संदेह कोई भी क्यों निवारा नहीं गया.
नेह भरे स्वर में पुकारा नहीं गया .
घुमड़े हैं कब से मेह यहाँ पर अशांति के ;
भटके हुए जहाँ हैं,वहाँ वन हैं भ्रान्ति के;
सब ठीक-ठाक होता भी कैसे तुम्ही कहो,
वातावरण हृदय से सुधारा नहीं गया.
प्रश्नों के बवंडर ही हमें पालते रहे;
हम हल भी लगातार ही निकलते रहे;
जैसा गया पढ़ाया वही,पर्चे में लिखा,
उत्तर सही कोई क्यों हमारा नहीं गया.
खुशियों के बीज लगातार बोते रहे हम;
आठ पहर नित्य होम होते रहे हम;
यहाँ के मौसम को अनुकूल बनाने
शान्ति मंत्र मन से उचारा नहीं गया.
आँधियों का देश जहाँ जा रहे हैं हम;
नहीं अमन राग,जिसे गा रहे हैं हम;
लौटें चलो वहीँ,सुनहरा देश हमारा,
हमसे अभी भी दूर किनारा नहीं गया.
No comments:
Post a Comment