Friday, 11 January 2013
GEET
अंत हीन पीड़ा का
अंतहीन व्यास है
सपनीली आँखों के
स्वप्न कब मरे ;
याद नहीं मधु तरु के
पात कब झरे ;
बरसों से पतझर का
अब निवास है .
नदियाँ सब सूख गईं
मरुथल विस्तार बढ़ा ;
सूरज अंगार बना
माथे पर चढ़ा खड़ा ;
तेज़ धुप गर्म हवा
आसपास है।
सच के सब सूत्रधार
बिक गए प्रधान हुए ;
राजा के चाटुकार
राज्य के जवान हुए ;
गावों का क्रांतिवीर
आज निरा दास है।
भर्राए कंठ लिए
दर्द तुझे गाना है;
बेढंगी बस्ती में
गीत को बचाना है।
निश्छल विश्वासों का
झरना तो पास है।
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