जिन्दगी ने बहुत सुविधाएँ जुटा लीं .
फटे जूते अंगौछे बिन
खेत पर होंगे पिताजी
मुरहरे में दाल अम्मा पकातीं होंगी;
हर सुबह,दोपहर, संध्या
कोंख जाये को सुमिरती
यशोदा की रीति, गाती-निभाती होंगी;
नहीं छूटी पिताजी की भी कुदाली.
एक तन पर शव बहुत हैं
शहर है, उत्सव बहुत हैं
ओढ़ना,खाना,पहनना,जर जुटाना है;
अहर्निश ये व्यस्तताएं
मिटातीं संवेदनाएँ
बहुत थोड़ा पा,बहुत कुछ भूल जाना है;
लोग अपने जब मिले,नजरें झुका लीं.
अब कहाँ वे द्वार-आँगन
वहाँ की किलकारियां
शहर में बस एक कमरा चीखता है;
कहाँ दुलराना सुलाना
लोरियाँ गाना सुनाना
खीझती माँ ,तनावों का घर पिता है;
यंत्रणा की नदी में क्यों नाव डाली.
फटे जूते अंगौछे बिन
खेत पर होंगे पिताजी
मुरहरे में दाल अम्मा पकातीं होंगी;
हर सुबह,दोपहर, संध्या
कोंख जाये को सुमिरती
यशोदा की रीति, गाती-निभाती होंगी;
नहीं छूटी पिताजी की भी कुदाली.
एक तन पर शव बहुत हैं
शहर है, उत्सव बहुत हैं
ओढ़ना,खाना,पहनना,जर जुटाना है;
अहर्निश ये व्यस्तताएं
मिटातीं संवेदनाएँ
बहुत थोड़ा पा,बहुत कुछ भूल जाना है;
लोग अपने जब मिले,नजरें झुका लीं.
अब कहाँ वे द्वार-आँगन
वहाँ की किलकारियां
शहर में बस एक कमरा चीखता है;
कहाँ दुलराना सुलाना
लोरियाँ गाना सुनाना
खीझती माँ ,तनावों का घर पिता है;
यंत्रणा की नदी में क्यों नाव डाली.
सच को उजागर करती marmik रचना
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