पढ़ता मन्त्र सुआ
संविधान के परिभाषण मेंपढ़ता मन्त्र सुआ
भारत गणतंत्र हुआ
सभाभवन का शोर-शराबा
दुनिया देख रही
खोज रहे हैं, कभी यहाँ क्या
उजली रेख रही
अभियानों में, घोषणाओं में
यात्राओं में व्यस्त रहे
कोरी उम्मीदों का उत्सव
अपना तंत्र हुआ
नीचे से ऊपर तक ऐसी
हुई व्यवस्था ही
पथ ने ही पथ ठगा निरंतर
अनपढ़ बस्ता ही
दशरथ गलत मंत्रणा पर
भटके, विश्वाश किया
अवध उलझता गया जाल में
भ्रष्ट सुमन्त्र हुआ
द्वार किले के खोल दिए
प्रांगण बाजार हुआ
बिकना और बेचना सब
स्वीकृत दरबार हुआ
थोप रहे शर्तों पर शर्तें
बनिए हाकिम -से
लदा हुआ शतों से राजा
ज्यों परतंत्र हुआ
सुविधाएँ अधिकार हुईं
कर्तव्य काम से लुका -छिपी
ऐसा पाठ पढ़ा कि सारी
स्लेटें बिगड़ी पुती-लिपी
पाखंडों,अंधे विश्वासों
को नित पोस रहे
अकर्मण्यता का चिंतन
उपदेशे संत सुआ
दफ्तर में स्वीकृत आवेदन
सारे के सारे
दबा दिए बाबू ने या फिर
रद्दी में जारे
फिर ले लेगी पुनः प्रक्रिया
उम्र ये बची खुची
वैधानिकता का ऐसा ही
विकसित तंत्र हुआ
वे जो बोलें स्वस्ति वचन हैं
सामवेद गायन उनके
पदचिन्हों से पथ बन जाएँ
ऐसे भरम जाल जिनके
सभा प्रयाग, प्रवास तपोवन
आप तपस्वी हैं
उनके वाक्य ऋचाएं
उनका अक्षर मन्त्र हुआ
उत्तम रचना है।
ReplyDeleteसादर धन्यवाद आदरणीय तिवारी जी।
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