Tuesday, 9 January 2018

कैकेयी अब बोलती - 19


कैकेयी अब बोलती
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अवधपुरी लौटे भरत,
सुना सत्य सब हाल।
कैकेयी को भी दिखा,
भरत रूप विकराल।।

रघुवंशी ही थे भरत,
रीति - नीति की मूर्ति।
ठान लिया होने न दें,
नारी हठ की पूर्ति।।

कौसल्या ने भरत पर,
छोड़े विषमय तीर।
अपराधी से हो गए,
निरपराध सतधीर।।

अनगिन सपथ उठा - उठा,
अशुभ स्वयं के हेत।
रहा न मुझको ज्ञान यह,
न ही मुझे अभिप्रेत।।

यदि मेरे संज्ञान में,
हो पहले ही बात।
घोर पाप मुझको लगे,
मिले न मुझको प्रात।।

कैकेयी कुल घातिनी,
पापिनि, दुष्ट, निकृष्ट।
नाना के घर किस तरह,
जन्मी ऐसी भ्रष्ट।।

मैं लाऊँगा राम को,
वे ही लेंगे राज्य।
सपथ सहित उद्घोषणा,
राज्य भरत को त्याज्य।।

अब कौसल्या के हृदय,
उमड़ा लाड़ अपार।
हृदय लगा बरसा रहीं,
अँखियाँ अँसुआ धार।।

ज्येष्ठ पुत्र राजा रहे,
मुझे न था इंकार।
किन्तु अँधेरे में मुझे,
रखा गया इस बार।।

रहा भूप को भरत पर,
क्यों ऐसा संदेह।
मुझ तक खबर न आ सकी,
भरत नहीं थे गेह।।

अगर भरत होते यहाँ,
अघट न घटता एक।
अविश्वास था भूप को
रची कपट की रेख।।

पुत्र भरत के लिए मैं,
दुष्ट पापिनी नारि।
शर्म उन्हें आने लगी,
माता मुझे विचारि।।

कैकेयी अब रह गई,
केवल एक सवाल।
अपने ही घर का हुई,
जलता हुआ पुआल।।

राजा अवस्थी, कटनी
10/01/2018




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