कैकेयी अब बोलती
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रहते मेरे पास तो,
भूप न तजते प्राण।
मैं दिलवा कर मानती,
उन्हें दोष से त्राण।।
मैने किस विश्वास पर,
धरी कौन सी चोट।
मुझमें ही देखा गया,
क्यों पग - पग पर खोट।।
नहीं राम - आसक्ति में,
तजे भूप ने प्राण।
बोध घृणित अपराध का,
लेकर निकला जान।।
कौसल्या निज शोक में,
बरस रहीं घनघोर।
भूप सहें असहाय - से,
दिन दुपहर निशि भोर।।
राजा अवस्थी, कटनी
07/01/2018
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रहते मेरे पास तो,
भूप न तजते प्राण।
मैं दिलवा कर मानती,
उन्हें दोष से त्राण।।
मैने किस विश्वास पर,
धरी कौन सी चोट।
मुझमें ही देखा गया,
क्यों पग - पग पर खोट।।
नहीं राम - आसक्ति में,
तजे भूप ने प्राण।
बोध घृणित अपराध का,
लेकर निकला जान।।
कौसल्या निज शोक में,
बरस रहीं घनघोर।
भूप सहें असहाय - से,
दिन दुपहर निशि भोर।।
राजा अवस्थी, कटनी
07/01/2018
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