अब कैकेयी बोलती
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कह कर गया सुमन्त्र तक
पति हन्तिनी कुलघ्न।
गुरु वशिष्ठ का ज्ञान भी,
प्रकट हुआ हो भग्न।।
बदन उघारे दिख गए,
उस दिन कितने लोग।
कुछ तो पहचाने गए,
पाकर यह दुर्योग।।
कब किसने मेरी सुनी,
कोई मन की बात।
मेरी माँ तक को कहा,
कर्कश, कुमति, कुजात ।।
रही भोग की वस्तु यह,
कैकय राजकुमारि।
दिन बीते तो सब वचन,
बैठे भूप बिसारि।।
मिले हुए को माँगना,
यही हो गया पाप।
ज्ञानी, ध्यानी और गुरु,
लगे उछरने शाप।।
राजा अवस्थी, कटनी
25/12/2017
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