19/02/2018
आदरणीय साथियो
सादर सुप्रभात, वंदन, अभिनंदन, नमन
आज आप सबकी सेवा में प्रस्तुत है राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त की अमर कृति साकेत के द्वितीय सर्ग से कुछ प्रारम्भिक पंक्तियाँ।
साकेत (1)
द्वितीय सर्ग
लेखनी, अब किस लिए विलम्ब?
बोल, - जय भारति, जय जगदम्ब
प्रकट जिसका यों हुआ प्रभात,
देख अब तू उस दिन की रात।
धरा पर धर्मादर्श - निकेत,
धन्य है स्वर्ग सदृश साकेत।
बढ़े क्यों आज न हर्षोद्रेक?
राम का कल होगा अभिषेक?
दशों दिग्पालों के गुण केन्द्र,
धन्य हैं दशरथ मही-महेन्द्र।
त्रिवेणी तुल्य रानियाँ तीन,
बहाती सुख-प्रवाह नवीन।
मोद का आज न ओर न छोर,
आम्र वन-सा फूला सब ओर।
किन्तु हा! फला न सुमन-क्षेत्र,
कीट बन गए मन्थरा- नेत्र।
देखकर कैकेयी यह हाल,
आप उससे बोली तत्काल-
"अरी, तू क्यों उदास है आज,
वत्स जब कल होगा युवराज? "
मन्थरा बोली निस्संकोच -
'आपको भी तो है कुछ सोच?"
हँसी रानी सुनकर यह बात,
उठी अनुपम आभा अवदात।
क्रमशः -
प्रस्तुति -
राजा अवस्थी
आदरणीय साथियो
सादर सुप्रभात, वंदन, अभिनंदन, नमन
आज आप सबकी सेवा में प्रस्तुत है राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त की अमर कृति साकेत के द्वितीय सर्ग से कुछ प्रारम्भिक पंक्तियाँ।
साकेत (1)
द्वितीय सर्ग
लेखनी, अब किस लिए विलम्ब?
बोल, - जय भारति, जय जगदम्ब
प्रकट जिसका यों हुआ प्रभात,
देख अब तू उस दिन की रात।
धरा पर धर्मादर्श - निकेत,
धन्य है स्वर्ग सदृश साकेत।
बढ़े क्यों आज न हर्षोद्रेक?
राम का कल होगा अभिषेक?
दशों दिग्पालों के गुण केन्द्र,
धन्य हैं दशरथ मही-महेन्द्र।
त्रिवेणी तुल्य रानियाँ तीन,
बहाती सुख-प्रवाह नवीन।
मोद का आज न ओर न छोर,
आम्र वन-सा फूला सब ओर।
किन्तु हा! फला न सुमन-क्षेत्र,
कीट बन गए मन्थरा- नेत्र।
देखकर कैकेयी यह हाल,
आप उससे बोली तत्काल-
"अरी, तू क्यों उदास है आज,
वत्स जब कल होगा युवराज? "
मन्थरा बोली निस्संकोच -
'आपको भी तो है कुछ सोच?"
हँसी रानी सुनकर यह बात,
उठी अनुपम आभा अवदात।
क्रमशः -
प्रस्तुति -
राजा अवस्थी
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