मैं कैकेयी बोलती
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मैं कैकेयी क्या कहूँ,
मेरी सुनता कौन।
इसीलिए बैठा लिया,
मुँह पर अपने मौन।।
मैं कैकेयी खोलती,
अपने मन के द्वार।
मुँह का मौन न जा रहा,
जमा पालथी मार।।
मैं कैकेयी बोलती,
नहीं रहे संकेत।
मन पर लादे जी रही,
प्रायश्चित के प्रेत।।
मेरे मन की बात को,
वाणी देता कौन।
मानस रचनाकार ने,
मुँह को सौंपा मौन।।
स्त्री हो फिर मुखर हो,
और जगा हो मान।
खटके पुरूष समाज को,
राज - काज का ज्ञान।।
राजा अवस्थी 'कटनी
23/12/2017
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मैं कैकेयी क्या कहूँ,
मेरी सुनता कौन।
इसीलिए बैठा लिया,
मुँह पर अपने मौन।।
मैं कैकेयी खोलती,
अपने मन के द्वार।
मुँह का मौन न जा रहा,
जमा पालथी मार।।
मैं कैकेयी बोलती,
नहीं रहे संकेत।
मन पर लादे जी रही,
प्रायश्चित के प्रेत।।
मेरे मन की बात को,
वाणी देता कौन।
मानस रचनाकार ने,
मुँह को सौंपा मौन।।
स्त्री हो फिर मुखर हो,
और जगा हो मान।
खटके पुरूष समाज को,
राज - काज का ज्ञान।।
राजा अवस्थी 'कटनी
23/12/2017
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