कैकेयी अब बोलती
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व्यथा भूप की हो गई,
द्विगुणित सौ - सौ बार।
कौसल्या के महल में,
पहुँचे जब सरकार।।
बरसों से मन में फँसे,
धँसे उपेक्षा दंश।
अब वे ही झरने लगे,
क्षण - क्षण कण-कण अंश।।
कौसल्या ने धैर्य की,
की न एक भी बात।
सिर्फ दोष मढ़ती रहीं,
राजा पर दिन रात।।
प्रिय कैकेयी ने दिया,
एक तरफ व्याघात।
और दूसरे दोष की,
निश - दिन हो बरसात।।
धीरज के दो बोल भी,
सका न कोई बोल।
नष्ट भ्रष्ट सब हो गया,
यही कहा मुँह खोल।।
श्रृंगवेर से राम ने
वापस किया सुमन्त्र।
कुशल सिया संग लखन की,
रखे नीतिगत मन्त्र।।
अवधपुरी की दुर्दशा,
कहा सुमन्त्र बखान।
राम कुशल की बात तक,
भूल न आई बान।।
सब अपने ही कर्म का,
कुफल समझ भूपाल।
फिर से मूर्छा में गए,
जान अवध बेहाल।।
राजा अवस्थी, कटनी
06/01/2018
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