कैकेयी अब बोलती
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प्रायश्चितरत ही रखा,
कैकेयी का जन्म।
चाहा किसने कब पढ़े,
कैकेयी का मर्म।।
माना कुछ परिणाम थे,
हुए कल्पनातीत।
तो उसके भी मूल में,
थी रघुकुल की रीत।।
कोई पथ बाकी न था,
ऐसे थे हालात।
कोई राजी नहीं था,
सुनने को सच बात।।
मौन रही तो इसलिए,
पथ सारे थे बन्द।
वरना क्या अपराध था,
माँग लिया अनुबंध।।
प्रायश्चित किस बात का,
और ग्लानि किस हेतु।
मेरे मुँह पर मढ़ गई,
अकथ म्लानि किस हेतु।।
कहे बिना रुकना नहीं,
अकथनीय जो तथ्य।
नारी मन को खोलते,
कुछ अनबूझे कथ्य।।
लगे बड़ा आघात जो,
कह दूँ मन की बात।
छिन्न - भिन्न होने लगें,
जो स्थापित जज्बात।।
फिर भी कह कर ही रुके,
कैकेयी इस बार।
अकथनीय जो सह लिया,
कहा नहीं मन मार।।
अभी-अभी युवती हुई,
हुईं उमंग जवान।
भूप पधारे देश में,
तन मन तीर कमान।।
राजा कब सोचे कहीं,
कैसी उसकी चाह।
फिर स्त्री जैसी वस्तु की,
कौन करे परवाह।।
किसने पूँछा कैकयी,
क्या तेरा मन्तव्य।
गिरा शक्ति के कुण्ड में,
अनचाहे ही हव्य।।
राजा अवस्थी, कटनी
18/01/2018
9617913287
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