Sunday, 31 December 2017

कैकेयी अब बोलती - 11

नववर्ष पर अशेष मंगलकामनायें

अब कैकेयी बोलती
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रहा भरत को ज्ञान यह,
नहीं भरत का राज।
होकर भी होगा नहीं,
ऐसा गठित समाज।।

थोड़ी भी सम्पृक्तता,
न थी राज में शेष।
परम्परा का, भूप की,
इच्छा का ही देश।।

भरत रहित था जब अवध,
रचा राम का राज।
श्राद्ध कर्म से किसलिए,
दूर करें महराज।।

अब ऐसे में किस तरह,
भरत मुकुट लें शीष।
राम पनहियाँ सिर धरीं,
दे दुनिया आशीष।।

मिला किन्तु पाया न जो,
उस पर कैसा राग।
द्वेष, घृणा, अपमान से,
अतिउत्तम वैराग।।

राजा अवस्थी, कटनी
01/01/2018


Saturday, 30 December 2017

कैकेयी अब बोलती - 10


अब कैकेयी बोलती
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क्या यूँ ही करते रहे,
महिमा मंडन लोग।
इस बूटी की आड़ में,
दें चुप्पी का रोग।।

युगों-युगों पलते रहे,
मन में प्रश्न अनेक।
अब बोली तो खिंच गई,
क्यों माथे में रेख।।

प्रायश्चित की आग पर,
कैकेयी आसीन।
रहा जमाना देखता,
यह होकर तल्लीन।।

मुझ पर प्रायश्चित मढ़ा,
सुनी न मेरी बात।
मेरे हिस्से में रची,
एक अनवरत रात।।

मेरी छोड़ें भरत को,
क्या - क्या बोले भूप।
पोल खुल गई प्यार की,
प्रकट हो गया रूप।।

अगर राज भोगें भरत,
करें न तर्पण श्राद्ध।
रहे न कुछ सम्बन्ध फिर,
मुझसे मेरे बाद।।

भूप राम आसक्ति में,
सच दे देंगे जान।
इसका बिल्कुल भी नहीं,
रहा मुझे अनुमान।।

अंत - अंत तक भी नहीं,
मुझे रहा यह भान।
परिणति होगी इस तरह,
भूप तजेंगे प्राण।।

प्राणों के पहले तजे,
कैकेयी को भूप।
उठा रखी सौगंध यह,
कभी न देखें रूप।।

त्यागा कैकेयी महल,
कौसल्या के साथ।
घृणा भरी दुत्कार से,
झटका मेरा हाथ।।

राजा अवस्थी, कटनी
31/12/2017

कैकेयी अब बोलती - 9

अब कैकेयी बोलती
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सूपनखा हो या रहीं,
मंदोदरी महान।
सबके हृदय पर पड़े,
छल के कठिन निशान।।

कैकेयी भी थी वहाँ,
जब निकले श्रीराम।
अभिवादन तक विस्मरित,
करते कहाँ प्रणाम।।

दोनों माँओं के चरण,
गहे रहे कर जोर।
किन्तु दृष्टि तक भी न की,
कैकेयी की ओर।।

यूँ तो मैं भी मानती,
निर्मल मन श्रीराम।
लेकिन उसका क्या करूँ,
मन में जो कुहराम।।

मैं जो बोलूँ सभी कुछ,
सच मानें सब लोग।
ऐसी कोई चाहना,
रखी न मन में जोग।।

जो कुछ भी मैं बोलती,
सबका कुछ आधार।
रही उपेक्षा कठिनतम,
कैकेयी के द्वार।।

चौदह वर्षों ही रहा,
राम तुम्हें वनवास।
युग-युग कैकेयी सहे,
तीरों का संत्रास।।

राजा अवस्थी, कटनी
30/12/2017


कैकेयी अब बोलती - 8


अब कैकेयी बोलती
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क्या कौशल्या क्या सिया,
एक सभी के भाग,
विश्वासों के नाम पर,
संदेहों का नाग।।

जीवन भर जीती रहीं,
 सीता जो विश्वास।
तुम्हीं कहो टूटा नहीं,
जब सौंपा वनवास।।

शौर्य शील अरु प्रेम पर,
जिसको था विश्वास।
अग्नि परीक्षा का दिया,
उसको ही संत्रास।।

कहाँ जानकी पर दिखा,
प्रेम और विश्वास।
अग्नि परीक्षा किसलिए,
क्यों सौंपा वनवास।।

मर्यादा कैसी रची,
मर्यादा के धाम।
सहती रहे प्रताड़ना,
त्रिया लोक के नाम।।

राजा अवस्थी, कटनी
29/12/2017 

कैकेयी अब बोलती - 7

अब कैकेयी बोलती
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सीता ने भी ले लिया,
हाथों में कुश-चीर।
वह क्षण मेरे हृदय को,
क्षण में गया विदीर।।

क्षण भर को मैं भी हुई,
उस क्षण में कमजोर।
पापिनि पापिनि का उठा,
अन्तस्थल में शोर।।

अन्त:पुर में रानियाँ
छल की रहीं शिकार।
राजा को तो चाहिए,
था केवल अभिसार।।

कौसल्या भी उपेक्षा,
की ही रहीं शिकार।
जीवन में पाया नहीं,
जी भर पति का प्यार।।

राजा अवस्थी, कटनी
27/12/2017 

Tuesday, 26 December 2017

अब कैकेयी बोलती - 6


अब कैकेयी बोलती
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प्रायश्चित में रत भरत,
भोग रहे अभिशाप।
कभी स्वप्न में भी नहीं,
किया जिन्होंने पाप।।

पक्षकार पूरा अवध,
मुझे किया प्रतिपक्ष।
अपवादों की सृष्टि में,
पहले ही थे दक्ष।।

शक्ति अमोघ निधान थे,
ऋषि, मुनि, गुरुकुल खेत।
उन्हें खटकता रहा है,
कैकेयी का प्रेत।।

पहले तो वीरांगना,
उस पर रीझे भूप।
राज-काज में दखल फिर,
सूझ-बूझ अनुरूप।।

समझौते का वचन का,
रहा सभी को ज्ञान।
राम राज्य अभिषेक का,
सुनियोजित अभियान।।

राजा अवस्थी, कटनी
27/12 /2017

अब कैकेयी बोलती - 5

26/12/2017

अब कैकेयी बोलती
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मेरे ऊपर ही गिरे,
परम्परा के प्रेत।
यह सब कुछ होता न जो,
दशरथ जाते चेत।।

पहले दे ही चुके जो,
फिर से लेते माँग।
दाता होने का तनिक,
तज देना था स्वांग।।

जब भरमाई ही रही,
बरसों बरस अचेत।
तनिक न सकुचाती कभी,
राज राम हित देत।।

पाप किसी के मन रहे,
आग लगी कहुँ और।
किन्तु राख होकर रहा,
पूरा - पूरा ठौर।।

राजा अवस्थी, कटनी
26/12/2017



Sunday, 24 December 2017

अब कैकेयी बोलती - 4



अब कैकेयी बोलती
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कह कर गया सुमन्त्र तक
पति हन्तिनी कुलघ्न।
गुरु वशिष्ठ का ज्ञान भी,
प्रकट हुआ हो भग्न।।

बदन उघारे दिख गए,
उस दिन कितने लोग।
कुछ तो पहचाने गए,
पाकर यह दुर्योग।।

कब किसने मेरी सुनी,
कोई मन की बात।
मेरी माँ तक को कहा,
कर्कश, कुमति, कुजात ।।

रही भोग की वस्तु यह,
कैकय राजकुमारि।
दिन बीते तो सब वचन,
बैठे भूप बिसारि।।

मिले हुए को माँगना,
यही हो गया पाप।
ज्ञानी, ध्यानी और गुरु,
लगे उछरने शाप।।

राजा अवस्थी, कटनी
25/12/2017

Saturday, 23 December 2017

मैं कैकेयी बोलती - 3


अब कैकेयी चाहती,
तोड़े अपना मौन।
यह चिन्ता भी क्यों करे,
उसे सुनेगा कौन।।

भरत ज्ञान के पुञ्ज थे,
थे वे नीति निधान।
राज न  संभव अवध में,
निश्चित था अनुमान।

मुझको भी यह भान था,
हर पल रही सशंक।
विवश हुई थी कूदने,
भरा हुआ था पंक।।

कुछ वचनों केजाल में,
फँसे हुए थे भूप।
उनकी कमजोरी रही,
देह, उम्र 'औ रूप।।

राजा तो राजा रहे,
फिर रघुवंशी भूप।
मर मिटने को वचन पर,
युग - युग रहे अनूप।।

राजा अवस्थी, कटनी
24/12/2017





Friday, 22 December 2017

मैं कैकेयी बोलती - 2

   मैं कैकेयी बोलती
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मैं कैकेयी क्या कहूँ,
मेरी सुनता कौन।
इसीलिए बैठा लिया,
मुँह पर अपने मौन।।

मैं कैकेयी खोलती,
अपने मन के द्वार।
मुँह का मौन न जा रहा,
जमा पालथी मार।।

मैं कैकेयी बोलती,
नहीं रहे संकेत।
मन पर लादे जी रही,
प्रायश्चित के प्रेत।।

मेरे मन की बात को,
वाणी देता कौन।
मानस रचनाकार ने,
मुँह को सौंपा मौन।।

स्त्री हो फिर मुखर हो,
और जगा हो मान।
खटके पुरूष समाज को,
राज - काज का ज्ञान।।

राजा अवस्थी 'कटनी
23/12/2017

मैं कैकेयी बोलती (दोहे) - 1

मैं कैकेयी बोलती
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दिए गए आवेश में,
वर निकले गलफाँस।
फिर उनमें ऐसी फँसी,
लौट न पाई साँस।।

यह केवल आसक्ति थी,
या वचनों का जाल।
जिसने यों बेबस किया,
मानी प्राण निकाल।।

राम गए वन भरत भी,
बैठे नंदीग्राम।
मैं कैकेयी महल में,
रही पराजित काम।।

मेरे सत पर कलुष का,
चिपक गया है नाम।
परिभाषायें उलट कर,
गया एक परिणाम।।

अनुचित मेरी माँग थी,
वीर पुरुष थे राम।
निष्कासन फिर सिया का,
लोकरंजनी काम।।

कैकेयी ने जो किया,
हुआ अधम वह कर्म।
निर्णय प्यारे राम का,
साबित क्यों सत्कर्म।।

उनको पावन कर गई,
प्रायश्चित की आग।
जली उम्र भर अनल में,
मिटा न तिल भर दाग।।

राजा अवस्थी, कटनी
22/12/2017
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