26/12/2017
अब कैकेयी बोलती
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मेरे ऊपर ही गिरे,
परम्परा के प्रेत।
यह सब कुछ होता न जो,
दशरथ जाते चेत।।
पहले दे ही चुके जो,
फिर से लेते माँग।
दाता होने का तनिक,
तज देना था स्वांग।।
जब भरमाई ही रही,
बरसों बरस अचेत।
तनिक न सकुचाती कभी,
राज राम हित देत।।
पाप किसी के मन रहे,
आग लगी कहुँ और।
किन्तु राख होकर रहा,
पूरा - पूरा ठौर।।
राजा अवस्थी, कटनी
26/12/2017
अब कैकेयी बोलती
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मेरे ऊपर ही गिरे,
परम्परा के प्रेत।
यह सब कुछ होता न जो,
दशरथ जाते चेत।।
पहले दे ही चुके जो,
फिर से लेते माँग।
दाता होने का तनिक,
तज देना था स्वांग।।
जब भरमाई ही रही,
बरसों बरस अचेत।
तनिक न सकुचाती कभी,
राज राम हित देत।।
पाप किसी के मन रहे,
आग लगी कहुँ और।
किन्तु राख होकर रहा,
पूरा - पूरा ठौर।।
राजा अवस्थी, कटनी
26/12/2017
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