कैकेयी अब बोलती
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मैं भी अब चाहूँ यही
वापस आएँ राम।
जितने होने थे हुए
तमगे मेरे नाम।।
प्रेम भरे सम्मान संग
विश्वासों की डोर।
ऐसी छूटीं भरत से
हाथ न आता छोर।।
प्रणत रही श्रीराम पर,
तन - मन सब कुछ हार।
वही भावना झेलती,
संदेहों की मार।।
निरपराध डूबे रहे
अपराधों के बोध।
करनी सबसे पड़ रही
बात प्रबोध प्रबोध।।
देखा सबने भरत को,
प्रथम डूब संदेह।
भरद्वाज गुह लखन तक,
का मन शक का गेह।।
निर्णय पल में राम ने
लिया रहें वन माँझ,
वहीं भरत ने अवध का,
त्यागा पल में राज।।
राम त्याग की मूर्ति हैं,
भरत रूप संदेह।
नियति रचे कितने प्रबल,
चक्रव्यूह से गेह।।
संदेहों के तीर से,
बिंधे भरत निरुपाय।
व्याकुल यह निर्मल हृदय,
करने चला उपाय।।
राजा अवस्थी, कटनी
12/01 /2018
Bahut sunder
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