Monday, 15 January 2018

कैकेयी अब बोलती - 23


कैकेयी अब बोलती
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भरद्वाज ऋषि श्रेष्ठ थे,
पहले ऐसे व्यक्ति।
जो बोले कैकयी से,
करो न भरत विरक्ति।।

वन के दिन पूरे बिता,
जब लौटेंगे राम।
तिहुँपुर छाएगी विमल,
राम कीर्ति अभिराम।।

मन में क्लेश न तुम धरो,
दोष न कैकयि केर।
बरसों से बुनता रहा,
काल जाल नित फेर।।

मैं निराश हतभागिनी,
किंकर्तव्यविमूढ़।
अनबूझा सब हो गया,
बुद्धिमती अब मूढ़।।

अब अनुगामिनि पुत्र की,
बनी न किया विचार।
जर्जर छिद्रित नाव है,
टूट गईं पतवार।।

सब डूबे उल्लास में,
राम मिलन की आस।
कैकेयी नतसिर लिए,
हारी थकी हतास।।

राजा अवस्थी, कटनी
14/01/2018
09617913287

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