कैकेयी अब बोलती
-----------------------------------------
भरत - राम के बीच थी,
अनबूझी सी डोर।
पूर्ण चन्द्र सम राम थे,
भरत पिपासु चकोर।।
निपुण भरत यह जानते,
वचन न तोड़ें राम।
मर्यादा की मूर्ति वे,
मर्यादा के धाम।।
अंतिम क्षण तक कर लिया,
अनुनय विनय प्रयत्न।
राम न लौटे अवध तब,
रहे व्यर्थ सब यत्न।।
प्रश्न सभी के मन उठा,
सेना पुरजन संग।
गए मनाने इस तरह,
यह कैसा था ढंग।।
नीति निपुण थे चाहते,
सब देखें सब यत्न।
करें मनाने के लिए,
जितने भरत प्रयत्न।।
क्या वशिष्ठ क्या कौसिला,
क्या जाबालि महान।
सबने सिखलाया उन्हें,
अवध-वापसी-ज्ञान।
अवधि पूर्ण वन की करूँ,
तब लौटूँ इस ओर।
भूपाज्ञा अवहेलना,
का मत डालो जोर।।
धरने पर बैठे भरत,
रहे अन्न जल त्याग।
राम लौट आएँ अवध,
विनत चरम अनुराग।।
नीति रीतिमय ज्ञान के,
पुञ्ज प्रवीण प्रमाण।
राम न तिल भर भी डिगे,
रखा वचन का मान।।
पुरजन, माता और गुरु,
हार गए सब भाँति।
राम अडिग वन में रहे,
अवध रही आराति।।
राजा अवस्थी, कटनी
16/01/2018
No comments:
Post a Comment