अब कैकेयी बोलती
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सूपनखा हो या रहीं,
मंदोदरी महान।
सबके हृदय पर पड़े,
छल के कठिन निशान।।
कैकेयी भी थी वहाँ,
जब निकले श्रीराम।
अभिवादन तक विस्मरित,
करते कहाँ प्रणाम।।
दोनों माँओं के चरण,
गहे रहे कर जोर।
किन्तु दृष्टि तक भी न की,
कैकेयी की ओर।।
यूँ तो मैं भी मानती,
निर्मल मन श्रीराम।
लेकिन उसका क्या करूँ,
मन में जो कुहराम।।
मैं जो बोलूँ सभी कुछ,
सच मानें सब लोग।
ऐसी कोई चाहना,
रखी न मन में जोग।।
जो कुछ भी मैं बोलती,
सबका कुछ आधार।
रही उपेक्षा कठिनतम,
कैकेयी के द्वार।।
चौदह वर्षों ही रहा,
राम तुम्हें वनवास।
युग-युग कैकेयी सहे,
तीरों का संत्रास।।
राजा अवस्थी, कटनी
30/12/2017
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सूपनखा हो या रहीं,
मंदोदरी महान।
सबके हृदय पर पड़े,
छल के कठिन निशान।।
कैकेयी भी थी वहाँ,
जब निकले श्रीराम।
अभिवादन तक विस्मरित,
करते कहाँ प्रणाम।।
दोनों माँओं के चरण,
गहे रहे कर जोर।
किन्तु दृष्टि तक भी न की,
कैकेयी की ओर।।
यूँ तो मैं भी मानती,
निर्मल मन श्रीराम।
लेकिन उसका क्या करूँ,
मन में जो कुहराम।।
मैं जो बोलूँ सभी कुछ,
सच मानें सब लोग।
ऐसी कोई चाहना,
रखी न मन में जोग।।
जो कुछ भी मैं बोलती,
सबका कुछ आधार।
रही उपेक्षा कठिनतम,
कैकेयी के द्वार।।
चौदह वर्षों ही रहा,
राम तुम्हें वनवास।
युग-युग कैकेयी सहे,
तीरों का संत्रास।।
राजा अवस्थी, कटनी
30/12/2017
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