Friday, 11 January 2013

GEET

      अंत हीन पीड़ा का
      अंतहीन   व्यास है 

      सपनीली आँखों के 
      स्वप्न कब  मरे ;
     याद नहीं मधु तरु के
      पात कब झरे ;

      बरसों से पतझर  का
      अब निवास है .

      नदियाँ सब सूख गईं 
      मरुथल विस्तार बढ़ा ;
      सूरज अंगार बना 
      माथे पर चढ़ा खड़ा ;

      तेज़ धुप गर्म हवा 
      आसपास है।

      सच के सब सूत्रधार 
      बिक गए  प्रधान  हुए ;
      राजा के चाटुकार 
      राज्य के जवान हुए ;

      गावों का क्रांतिवीर 
      आज निरा दास है।

      भर्राए कंठ लिए 
      दर्द  तुझे गाना  है;
      बेढंगी बस्ती में 
      गीत को बचाना है।

      निश्छल विश्वासों का 
      झरना तो पास है। 




3 comments:

  1. निराशा के बीच आशा की किरन -
    निश्छल विश्वासों का
    झरना तो पास है।

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  2. भर्राए कंठ लिए
    दर्द तुझे गाना है;
    बेढंगी बस्ती में
    गीत को बचाना है।-------
    जीवन जीने का सच,सुंदर गहन अनुभूति
    बधाई

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  3. भाई ज्योति खरे जी, भाई शरद जायसवाल जी मै आपका हृदय से आभारी हूँ एवम् ब्लाग में आपका स्वागत करता हूँ ।

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