Friday, 16 March 2018

साकेत (द्वितीय सर्ग - 3)

21/02/2018
सादर सुप्रभात, वंदन, अभिनंदन, नमन

राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त कृत
          साकेत
द्वितीय सर्ग (3)
गतांक से आगे

कहा दासी ने धीरज त्याग -
"लगे इस मेरे मुँह में आग।
मुझे क्या? मैं होती हूँ कौन ?
नहीं रहती हूँ फिर क्यों मौन ?
देखकर किन्तु स्वामि-हित-घात,
निकल ही जाती है कुछ बात।
इधर भोली हैं जैसी आप,
समझती वैसी सबको आप।
नहीं तो यह सीधा षड़यंत्र,
रचा क्यों जाता यहाँ स्वतन्त्र,
महारानी कौसल्या आज,
सहज सज लेतीं क्या सब साज ? "
कहा रानी ने -" क्या षड़यंत्र ?
वचन हैं तेरे मायिक मन्त्र।
हुई जाती हूँ मैं उद्भ्रान्त,
खोलकर कह तू सब वृत्तांत।
मन्थरा ने फिर ठोका भाल -
"शेष है अब भी क्या कुछ हाल ?
सरलता भी ऐसी है व्यर्थ ?
समझ जो सके न आर्थानर्थ।
भरत को करके घर से त्याज्य,
राम को देते हैं नृप राज्य।
भरत - से सुत पर भी संदेह,
बुलाया तक न उन्हें जो गेह ! "

क्रमश :

प्रस्तुति - राजा अवस्थी



No comments:

Post a Comment