सुबह, दोपहर,शाम घेरे रहेंगे .
अभी और कब तक अँधेरे रहेंगे.
हमीं ज्ञान के दूत जागे नहीं तो;
उजाला करे क्या,जो भागे नहीं तो;
प्रगति की कोई राह मिलनी नहीं है
अकर्मण्यता को जो त्यागे नहीं तो;
तुम्हारे ही बच्चे दिखा देंगे दर्पण,
उन्हें घेरे हर पल अँधेरे रहेंगे.
यहाँ जागरण की मिशालें कई हैं;
निकलती यहाँ कोपलें नित नई हैं;
संजोकर इन्हीं कोपलों को दिखानी,
सीढ़ी सफलता की ऊँची कई हैं;
चढ़ा पाए सबको शिखर पर अगर तो,
सुनहरे - सुनहरे सबेरे रहेंगे.
अगर नीर तुमने उलीचा नहीं तो;
नई पौध को तुमने सींचा नहीं तो;
हाथों का तेरे हुनर फिर वृथा है,
अशिक्षा का परदा जो खींचा नहीं तो;
न दे पाए मोती अगर ज्ञान के तो ,
रतन फिर न तेरे न मेरे रहेंगे .
अँधेरा नहीं होगा अज्ञानता का ;
कुविचार, आलस, अकर्मण्यता का;
विकसित,प्रगतिशील मानस बनेगा,
न होगा कहीं दृश्य फिर दैन्यता का;
धरा पर प्रभावान भारत बनेगा,
सुघढ़ देश शिल्पी उकेरे रहेंगे.
अभी और कब तक अँधेरे रहेंगे.
हमीं ज्ञान के दूत जागे नहीं तो;
उजाला करे क्या,जो भागे नहीं तो;
प्रगति की कोई राह मिलनी नहीं है
अकर्मण्यता को जो त्यागे नहीं तो;
तुम्हारे ही बच्चे दिखा देंगे दर्पण,
उन्हें घेरे हर पल अँधेरे रहेंगे.
यहाँ जागरण की मिशालें कई हैं;
निकलती यहाँ कोपलें नित नई हैं;
संजोकर इन्हीं कोपलों को दिखानी,
सीढ़ी सफलता की ऊँची कई हैं;
चढ़ा पाए सबको शिखर पर अगर तो,
सुनहरे - सुनहरे सबेरे रहेंगे.
अगर नीर तुमने उलीचा नहीं तो;
नई पौध को तुमने सींचा नहीं तो;
हाथों का तेरे हुनर फिर वृथा है,
अशिक्षा का परदा जो खींचा नहीं तो;
न दे पाए मोती अगर ज्ञान के तो ,
रतन फिर न तेरे न मेरे रहेंगे .
अँधेरा नहीं होगा अज्ञानता का ;
कुविचार, आलस, अकर्मण्यता का;
विकसित,प्रगतिशील मानस बनेगा,
न होगा कहीं दृश्य फिर दैन्यता का;
धरा पर प्रभावान भारत बनेगा,
सुघढ़ देश शिल्पी उकेरे रहेंगे.
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