कैकेयी अब बोलती
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कौसल्या लेकर गईं,
अपने सँग ही भूप।
और वहाँ दिखला दिया,
सौत - डाह का रूप।।
सहते रहे प्रताड़ना,
कैकेयी के नाम।
जैसे दशरथ के न हों,
कौसल्या के राम।।
सुन्न अवध, संताप वश,
जनमन शोक निमग्न।
कल की जग जगमग पुरी,
क्या अब होगी भग्न।।
मैं भी सोचूँ क्या कहीं,
हुआ बड़ा अपराध।
समय बनाने में लगा,
मुझको निष्ठुर व्याध।
नहीं कल्पना में रहा,
राजा का यह रूप।
कितना व्याकुल कर गई,
राम विरह की धूप।।
क्या सचमुच केवल विरह,
रहा भूप को दाह।
या स्थितियों के वचन के,
द्वैत न हुए निबाह।।
एक तरफ तैयारियाँ,
घोषित राजा राम।
एक तरफ पिछले वचन,
खुले हो गए आम।।
एक निभे तो दूसरा,
देकर जाए दाग।
संभवतः राजा जले,
इस दुविधा की आग।।
राजा अवस्थी, कटनी
05/01/2018
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