Saturday, 23 December 2017

मैं कैकेयी बोलती - 3


अब कैकेयी चाहती,
तोड़े अपना मौन।
यह चिन्ता भी क्यों करे,
उसे सुनेगा कौन।।

भरत ज्ञान के पुञ्ज थे,
थे वे नीति निधान।
राज न  संभव अवध में,
निश्चित था अनुमान।

मुझको भी यह भान था,
हर पल रही सशंक।
विवश हुई थी कूदने,
भरा हुआ था पंक।।

कुछ वचनों केजाल में,
फँसे हुए थे भूप।
उनकी कमजोरी रही,
देह, उम्र 'औ रूप।।

राजा तो राजा रहे,
फिर रघुवंशी भूप।
मर मिटने को वचन पर,
युग - युग रहे अनूप।।

राजा अवस्थी, कटनी
24/12/2017





No comments:

Post a Comment