' किंबहुना' स्त्री संघर्ष की कथा
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राजा अवस्थी
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राजा अवस्थी
ए. असफल अपनी कहानियों और उपन्यासों के कथानक अपने समय और समाज से उठाने वाले लेखकों में गिने जाते हैं।उनका नवीनतम उपन्यास 'किंबहुना' अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष का उद्घोष करती, संघर्ष करती स्त्री की कथा है। बहुत जाने-माने चेहरों और स्थानों के बीच विकसित हुई इस कथा में यह बेहद शातिराना यानी कार्पोरेटिया किस्म का उद्घोष है। इसमें कहीं आपको तीखा आक्रोश या उबलते विद्रोह जैसी बात नहीं दिखेगी, बल्कि 'किंबहुना' की नायिका आरती कुलश्रेष्ठ आपको कहीं दमित, शोषित या बेचारी - सी भी लग सकती है। किन्तु, थोड़ा ठहरकर देखते हैं, तो पाते हैं कि आरती आरम्भ से ही बहुत ठण्डेपन से किन्तु लगातार विद्रोह करती हुई और अपने ही चाहे पथ पर बढ़ने वाली स्त्री है। उसका यही तेवर और शैली अन्त तक बनी रहती है। जिन दिनों वह आलम से प्रेम विवाह करती है, तब भी उनके बीच प्रेम जैसी या देह के सुख जैसी भी कोई चीज दिखती नहीं। विवाह के बाद भी कभी प्रेम के उन्माद में वे टूटकर मिले हों, "ऐसा कोई संकेत तक उपन्यास में नहीं है, बल्कि आरती के लिए वह एक कैद से अधिक कुछ नहीं था।
कथा जब आगे बढ़ती है, तो अपने स्वाभाविक विकासक्रम में आरती और आलम के तलाक प्रकरण पर आती है। इस बीच आरती की नौकरी पर संकट और भरत मेश्राम से मुलाकात के बाद उन दोनों का लिव इन जैसे रिश्ते की तरह साथ आना घटित होता है, किन्तु भरत का अपनी ब्याहता पत्नी से तलाक का केस खारिज़ हो जाता है और भरत के साथ आगे सम्मानजनक संभावनायें न देखकर आरती भरत से अपनी सगाई एक झटके में तोड़ देती है। भरत का धनाड्य और प्रभावशाली परिवार से होना आरती को सुरक्षा देने में सक्षम है, किन्तु स्वतंत्रता की जो चेतना आरती के भीतर पहले से ही है, उसको बचाने के लिए वह मेश्राम परिवार से भिड़ जाती है। भरत की माँ, बहन, खुद भरत के द्वारा भी यह याद दिलाने के बावज़ूद कि'अब तक तो कितने करम-कुकरम किए! और पति-पत्नी की तरह रहे। फिर, अब क्या हो गया? "वह भरत से फिर देह का कोई रिश्ता नहीं बनाती। संघर्ष के इस मोड़ पर आरती की जिन्दगी में कार्पोरेट जगत के शातिर शीतल का प्रवेश होता है। शीतल के बल पर ही वह भरत मेश्राम जैसे मगरमच्छ से भी निपट लेती है।
इस पूरे प्रकरण के लिए उपन्यासकार अपनी कथा का ताना-बाना बुनने के लिए जिस सूत्र का इस्तेमाल करता है, वह बिलकुल नया और आधुनिक है। पिछले कुछ सालों यानी 2-4 सालों में सोशल मीडिया
और उस पर वाट्सएप शहरी मध्यमवर्ग के बीच छाया हुआ है। यहाँ बहुत सारे सम्बन्ध - सम्पर्क वाट्सएप पर ही बन-बिगड़ और निभ रहे हैं। 'किंबहुना' का उल्लेखनीय तथ्य व तत्व यह भी है कि लेखक ने सोशल साइट्स के द्वारा कथा सूत्रों का विकास इस तरह से किया है कि ऐसा लगता है जैसे यह इस तरह के अलावा किसी और तरह से हो ही नहीं सकता था।
'किंबहुना' की कथा को तीन भागों में बाँटकर देखा जा सकता है। इसका पहला भाग एस टी डी बूथ पर पनपता है, जबकि दूसरा और तीसरा भाग पूरी तरह वाट्सएप के माध्यम से आगे बढ़ते हैं। दूसरे भाग में भरत मेश्राम से वाट्सएप पर बातचीत और आरती की समस्या के समाधान के साथ ही होटल में भरत के लिए आरती का देह - समर्पण! तीसरे भाग में वाट्सएप पर शीतल के साथ कविताओं का, बातचीत का और प्रेमालाप का लम्बा सिलसिला है। आरती के भरत से अलग होने के प्रकरण में दूर बैठे शीतल के द्वारा निर्णायक भूमिका निभाना उसे आरती के बहुत निकट ले आता है। अब तक उनकी आमने-सामने की मुलाकात नहीं हुई। तभी आरती को एक साहित्यिक सम्मान के लिए जयपुर जाना होता है, उधर से शीतल भी पहुँच जाता है। यात्रा के अंतिम दिन आरती शीतल को भी स्वयं को सौंप देती है और यह सोचती है कि बहुत एहसान हैं शीतल के मुझ पर, इस तरह मैं भी कुछ हल्की हो जाऊँगी। यानी इस एहसान के बदले देह! और जैसे उसे पहले से ही मालुम भी है कि इन मेहरवानियों की परिणति यही होना है। भरत के सम्बन्ध में भी वह यही सोचती है कि मेरा साथ दिया तो पूरी कीमत भी वसूल ली।
'किंबहुना' वर्तमान समाज में निरन्तर बढ़ती जा रही स्वार्थ की प्रवृत्ति के साथ स्त्री और पुरुष के सम्बन्धों की पड़ताल करता उपन्यास है। आरती अपने आॅफिसियल संकट से निपटने में भरत से सहायता लेती है और भरत को एक स्त्री देह की जरूरत है, जो उसे आरती के रूप में मिल जाती है। भरत से मुक्ति के लिए शीतल आता है, उसे भी एक स्त्री देह की जरूरत है। यह उपन्यास यौनिक शुचिता की अवधारणा को तोड़ता हुआ आगे बढ़ता है। यहाँ ये यौन सम्बन्ध बहुत सहज रूप में घटित होते हैं। कहीं किसी के मन में कोई ग्लानि या अपराधबोध या विवशता जैसी बात मन में नहीं आती। दोनों ही उस आनन्दलीला में बराबर के सहभागी हैं। यही वह उल्लेखनीय तत्व है, जो आज के मनुष्य में स्थायी रूप से बढ़ता जा रहा है। 'किंबहुना' में इसे सहज रूप में प्रस्तुत कर लेखक साहस का परिचय देता है।
'किंबहुना' सोशल मीडिया के माध्यम से पनपे साहित्यिक समूहों और वहाँ भी शीतल जैसे लोगों के द्वारा दुकानदारी शुरू कर देने व उसमें लोगों के फँसने का किस्सा है, तो माउण्टआबू में सनसेट प्वाइंट पर फोटोशूट के लिए आतुर आरती के चित्रण में कथाकार की चित्रात्मकशैली का जीवन्त नमूना भी है। यूँ 'किंबहुना' के रचनाकार ने अपने चरित्रों के नाक - नक्श का ब्यौरा हर संभव जगह पर इस तरह दिया है कि वह चरित्र स्पष्ट उभर कर साकार हो गया है। शीतल उपन्यास में एक ऐसे वर्ग का प्रतिनिधित्व करता है जिसे किसी
तरह का उत्तरदायित्व लेने से परहेज है। उसे स्त्री तो चाहिए, किन्तु पत्नी नहीं, जिसके प्रति किसी भी तरह की जवाबदारी उसे उठानी पड़े! वहीं आरती जैसी मुक्तिकामी, मुक्तिचेता स्त्री की वास्तविक स्थिति का चित्रण इस उपन्यास की उपलब्धि मानी जा सकती है। यह मुक्तिचेतना ही उसे कभी आलम के नर्क में ले जाती है, तो फिर भरत और शीतल जैसों की देह की भूख मिटाने का साधन भी बनाती है।
'किंबहुना' यानी 'वास्तव में' आधुनिक समाज में स्त्री - पुरुष सम्बन्धों, स्वार्थों और जातीय सम्बन्धों के महत्व के साथ मुक्तिकामी स्त्री की चेतना व संघर्ष को रेखांकित करता हुआ उपन्यास है। पठनीयता के स्तर पर यह बेजोड़ है। एक बार पढ़ना शुरू करके आप इसे पढ़कर ही मानेंगे। 'किंबहुना' के चरित्र बहुत जाने-पहचाने लगते हैं। यह उपन्यास इसलिये भी महत्वपूर्ण कहा जाएगा कि इसका कथानक हमारे आज की कथा कहता है।
कथा जब आगे बढ़ती है, तो अपने स्वाभाविक विकासक्रम में आरती और आलम के तलाक प्रकरण पर आती है। इस बीच आरती की नौकरी पर संकट और भरत मेश्राम से मुलाकात के बाद उन दोनों का लिव इन जैसे रिश्ते की तरह साथ आना घटित होता है, किन्तु भरत का अपनी ब्याहता पत्नी से तलाक का केस खारिज़ हो जाता है और भरत के साथ आगे सम्मानजनक संभावनायें न देखकर आरती भरत से अपनी सगाई एक झटके में तोड़ देती है। भरत का धनाड्य और प्रभावशाली परिवार से होना आरती को सुरक्षा देने में सक्षम है, किन्तु स्वतंत्रता की जो चेतना आरती के भीतर पहले से ही है, उसको बचाने के लिए वह मेश्राम परिवार से भिड़ जाती है। भरत की माँ, बहन, खुद भरत के द्वारा भी यह याद दिलाने के बावज़ूद कि'अब तक तो कितने करम-कुकरम किए! और पति-पत्नी की तरह रहे। फिर, अब क्या हो गया? "वह भरत से फिर देह का कोई रिश्ता नहीं बनाती। संघर्ष के इस मोड़ पर आरती की जिन्दगी में कार्पोरेट जगत के शातिर शीतल का प्रवेश होता है। शीतल के बल पर ही वह भरत मेश्राम जैसे मगरमच्छ से भी निपट लेती है।
इस पूरे प्रकरण के लिए उपन्यासकार अपनी कथा का ताना-बाना बुनने के लिए जिस सूत्र का इस्तेमाल करता है, वह बिलकुल नया और आधुनिक है। पिछले कुछ सालों यानी 2-4 सालों में सोशल मीडिया
और उस पर वाट्सएप शहरी मध्यमवर्ग के बीच छाया हुआ है। यहाँ बहुत सारे सम्बन्ध - सम्पर्क वाट्सएप पर ही बन-बिगड़ और निभ रहे हैं। 'किंबहुना' का उल्लेखनीय तथ्य व तत्व यह भी है कि लेखक ने सोशल साइट्स के द्वारा कथा सूत्रों का विकास इस तरह से किया है कि ऐसा लगता है जैसे यह इस तरह के अलावा किसी और तरह से हो ही नहीं सकता था।
'किंबहुना' की कथा को तीन भागों में बाँटकर देखा जा सकता है। इसका पहला भाग एस टी डी बूथ पर पनपता है, जबकि दूसरा और तीसरा भाग पूरी तरह वाट्सएप के माध्यम से आगे बढ़ते हैं। दूसरे भाग में भरत मेश्राम से वाट्सएप पर बातचीत और आरती की समस्या के समाधान के साथ ही होटल में भरत के लिए आरती का देह - समर्पण! तीसरे भाग में वाट्सएप पर शीतल के साथ कविताओं का, बातचीत का और प्रेमालाप का लम्बा सिलसिला है। आरती के भरत से अलग होने के प्रकरण में दूर बैठे शीतल के द्वारा निर्णायक भूमिका निभाना उसे आरती के बहुत निकट ले आता है। अब तक उनकी आमने-सामने की मुलाकात नहीं हुई। तभी आरती को एक साहित्यिक सम्मान के लिए जयपुर जाना होता है, उधर से शीतल भी पहुँच जाता है। यात्रा के अंतिम दिन आरती शीतल को भी स्वयं को सौंप देती है और यह सोचती है कि बहुत एहसान हैं शीतल के मुझ पर, इस तरह मैं भी कुछ हल्की हो जाऊँगी। यानी इस एहसान के बदले देह! और जैसे उसे पहले से ही मालुम भी है कि इन मेहरवानियों की परिणति यही होना है। भरत के सम्बन्ध में भी वह यही सोचती है कि मेरा साथ दिया तो पूरी कीमत भी वसूल ली।
'किंबहुना' वर्तमान समाज में निरन्तर बढ़ती जा रही स्वार्थ की प्रवृत्ति के साथ स्त्री और पुरुष के सम्बन्धों की पड़ताल करता उपन्यास है। आरती अपने आॅफिसियल संकट से निपटने में भरत से सहायता लेती है और भरत को एक स्त्री देह की जरूरत है, जो उसे आरती के रूप में मिल जाती है। भरत से मुक्ति के लिए शीतल आता है, उसे भी एक स्त्री देह की जरूरत है। यह उपन्यास यौनिक शुचिता की अवधारणा को तोड़ता हुआ आगे बढ़ता है। यहाँ ये यौन सम्बन्ध बहुत सहज रूप में घटित होते हैं। कहीं किसी के मन में कोई ग्लानि या अपराधबोध या विवशता जैसी बात मन में नहीं आती। दोनों ही उस आनन्दलीला में बराबर के सहभागी हैं। यही वह उल्लेखनीय तत्व है, जो आज के मनुष्य में स्थायी रूप से बढ़ता जा रहा है। 'किंबहुना' में इसे सहज रूप में प्रस्तुत कर लेखक साहस का परिचय देता है।
'किंबहुना' सोशल मीडिया के माध्यम से पनपे साहित्यिक समूहों और वहाँ भी शीतल जैसे लोगों के द्वारा दुकानदारी शुरू कर देने व उसमें लोगों के फँसने का किस्सा है, तो माउण्टआबू में सनसेट प्वाइंट पर फोटोशूट के लिए आतुर आरती के चित्रण में कथाकार की चित्रात्मकशैली का जीवन्त नमूना भी है। यूँ 'किंबहुना' के रचनाकार ने अपने चरित्रों के नाक - नक्श का ब्यौरा हर संभव जगह पर इस तरह दिया है कि वह चरित्र स्पष्ट उभर कर साकार हो गया है। शीतल उपन्यास में एक ऐसे वर्ग का प्रतिनिधित्व करता है जिसे किसी
तरह का उत्तरदायित्व लेने से परहेज है। उसे स्त्री तो चाहिए, किन्तु पत्नी नहीं, जिसके प्रति किसी भी तरह की जवाबदारी उसे उठानी पड़े! वहीं आरती जैसी मुक्तिकामी, मुक्तिचेता स्त्री की वास्तविक स्थिति का चित्रण इस उपन्यास की उपलब्धि मानी जा सकती है। यह मुक्तिचेतना ही उसे कभी आलम के नर्क में ले जाती है, तो फिर भरत और शीतल जैसों की देह की भूख मिटाने का साधन भी बनाती है।
'किंबहुना' यानी 'वास्तव में' आधुनिक समाज में स्त्री - पुरुष सम्बन्धों, स्वार्थों और जातीय सम्बन्धों के महत्व के साथ मुक्तिकामी स्त्री की चेतना व संघर्ष को रेखांकित करता हुआ उपन्यास है। पठनीयता के स्तर पर यह बेजोड़ है। एक बार पढ़ना शुरू करके आप इसे पढ़कर ही मानेंगे। 'किंबहुना' के चरित्र बहुत जाने-पहचाने लगते हैं। यह उपन्यास इसलिये भी महत्वपूर्ण कहा जाएगा कि इसका कथानक हमारे आज की कथा कहता है।
कृति - किंबहुना (उपन्यास)
लेखक - ए. असफल
प्रकाशन - ज्ञान गीता प्रकाशन
एक्स. नवीन शाहदरा, दिल्ली - 110032
कीमत - 295/-
राजा अवस्थी
गाटरघाट रोड, आजाद चौक
कटनी 483501 (म. प्र.)
मोबा. 9617913287
Email - raja.awasthi52@gmail.com
लेखक - ए. असफल
प्रकाशन - ज्ञान गीता प्रकाशन
एक्स. नवीन शाहदरा, दिल्ली - 110032
कीमत - 295/-
राजा अवस्थी
गाटरघाट रोड, आजाद चौक
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