Friday, 22 December 2017

मैं कैकेयी बोलती (दोहे) - 1

मैं कैकेयी बोलती
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दिए गए आवेश में,
वर निकले गलफाँस।
फिर उनमें ऐसी फँसी,
लौट न पाई साँस।।

यह केवल आसक्ति थी,
या वचनों का जाल।
जिसने यों बेबस किया,
मानी प्राण निकाल।।

राम गए वन भरत भी,
बैठे नंदीग्राम।
मैं कैकेयी महल में,
रही पराजित काम।।

मेरे सत पर कलुष का,
चिपक गया है नाम।
परिभाषायें उलट कर,
गया एक परिणाम।।

अनुचित मेरी माँग थी,
वीर पुरुष थे राम।
निष्कासन फिर सिया का,
लोकरंजनी काम।।

कैकेयी ने जो किया,
हुआ अधम वह कर्म।
निर्णय प्यारे राम का,
साबित क्यों सत्कर्म।।

उनको पावन कर गई,
प्रायश्चित की आग।
जली उम्र भर अनल में,
मिटा न तिल भर दाग।।

राजा अवस्थी, कटनी
22/12/2017
9617913287


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