Wednesday, 14 March 2018

साकेत (द्वितीय सर्ग - 2)

20/02/2018
सादर सुप्रभात, वंदन, अभिनंदन, नमन

राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त कृत
                 साकेत

द्वितीय सर्ग
(गतांक से आगे)

"सोच है मुझको निस्संदेह,
भरत जो है मामा के गेह।
सफल करके निज निर्मल-दृष्टि,
देख वह सका न यह सुख - सृष्टि! "
ठोंककर अपना क्रूर- कपाल,
जताकर यही कि फूटा भाल,
किंकरी ने तब कहा तुरंत -
" हो गया भोलेपन का अन्त! "
न समझी कैकेयी यह बात,
कहा उसने -" यह क्या उत्पात?
वचन क्यों कहती है तू वाम?
नहीं क्या मेरा बेटा राम ? "
'और वे औरस भरत कुमार ;"
कुदासी बोली कर फटकार।
कहा रानी ने पाकर खेद -
"भला दोनों में क्या है भेद? "
" भेद? "-दासी ने कहा सतर्क -
" सबेरे दिखला देगा अर्क।
राजमाता जब होंगी एक,
दूसरी देखेंगी अभिषेक! "
रोककर कैकेयी ने रोष,
कहा -" देती है किसको दोष?
राम की माँ क्या कल या आज,
कहेगा मुझे न लोक - समाज? "

क्रमशः -

प्रस्तुति - राजा अवस्थी 

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