कैकेयी अब बोलती
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सत्ता का पथ निठुरतम,
षड़यंत्रों की कोख।
नींद, चैन, सुख, शांति सब,
एक चाह ले सोख।।
आशंकित पूरा अवध,
भूप भरत के नाम।
रहे भरत का नाम भर,
करे कैकयी काम।।
कैकेयी के राज में,
अवध न रहने योग।
अवध छोड़कर सब चलो,
यही विचारें लोग।
जितनी कुटिल उपाधियाँ,
गढ़ पाईं पुरनार।
कैकेयी के नाम पर,
सब पा गईं प्रचार।।
मैं कैकेयी ही कुटिल,
शेष अवध सतधाम।
जन मन क्या जाने कहाँ,
महल करें क्या काम।।
राजा अवस्थी, कटनी
04/01/2018
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