कैकेयी अब बोलती
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मन से निकले जो कहीं,
सचमुच मन की बात।
कितनों के मन पर पड़े,
एक वज्र आघात।।
कहे बिना माने नहीं,
कैकेयी भी बात।
ताला ले बैठी रहे,
सामंतों की जात।।
भूल नहीं पाया कभी,
मन वह चुभती देह।
प्रथम बार अभिसार जब,
हुआ भूप के गेह।।
अभी-अभी ही हुई थी,
युवा, युवा अरमान।
और अचानक मिट गया,
यौवन का सम्मान।।
वचनबद्ध जीती रही,
भूप रहे आसक्त।
समय गया मैं भी हुई,
उन पर फिर अनुरक्त।।
बनूँ राजमाता कभी,
चाह रही यह शेष।
जदपि राम पर भी रहा,
स्नेह असीम अशेष।।
राजा अवस्थी, कटनी
19/01/2018
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