कैकेयी अब बोलती
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डूब गए इस बोध की,
अकथ ग्लानि में भूप।
पल - पल पीड़ा से भरा,
आगत अंधा कूप।।
पीड़ा चिन्ता ग्लानिवश,
खुलें न दोनों नैन,
राम राम बस राम ही,
रही उचारे बैन।।
राजतिलक की घोषणा,
और दिया वनवास।
विवश भूप के हृदय में,
बढ़ा विकट संत्रास।।
कथा श्रवण की शाप की,
हत्या की साकार।
अपराधों का बोध फिर,
प्रकटा ले आकार।।
बातें सारी वे हुईं,
जो दें मन को मार।
फिर कौसल्या का मिला,
लगातार धिक्कार।।
कौसल्या के सामने,
करबाँधे भूपाल।
रिरियाते करुणा भरे,
ले दो नैना लाल।।
द्रवित हुईं देवी बड़ी,
किन्तु हो गई देर।
उबर न पाए भूप फिर,
लिया मृत्यु ने घेर ।।
अर्ध रात्रि राजा गए,
गईं शोक में डूब।
हुईं नींदवश रानियाँ,
थकन भरी थी खूब।।
राजा अवस्थी, कटनी
08/01/2018
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