Sunday, 5 May 2013

chhitaree chhanw huaa

बेशक नही रहा वह अपना
उन्नत गाँव हुआ
घनी पत्तियों वाला
कैसा छितरी-छाँव हुआ .

रहे नहीं अपनों के अपने
टूट गए सपने ;
जाकर शहर गाँव कब लौटे
लखटक से टखने ;

कुछ तो हाथ बंटा लेते
उन्नति  की गति बढ़ती
कुछ खोने -पाने की चौसर
अपना दाव हुआ .

सड़क बनी बिजली भी आई
बंद कुनैते हैं ;
पत्थर की चकिया को दादी
घर में सेंथे है ;

बाबा शिखर संस्कारों के
पोते  हडबड़गामी ,
परम्परा आधुनिकता का
यूँ उलझाव हुआ .

खेती के रकबे ने बढ़कर
लीले सभी चरोखर ;
भीतर का पानी पाताली
ऊपर सूखे पोखर ;

सुरसा  हुई भूख स्वारथ की
रिश्तों पर फन मारे ,
लाभ -हानि के गुणा -भाग में
जोड़ -घटाव हुआ .

अनपढ़ बस्ती के कुछ बच्चे
लगें बाँचने  आखर ;
भूमिहीन  बरुआ के घर भी
आ जाएँ हल-बाखर ;

अंधियारे में उम्मीदों के
उंजियारे रोपे ,
समय, भंवर में डगमग करती
जर्जर नाव हुआ .


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