संख्या आदि के साथ दी गई है। इसी खण्ड के उपखण्ड में 66 समवेत संकलनों का परिचय उनके संपादक, शामिल रचनाकर, प्रकाशन वर्ष सहित यायावर जी की एक विशेष टिप्पणी के साथ दिया गया है। कोश का एक बड़ा हिस्सा पृष्ठ 315 से 466 तक नवगीतकारों के परिचय से समृद्ध है। इस खण्ड में नवगीत कवि का संक्षिप्त किन्तु लगभग पूरा परिचय दिया गया है। चतुर्थ खण्ड में नवगीत कविता की आलोचना - समीक्षा पर अब तक प्रकाशित - अप्रकाशित ग्रन्थों का परिचय दिया गया है। इसमें 103 प्रकाशित समीक्षा ग्रन्थों के साथ 75 अप्रकाशित समीक्षा ग्रन्थों का परिचय शामिल है। पृष्ठ 533 से 640 तक का पंचम खण्ड भी बहुत महत्वपूर्ण खण्ड है। इस खण्ड में एक साथ 30 नवगीत कवियों से साक्षात्कार के माध्यम से नवगीत कविता को जानने - समझने का महत्वपूर्ण कार्य किया गया है। इस तरह हम देखते हैं कि डॉ रामसनेही लाल शर्मा का यह शोध ग्रन्थ 'नवगीत कोश' नवगीत के सम्बन्ध में विपुल जानकारी के साथ एक आलोचना - दृष्टि और नवगीत को जानने - समझने के लिए जरूरी ग्रन्थ के रूप में आया है।
डाॅ यायावर का यह 'नवगीत कोश' भी सीमाओं से परे नहीं होगा। किन्तु, इसका मूल्यांकन समय करेगा।
बड़े समवेत संकलनों के के संपादन में एक बड़ा काम डॉ निर्मल शुक्ल का भी है। शब्दायन, नवगीत - नई दस्तकें, शब्दपदी जैसे बड़े समवेत संकलनों के माध्यम से नवगीत कवियों को एक साथ लाने का बड़ा काम इन्होंने किया है। साथ ही डॉ वीरेंद्र आस्तिक की पुस्तक 'समीक्षा के नये आयाम' भी नवगीत आलोचना पर प्रकाशित हुई है। डॉ रणजीत पटेल ने 'सहयात्री समय के' नाम से नवगीत कविता का महत्वपूर्ण समवेत संकलन आया हैं। इनके अलावा और भी कई समवेत संकलन इस सदी में प्रकाशित हुए हैं, किन्तु इन सबमें किसी समग्र दृष्टि के दर्शन नहीं होते। ये 10 - 15 कवियों को लेकर प्रकाशित किए गए हैं। इसलिए इनके महत्व को नकारा तो नहीं जा सकता, किन्तु बहुत गहरी लाइन से रेखांकित भी नहीं किया जा सकता। यद्यपि नवगीत कविता के इतिहास में ये सदैव उल्लेखनीय रहेंगे।
अभी मधुकर अष्ठाना के आलोचनात्मक आलेखों का एक संग्रह 'नवगीत मूल्यबोध और प्रतिरोध' शीर्षक से आया है। इसके पहले इनकी नवगीत आलोचना पर 'नवगीत के विविध आयाम' और 'नवगीत की पृष्ठभूमि' भी आ चुकी है। इस श्रृंखला में कुमार रवीन्द्र के आलेखों का संकलन 'नवगीत की अस्मिता' उल्लेखनीय किताब
नवगीत पुस्तकों की समीक्षा और आलोचना का छिटपुट काम तो हो रहा है, किन्तु नवगीत - कविता की आलोचना को स्थापित होना अभी बाकी है। इस दिशा में नचिकेता, डाॅ. ओमप्रकाश सिंह और डॉ. रामसनेही लाल शर्मा 'यायावर' की मान्यताओं को लेकर आगे की संभावनाएँ निकल सकती हैं।
राजा अवस्थी
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मोबा. 9131675401
9617913287
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