नववर्ष पर अशेष मंगलकामनायें
अब कैकेयी बोलती
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रहा भरत को ज्ञान यह,
नहीं भरत का राज।
होकर भी होगा नहीं,
ऐसा गठित समाज।।
थोड़ी भी सम्पृक्तता,
न थी राज में शेष।
परम्परा का, भूप की,
इच्छा का ही देश।।
भरत रहित था जब अवध,
रचा राम का राज।
श्राद्ध कर्म से किसलिए,
दूर करें महराज।।
अब ऐसे में किस तरह,
भरत मुकुट लें शीष।
राम पनहियाँ सिर धरीं,
दे दुनिया आशीष।।
मिला किन्तु पाया न जो,
उस पर कैसा राग।
द्वेष, घृणा, अपमान से,
अतिउत्तम वैराग।।
राजा अवस्थी, कटनी
01/01/2018
अब कैकेयी बोलती
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रहा भरत को ज्ञान यह,
नहीं भरत का राज।
होकर भी होगा नहीं,
ऐसा गठित समाज।।
थोड़ी भी सम्पृक्तता,
न थी राज में शेष।
परम्परा का, भूप की,
इच्छा का ही देश।।
भरत रहित था जब अवध,
रचा राम का राज।
श्राद्ध कर्म से किसलिए,
दूर करें महराज।।
अब ऐसे में किस तरह,
भरत मुकुट लें शीष।
राम पनहियाँ सिर धरीं,
दे दुनिया आशीष।।
मिला किन्तु पाया न जो,
उस पर कैसा राग।
द्वेष, घृणा, अपमान से,
अतिउत्तम वैराग।।
राजा अवस्थी, कटनी
01/01/2018