पेड़ हैं मधुमास है लिपटा हुआ
घनीं होती जा रहीं परछाइंया
किस प्रलय की प्रतीक्षा में
नाव पर मनु रुक गए
रथ अभी भी अश्वकन्धों पर चढ़ा;
यात्रा रुकनीं नहीं ,बस
भ्रम हुआ विश्राम का
अभी तो सूरज गगन पर ही चढ़ा;
सारथी रे चेतना मत छोड़ना
पथ लिए बैठा बहुत कठिनाइयां.
सफलता की एक चिंगारी
कहाँ तक ले गई
शिखर के अभिमान में अंधे रहे;
गिरे मुंह के बल ,नहीं टूटा
भरम दिनमान का
बांग देने के वही धंधे रहे;
छिद्र अन्वेषण हुनर की मस्तियाँ
ले रहीं जब तब यहाँ ऊख़ाआईञँ.
छूटती साँसें भभूके सी
धमनियां हांफती हैं
जल रहे मन का तनिक सा ताप हैं;
आस्था को रौंदता पल-पल
प्रगति का कहकहा
बांटता पथ आ रहा संताप है.
घनीं होती जा रहीं परछाइंया
किस प्रलय की प्रतीक्षा में
नाव पर मनु रुक गए
रथ अभी भी अश्वकन्धों पर चढ़ा;
यात्रा रुकनीं नहीं ,बस
भ्रम हुआ विश्राम का
अभी तो सूरज गगन पर ही चढ़ा;
सारथी रे चेतना मत छोड़ना
पथ लिए बैठा बहुत कठिनाइयां.
सफलता की एक चिंगारी
कहाँ तक ले गई
शिखर के अभिमान में अंधे रहे;
गिरे मुंह के बल ,नहीं टूटा
भरम दिनमान का
बांग देने के वही धंधे रहे;
छिद्र अन्वेषण हुनर की मस्तियाँ
ले रहीं जब तब यहाँ ऊख़ाआईञँ.
छूटती साँसें भभूके सी
धमनियां हांफती हैं
जल रहे मन का तनिक सा ताप हैं;
आस्था को रौंदता पल-पल
प्रगति का कहकहा
बांटता पथ आ रहा संताप है.