कैकेयी अब बोलती
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गुरु आचार्यों पुरजनों,
माताओं सँग सेन।
सबने देखा भरत के,
बरस रहे दो नैन।।
हार थके जब विवश हो,
कह पादुका निकाल।
हे ककुत्स्थकुलमणि करो,
इनको आज निहाल।।
इनको स्थापित कर करुँ,
काज राज के हेत।
जो था केवल राम का,
जिसे राम अभिप्रेत।।
राम तपस्वी - से यहाँ,
तो मैं नन्दीग्राम।
तापस बनकर ही रहूँ,
जब तक लौटें राम।।
धन्य - धन्य सबने कहा,
रहा राम का राज।
भरत दास बन सेवते,
राम राज के काज।।
भरत ग्लानि के भार से,
कुछ - कुछ हुए निवृत्त।
भोग न लें कण राज सुख,
पूर्ण सजग था चित्त।।
मैं कैकेयी पूर्णतः,
कर्म धर्म सब हार।
वह जीवन जीती रही,
जो जीना दुश्वार।।
वचन वधिक - से भूप के,
लेकर निकले प्राण।
और भरत ने कर दिए
प्राणहीन वरदान।।
राजा अवस्थी, कटनी
17/01/2018
9617913287
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