अब कैकेयी बोलती
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क्या यूँ ही करते रहे,
महिमा मंडन लोग।
इस बूटी की आड़ में,
दें चुप्पी का रोग।।
युगों-युगों पलते रहे,
मन में प्रश्न अनेक।
अब बोली तो खिंच गई,
क्यों माथे में रेख।।
प्रायश्चित की आग पर,
कैकेयी आसीन।
रहा जमाना देखता,
यह होकर तल्लीन।।
मुझ पर प्रायश्चित मढ़ा,
सुनी न मेरी बात।
मेरे हिस्से में रची,
एक अनवरत रात।।
मेरी छोड़ें भरत को,
क्या - क्या बोले भूप।
पोल खुल गई प्यार की,
प्रकट हो गया रूप।।
अगर राज भोगें भरत,
करें न तर्पण श्राद्ध।
रहे न कुछ सम्बन्ध फिर,
मुझसे मेरे बाद।।
भूप राम आसक्ति में,
सच दे देंगे जान।
इसका बिल्कुल भी नहीं,
रहा मुझे अनुमान।।
अंत - अंत तक भी नहीं,
मुझे रहा यह भान।
परिणति होगी इस तरह,
भूप तजेंगे प्राण।।
प्राणों के पहले तजे,
कैकेयी को भूप।
उठा रखी सौगंध यह,
कभी न देखें रूप।।
त्यागा कैकेयी महल,
कौसल्या के साथ।
घृणा भरी दुत्कार से,
झटका मेरा हाथ।।
राजा अवस्थी, कटनी
31/12/2017
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