कैकेयी अब बोलती
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भरद्वाज से भरत ने,
करवाई पहचान।
मूढ़ कुलच्छिनि पापिनी,
कैकयि साँप समान।।
कोख जना बेटा कहे,
पापिनि दुष्ट कुलघ्न।
उस माँ का जीना कहो,
होगा कितना भग्न।।
मैं अभागिनी वस्तु सी,
रही सभी के हेत।
पिता संधि में सौंपते,
भूप वरे ज्यों खेत।।
राजमहल की रानियाँ,
रहीं डाह से त्रस्त।
शूलदृष्टियों ने किया,
सहने की अभ्यस्त।।
बरसों की मन की घृणा,
सबने रखी निकाल।
मौका था सबके लिए,
मुझ पर रहे उछाल।।
कण भर भी संवेदना,
न थी किसी के पास।
सबसे ज्यादा भरत ने,
करा दिया अहसास।।
जीवन भर जीती रही,
लेकर जो विश्वास।
वही कपट से भूप ने,
जला दिया ज्यों घास।।
उस क्षण हठ का नाग जो,
उठ बैठा फुँफकार।
ज्ञान, मान, अभिमान सब
दिया उसी ने मार।।
घृणा भरे विष सी दिखे,
पुत्र भरत की दृष्टि।
अवहेला अवमानना,
की है मुझ पर वृष्टि।।
सबने कुछ - कुछ खो दिया,
सबको इसका भान।
मैने तो सब खो दिया,
जीवन बचा मसान।।
राजा अवस्थी, कटनी
13/01/2018
मोबा. 9617913287
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