Saturday, 30 December 2017

कैकेयी अब बोलती - 7

अब कैकेयी बोलती
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सीता ने भी ले लिया,
हाथों में कुश-चीर।
वह क्षण मेरे हृदय को,
क्षण में गया विदीर।।

क्षण भर को मैं भी हुई,
उस क्षण में कमजोर।
पापिनि पापिनि का उठा,
अन्तस्थल में शोर।।

अन्त:पुर में रानियाँ
छल की रहीं शिकार।
राजा को तो चाहिए,
था केवल अभिसार।।

कौसल्या भी उपेक्षा,
की ही रहीं शिकार।
जीवन में पाया नहीं,
जी भर पति का प्यार।।

राजा अवस्थी, कटनी
27/12/2017 

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