कैकेयी अब बोलती
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रघुवंशी ही थे भरत,
वैसे ही संस्कार।
राजा बनने से किया,
पल में अस्वीकार।।
पिता अश्वपति को दिया,
वचन मुझे था याद।
अगर दिलाया याद तो,
किया बड़ा अपराध।।
आयोजन श्रीराम के,
राजतिलक की बात।
क्या यह छोटी बात थी,
मुझे न थी जो ज्ञात।।
सहज न था यह सभी कुछ,
रहा योजनाबद्ध।
मुझ तक आती हुईं सब,
खबरें थीं आबद्ध।।
एक रात्रि पहले मुझे,
हुआ सभी कुछ ज्ञात।
चुभा विषैले तीर - सा,
लगा हुआ कुछ घात।।
राजा रहते राम ही,
मैं भी करती हर्ष।
कैकेयी से भूप ने,
किया न एक विमर्श।।
प्यार और विश्वास की,
बरसों बरसी बात।
कैसे भूले भूप यह,
हुआ मुझे संताप।।
घरघुस्सू रानी न थी,
कैकय राजकुमारि।
राजकाज में दक्ष थी,
नीति निपुण मैं नारि।।
एक कपट के तीर ने
किया विषैली सोच।
सुख मर्यादा मान सब,
खाया पल में नोंच।।
नीति - रीति में निपुण थे,
भरत वीर सतधीर।
कौसल्या ने जड़ दिए,
उन पर विष के तीर।।
पल भर में ही भरत ने,
निर्णय लिया अकाट्य।
समझ रहे थे हो चुका,
राज अवध का त्याज्य।।
बहुत अमंगल घट चुका,
अब करना परिहार।
सारे निर्णय भरत ने,
लिए यहाँ सुविचार।।
यह निश्चित हो ही गया,
भरत न लेंगे राज।
कैकेयी के शीश ही,
गिरी निरन्तर गाज।।
राजा अवस्थी, कटनी
11/01/2018
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