Saturday, 24 December 2011

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               संदेह कोई भी क्यों निवारा नहीं गया.
               नेह भरे स्वर में पुकारा नहीं गया .

               घुमड़े  हैं कब से मेह यहाँ पर अशांति के ;
               भटके हुए जहाँ हैं,वहाँ वन हैं भ्रान्ति के;
               सब ठीक-ठाक होता भी कैसे तुम्ही कहो,
               वातावरण हृदय से सुधारा नहीं गया.

               प्रश्नों  के बवंडर ही हमें पालते रहे;
               हम हल भी लगातार ही निकलते रहे;
               जैसा गया पढ़ाया वही,पर्चे में लिखा,
               उत्तर सही कोई क्यों हमारा नहीं गया.

               खुशियों के बीज लगातार बोते रहे हम;
               आठ पहर नित्य होम होते रहे हम;
               यहाँ के मौसम को अनुकूल बनाने
               शान्ति मंत्र मन से उचारा नहीं गया.

               आँधियों का देश जहाँ जा रहे हैं हम;
               नहीं अमन राग,जिसे गा रहे हैं हम;
               लौटें चलो वहीँ,सुनहरा देश हमारा,
               हमसे अभी भी दूर किनारा नहीं गया.

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