बेशक नही रहा वह अपना
उन्नत गाँव हुआ
घनी पत्तियों वाला
कैसा छितरी-छाँव हुआ .
रहे नहीं अपनों के अपने
टूट गए सपने ;
जाकर शहर गाँव कब लौटे
लखटक से टखने ;
कुछ तो हाथ बंटा लेते
उन्नति की गति बढ़ती
कुछ खोने -पाने की चौसर
अपना दाव हुआ .
सड़क बनी बिजली भी आई
बंद कुनैते हैं ;
पत्थर की चकिया को दादी
घर में सेंथे है ;
बाबा शिखर संस्कारों के
पोते हडबड़गामी ,
परम्परा आधुनिकता का
यूँ उलझाव हुआ .
खेती के रकबे ने बढ़कर
लीले सभी चरोखर ;
भीतर का पानी पाताली
ऊपर सूखे पोखर ;
सुरसा हुई भूख स्वारथ की
रिश्तों पर फन मारे ,
लाभ -हानि के गुणा -भाग में
जोड़ -घटाव हुआ .
अनपढ़ बस्ती के कुछ बच्चे
लगें बाँचने आखर ;
भूमिहीन बरुआ के घर भी
आ जाएँ हल-बाखर ;
अंधियारे में उम्मीदों के
उंजियारे रोपे ,
समय, भंवर में डगमग करती
जर्जर नाव हुआ .
उन्नत गाँव हुआ
घनी पत्तियों वाला
कैसा छितरी-छाँव हुआ .
रहे नहीं अपनों के अपने
टूट गए सपने ;
जाकर शहर गाँव कब लौटे
लखटक से टखने ;
कुछ तो हाथ बंटा लेते
उन्नति की गति बढ़ती
कुछ खोने -पाने की चौसर
अपना दाव हुआ .
सड़क बनी बिजली भी आई
बंद कुनैते हैं ;
पत्थर की चकिया को दादी
घर में सेंथे है ;
बाबा शिखर संस्कारों के
पोते हडबड़गामी ,
परम्परा आधुनिकता का
यूँ उलझाव हुआ .
खेती के रकबे ने बढ़कर
लीले सभी चरोखर ;
भीतर का पानी पाताली
ऊपर सूखे पोखर ;
सुरसा हुई भूख स्वारथ की
रिश्तों पर फन मारे ,
लाभ -हानि के गुणा -भाग में
जोड़ -घटाव हुआ .
अनपढ़ बस्ती के कुछ बच्चे
लगें बाँचने आखर ;
भूमिहीन बरुआ के घर भी
आ जाएँ हल-बाखर ;
अंधियारे में उम्मीदों के
उंजियारे रोपे ,
समय, भंवर में डगमग करती
जर्जर नाव हुआ .
NICE POEM ...,
ReplyDeleteHardik aabhar aadarniya sharma ji.
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