कैकेयी अब बोलती-18
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दिन निकला पर अवध पर,
रहा रात का फेर।
भूप न जागे रानियाँ,
रूदन करतीं घेर।।
निपट अकेली रह गई,
मैं अपराधिनि एक।
नियति ठठाकर हँस रही,
कैकेयी को देख।।
पहले भी किसके रहा,
आँखों में प्रिय भाव।
अप्रिय बनाकर ही रखा,
मेरा उग्र स्वभाव।।
चिन्तित ऋषि, मुनि, विप्र थे,
दान न हो बिन भूप।
राज्य किसी को सौंपिए,
बने किसी भी रूप।।
इतने दिन बीते हुआ,
सारा अर्थ अनर्थ,
होनी तो थी साधना,
जीवन भर की व्यर्थ।।
अब लेने को भरत को,
भेजे दूत वशिष्ठ।
वैसे हो ही चुका था,
मेरा घोर अनिष्ट।।
पूरा पखवाड़ा गया,
की न भरत की याद।
आ जाते तो भूप का,
कम होता अवसाद।।
राजा अवस्थी, कटनी
09/01/2018
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