Saturday, 31 March 2018

समीक्षा - स्त्री संघर्ष की कथा 'किंबहुना'


         ' किंबहुना' स्त्री संघर्ष की कथा
          - - - - - - - - - - - - - - - - - - - 
                                       राजा अवस्थी
                     ए. असफल अपनी कहानियों और उपन्यासों के कथानक अपने समय और समाज से उठाने वाले लेखकों में गिने जाते हैं।उनका नवीनतम उपन्यास 'किंबहुना' अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष का उद्घोष करती, संघर्ष करती स्त्री की कथा है। बहुत जाने-माने चेहरों और स्थानों के बीच विकसित हुई इस कथा में यह बेहद शातिराना यानी कार्पोरेटिया किस्म का उद्घोष है। इसमें कहीं आपको तीखा आक्रोश या उबलते विद्रोह जैसी बात नहीं दिखेगी, बल्कि 'किंबहुना' की नायिका आरती कुलश्रेष्ठ आपको कहीं दमित, शोषित या बेचारी - सी भी लग सकती है। किन्तु, थोड़ा ठहरकर देखते हैं, तो पाते हैं कि आरती आरम्भ से ही बहुत ठण्डेपन से किन्तु लगातार विद्रोह करती हुई और अपने ही चाहे पथ पर बढ़ने वाली स्त्री है। उसका यही तेवर और शैली अन्त तक बनी रहती है। जिन दिनों वह आलम से प्रेम विवाह करती है, तब भी उनके बीच प्रेम जैसी या देह के सुख जैसी भी कोई चीज दिखती नहीं। विवाह के बाद भी कभी प्रेम के उन्माद में वे टूटकर मिले हों, "ऐसा कोई संकेत तक उपन्यास में नहीं है, बल्कि आरती के लिए वह एक कैद से अधिक कुछ नहीं था।
                   कथा जब आगे बढ़ती है, तो अपने स्वाभाविक विकासक्रम में आरती और आलम के तलाक प्रकरण पर आती है। इस बीच आरती की नौकरी पर संकट और भरत मेश्राम से मुलाकात के बाद उन दोनों का लिव इन जैसे रिश्ते की तरह साथ आना घटित होता है, किन्तु भरत का अपनी ब्याहता पत्नी से तलाक का केस खारिज़ हो जाता है और भरत के साथ आगे सम्मानजनक संभावनायें न देखकर आरती भरत से अपनी सगाई एक झटके में तोड़ देती है। भरत का धनाड्य और प्रभावशाली परिवार से होना आरती को सुरक्षा देने में सक्षम है, किन्तु स्वतंत्रता की जो चेतना आरती के भीतर पहले से ही है, उसको बचाने के लिए वह मेश्राम परिवार से भिड़ जाती है। भरत की माँ, बहन, खुद भरत के द्वारा भी यह याद दिलाने के बावज़ूद कि'अब तक तो कितने करम-कुकरम किए! और पति-पत्नी की तरह रहे। फिर, अब क्या हो गया? "वह भरत से फिर देह का कोई रिश्ता नहीं बनाती। संघर्ष के इस मोड़ पर आरती की जिन्दगी में कार्पोरेट जगत के शातिर शीतल का प्रवेश होता है। शीतल के बल पर ही वह भरत मेश्राम जैसे मगरमच्छ से भी निपट लेती है।
                    इस पूरे प्रकरण के लिए उपन्यासकार अपनी कथा का ताना-बाना बुनने के लिए जिस सूत्र का इस्तेमाल करता है, वह बिलकुल नया और आधुनिक है। पिछले कुछ सालों यानी 2-4 सालों में सोशल मीडिया
और उस पर वाट्सएप शहरी मध्यमवर्ग के बीच छाया हुआ है। यहाँ बहुत सारे सम्बन्ध - सम्पर्क वाट्सएप पर ही बन-बिगड़ और निभ रहे हैं। 'किंबहुना' का उल्लेखनीय तथ्य व तत्व यह भी है कि लेखक ने सोशल साइट्स के द्वारा कथा सूत्रों का विकास इस तरह से किया है कि ऐसा लगता है जैसे यह इस तरह के अलावा किसी और तरह से हो ही नहीं सकता था।
                   'किंबहुना' की कथा को तीन भागों में बाँटकर देखा जा सकता है। इसका पहला भाग एस टी डी बूथ पर पनपता है, जबकि दूसरा और तीसरा भाग पूरी तरह वाट्सएप के माध्यम से आगे बढ़ते हैं। दूसरे भाग में भरत मेश्राम से वाट्सएप पर बातचीत और आरती की समस्या के समाधान के साथ ही होटल में भरत के लिए आरती का देह - समर्पण! तीसरे भाग में वाट्सएप पर शीतल के साथ कविताओं का, बातचीत का और प्रेमालाप का लम्बा सिलसिला है। आरती के भरत से अलग होने के प्रकरण में दूर बैठे शीतल के द्वारा निर्णायक भूमिका निभाना उसे आरती के बहुत निकट ले आता है। अब तक उनकी आमने-सामने की मुलाकात नहीं हुई। तभी आरती को एक साहित्यिक सम्मान के लिए जयपुर जाना होता है, उधर से शीतल भी पहुँच जाता है। यात्रा के अंतिम दिन आरती शीतल को भी स्वयं को सौंप देती है और यह सोचती है कि बहुत एहसान हैं शीतल के मुझ पर, इस तरह मैं भी कुछ हल्की हो जाऊँगी। यानी इस एहसान के बदले देह! और जैसे उसे पहले से ही मालुम भी है कि इन मेहरवानियों की परिणति यही होना है। भरत के सम्बन्ध में भी वह यही सोचती है कि मेरा साथ दिया तो पूरी कीमत भी वसूल ली।
                  'किंबहुना' वर्तमान समाज में निरन्तर बढ़ती जा रही स्वार्थ की प्रवृत्ति के साथ स्त्री और पुरुष के सम्बन्धों की पड़ताल करता उपन्यास है। आरती अपने आॅफिसियल संकट से निपटने में भरत से सहायता लेती है और भरत को एक स्त्री देह की जरूरत है, जो उसे आरती के रूप में मिल जाती है। भरत से मुक्ति के लिए शीतल आता है, उसे भी एक स्त्री देह की जरूरत है। यह उपन्यास यौनिक शुचिता की अवधारणा को तोड़ता हुआ आगे बढ़ता है। यहाँ ये यौन सम्बन्ध बहुत सहज रूप में घटित होते हैं। कहीं किसी के मन में कोई ग्लानि या अपराधबोध या विवशता जैसी बात मन में नहीं आती। दोनों ही उस आनन्दलीला में बराबर के सहभागी हैं। यही वह उल्लेखनीय तत्व है, जो आज के मनुष्य में स्थायी रूप से बढ़ता जा रहा है। 'किंबहुना' में इसे सहज रूप में प्रस्तुत कर लेखक  साहस का परिचय देता है।
                  'किंबहुना' सोशल मीडिया के माध्यम से पनपे साहित्यिक समूहों और वहाँ भी शीतल जैसे लोगों के द्वारा दुकानदारी शुरू कर देने व उसमें लोगों के फँसने का किस्सा है, तो माउण्टआबू में सनसेट प्वाइंट पर फोटोशूट के लिए आतुर आरती के चित्रण में कथाकार की चित्रात्मकशैली का जीवन्त नमूना भी है। यूँ 'किंबहुना' के रचनाकार ने अपने चरित्रों के नाक - नक्श का ब्यौरा हर संभव जगह पर इस तरह दिया है कि वह चरित्र स्पष्ट उभर कर साकार हो गया है। शीतल उपन्यास में एक ऐसे वर्ग का प्रतिनिधित्व करता है जिसे किसी
तरह का उत्तरदायित्व लेने से परहेज है। उसे स्त्री तो चाहिए, किन्तु पत्नी नहीं, जिसके प्रति किसी भी तरह की जवाबदारी उसे उठानी पड़े! वहीं आरती जैसी मुक्तिकामी, मुक्तिचेता स्त्री की वास्तविक स्थिति का चित्रण इस उपन्यास की उपलब्धि मानी जा सकती है। यह मुक्तिचेतना ही उसे कभी आलम के नर्क में ले जाती है, तो फिर भरत और शीतल जैसों की देह की भूख मिटाने का साधन भी बनाती है।
                      'किंबहुना' यानी 'वास्तव में' आधुनिक समाज में स्त्री - पुरुष सम्बन्धों, स्वार्थों और जातीय सम्बन्धों के महत्व के साथ मुक्तिकामी स्त्री की चेतना व संघर्ष को रेखांकित करता हुआ उपन्यास है। पठनीयता के स्तर पर यह बेजोड़ है। एक बार पढ़ना शुरू करके आप इसे पढ़कर ही मानेंगे। 'किंबहुना' के चरित्र बहुत जाने-पहचाने लगते हैं। यह उपन्यास इसलिये भी महत्वपूर्ण कहा जाएगा कि इसका कथानक हमारे आज की कथा कहता है।
कृति - किंबहुना (उपन्यास)
लेखक - ए. असफल
प्रकाशन - ज्ञान गीता प्रकाशन
एक्स. नवीन शाहदरा, दिल्ली - 110032
कीमत - 295/-
                        राजा अवस्थी
                        गाटरघाट रोड, आजाद चौक
                        कटनी 483501 (म. प्र.)
मोबा. 9617913287
Email - raja.awasthi52@gmail.com

Friday, 16 March 2018

साकेत (द्वितीय सर्ग - 3)

21/02/2018
सादर सुप्रभात, वंदन, अभिनंदन, नमन

राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त कृत
          साकेत
द्वितीय सर्ग (3)
गतांक से आगे

कहा दासी ने धीरज त्याग -
"लगे इस मेरे मुँह में आग।
मुझे क्या? मैं होती हूँ कौन ?
नहीं रहती हूँ फिर क्यों मौन ?
देखकर किन्तु स्वामि-हित-घात,
निकल ही जाती है कुछ बात।
इधर भोली हैं जैसी आप,
समझती वैसी सबको आप।
नहीं तो यह सीधा षड़यंत्र,
रचा क्यों जाता यहाँ स्वतन्त्र,
महारानी कौसल्या आज,
सहज सज लेतीं क्या सब साज ? "
कहा रानी ने -" क्या षड़यंत्र ?
वचन हैं तेरे मायिक मन्त्र।
हुई जाती हूँ मैं उद्भ्रान्त,
खोलकर कह तू सब वृत्तांत।
मन्थरा ने फिर ठोका भाल -
"शेष है अब भी क्या कुछ हाल ?
सरलता भी ऐसी है व्यर्थ ?
समझ जो सके न आर्थानर्थ।
भरत को करके घर से त्याज्य,
राम को देते हैं नृप राज्य।
भरत - से सुत पर भी संदेह,
बुलाया तक न उन्हें जो गेह ! "

क्रमश :

प्रस्तुति - राजा अवस्थी



Wednesday, 14 March 2018

साकेत (द्वितीय सर्ग - 2)

20/02/2018
सादर सुप्रभात, वंदन, अभिनंदन, नमन

राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त कृत
                 साकेत

द्वितीय सर्ग
(गतांक से आगे)

"सोच है मुझको निस्संदेह,
भरत जो है मामा के गेह।
सफल करके निज निर्मल-दृष्टि,
देख वह सका न यह सुख - सृष्टि! "
ठोंककर अपना क्रूर- कपाल,
जताकर यही कि फूटा भाल,
किंकरी ने तब कहा तुरंत -
" हो गया भोलेपन का अन्त! "
न समझी कैकेयी यह बात,
कहा उसने -" यह क्या उत्पात?
वचन क्यों कहती है तू वाम?
नहीं क्या मेरा बेटा राम ? "
'और वे औरस भरत कुमार ;"
कुदासी बोली कर फटकार।
कहा रानी ने पाकर खेद -
"भला दोनों में क्या है भेद? "
" भेद? "-दासी ने कहा सतर्क -
" सबेरे दिखला देगा अर्क।
राजमाता जब होंगी एक,
दूसरी देखेंगी अभिषेक! "
रोककर कैकेयी ने रोष,
कहा -" देती है किसको दोष?
राम की माँ क्या कल या आज,
कहेगा मुझे न लोक - समाज? "

क्रमशः -

प्रस्तुति - राजा अवस्थी 

Saturday, 10 March 2018

साकेत (मैथिलीशरण गुप्त कृत)

19/02/2018
आदरणीय साथियो
सादर सुप्रभात, वंदन, अभिनंदन, नमन

आज आप सबकी सेवा में प्रस्तुत है राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त की अमर कृति साकेत के द्वितीय सर्ग से कुछ प्रारम्भिक पंक्तियाँ।

          साकेत (1)
        द्वितीय सर्ग

लेखनी, अब किस लिए विलम्ब?
बोल, - जय भारति, जय जगदम्ब
प्रकट जिसका यों हुआ प्रभात,
देख अब तू उस दिन की रात।

धरा पर धर्मादर्श - निकेत,
धन्य है स्वर्ग सदृश साकेत।
बढ़े क्यों आज न हर्षोद्रेक?
राम का कल होगा अभिषेक?
दशों दिग्पालों के गुण केन्द्र,
धन्य हैं दशरथ मही-महेन्द्र।
त्रिवेणी तुल्य रानियाँ तीन,
बहाती सुख-प्रवाह नवीन।
मोद का आज न ओर न छोर,
आम्र वन-सा फूला सब ओर।
किन्तु हा! फला न सुमन-क्षेत्र,
कीट बन गए मन्थरा- नेत्र।
देखकर कैकेयी यह हाल,
आप उससे बोली तत्काल-
"अरी, तू क्यों उदास है आज,
वत्स जब कल होगा युवराज? "
मन्थरा बोली निस्संकोच -
'आपको भी तो है कुछ सोच?"
हँसी रानी सुनकर यह बात,
उठी अनुपम आभा अवदात।

 क्रमशः -
प्रस्तुति -
राजा अवस्थी 

Friday, 19 January 2018

कैकेयी अब बोलती - 28


कैकेयी अब बोलती
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मन से निकले जो कहीं,
सचमुच मन की बात।
कितनों के मन पर पड़े,
एक वज्र आघात।।

कहे बिना माने नहीं,
कैकेयी भी बात।
ताला ले बैठी रहे,
सामंतों की जात।।

भूल नहीं पाया कभी,
मन वह चुभती देह।
प्रथम बार अभिसार जब,
हुआ भूप के गेह।।

अभी-अभी ही हुई थी,
युवा, युवा अरमान।
और अचानक मिट गया,
यौवन का सम्मान।।

वचनबद्ध जीती रही,
भूप रहे आसक्त।
समय गया मैं भी हुई,
उन पर फिर अनुरक्त।।

बनूँ राजमाता कभी,
चाह रही यह शेष।
जदपि राम पर भी रहा,
स्नेह असीम अशेष।।

राजा अवस्थी, कटनी
19/01/2018
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Thursday, 18 January 2018

कैकेयी अब बोलती - 27


कैकेयी अब बोलती
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प्रायश्चितरत ही रखा,
कैकेयी का जन्म।
चाहा किसने कब पढ़े,
कैकेयी का मर्म।।

माना कुछ परिणाम थे,
हुए कल्पनातीत।
तो उसके भी मूल में,
थी रघुकुल की रीत।।

कोई पथ बाकी न था,
ऐसे थे हालात।
कोई राजी नहीं था,
सुनने को सच बात।।

मौन रही तो इसलिए,
पथ सारे थे बन्द।
वरना क्या अपराध था,
माँग लिया अनुबंध।।

प्रायश्चित किस बात का,
और ग्लानि किस हेतु।
मेरे मुँह पर मढ़ गई,
अकथ म्लानि किस हेतु।।

कहे बिना रुकना नहीं,
अकथनीय जो तथ्य।
नारी मन को खोलते,
कुछ अनबूझे कथ्य।।

लगे बड़ा आघात जो,
कह दूँ मन की बात।
छिन्न - भिन्न होने लगें,
जो स्थापित जज्बात।।

फिर भी कह कर ही रुके,
कैकेयी इस बार।
अकथनीय जो सह लिया,
कहा नहीं मन मार।।

अभी-अभी युवती हुई,
हुईं उमंग जवान।
भूप पधारे देश में,
तन मन तीर कमान।।

राजा कब सोचे कहीं,
कैसी उसकी चाह।
फिर स्त्री जैसी वस्तु की,
कौन करे परवाह।।

किसने पूँछा कैकयी,
क्या तेरा मन्तव्य।
गिरा शक्ति के कुण्ड में,
अनचाहे ही हव्य।।

राजा अवस्थी, कटनी
18/01/2018
9617913287 

Tuesday, 16 January 2018

कैकेयी अब बोलती - 26


कैकेयी अब बोलती
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गुरु आचार्यों पुरजनों,
माताओं सँग सेन।
सबने देखा भरत के,
बरस रहे दो नैन।।

हार थके जब विवश हो,
कह पादुका निकाल।
हे ककुत्स्थकुलमणि करो,
इनको आज निहाल।।

इनको स्थापित कर करुँ,
काज राज के हेत।
जो था केवल राम का,
जिसे राम अभिप्रेत।।

राम तपस्वी - से यहाँ,
तो मैं नन्दीग्राम।
तापस बनकर ही रहूँ,
जब तक लौटें राम।।

धन्य - धन्य सबने कहा,
रहा राम का राज।
भरत दास बन सेवते,
राम राज के काज।।

भरत ग्लानि के भार से,
कुछ - कुछ हुए निवृत्त।
भोग न लें कण राज सुख,
पूर्ण सजग था चित्त।।

मैं कैकेयी पूर्णतः,
कर्म धर्म सब हार।
वह जीवन जीती रही,
जो जीना दुश्वार।।

वचन वधिक - से भूप के,
लेकर निकले प्राण।
और भरत ने कर दिए
प्राणहीन वरदान।।

राजा अवस्थी, कटनी
17/01/2018
9617913287



कैकेयी अब बोलती - 25


कैकेयी अब बोलती
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भरत - राम के बीच थी,
अनबूझी सी डोर।
पूर्ण चन्द्र सम राम थे,
भरत पिपासु चकोर।।

निपुण भरत यह जानते,
वचन न तोड़ें राम।
मर्यादा की मूर्ति वे,
मर्यादा के धाम।।

अंतिम क्षण तक कर लिया,
अनुनय विनय प्रयत्न।
राम न लौटे अवध तब,
रहे व्यर्थ सब यत्न।।

प्रश्न सभी के मन उठा,
सेना पुरजन संग।
गए मनाने इस तरह,
यह कैसा था ढंग।।

नीति निपुण थे चाहते,
सब देखें सब यत्न।
करें मनाने के लिए,
जितने भरत प्रयत्न।।

क्या वशिष्ठ क्या कौसिला,
क्या जाबालि महान।
सबने सिखलाया उन्हें,
अवध-वापसी-ज्ञान।

अवधि पूर्ण वन की करूँ,
तब लौटूँ इस ओर।
भूपाज्ञा अवहेलना,
का मत डालो जोर।।

धरने पर बैठे भरत,
रहे अन्न जल त्याग।
राम लौट आएँ अवध,
विनत चरम अनुराग।।

नीति रीतिमय ज्ञान के,
पुञ्ज प्रवीण प्रमाण।
राम न तिल भर भी डिगे,
रखा वचन का मान।।

पुरजन, माता और गुरु,
हार गए सब भाँति।
राम अडिग वन में रहे,
अवध रही आराति।।

राजा अवस्थी, कटनी
16/01/2018

Monday, 15 January 2018

कैकेयी अब बोलती - 23


कैकेयी अब बोलती
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भरद्वाज ऋषि श्रेष्ठ थे,
पहले ऐसे व्यक्ति।
जो बोले कैकयी से,
करो न भरत विरक्ति।।

वन के दिन पूरे बिता,
जब लौटेंगे राम।
तिहुँपुर छाएगी विमल,
राम कीर्ति अभिराम।।

मन में क्लेश न तुम धरो,
दोष न कैकयि केर।
बरसों से बुनता रहा,
काल जाल नित फेर।।

मैं निराश हतभागिनी,
किंकर्तव्यविमूढ़।
अनबूझा सब हो गया,
बुद्धिमती अब मूढ़।।

अब अनुगामिनि पुत्र की,
बनी न किया विचार।
जर्जर छिद्रित नाव है,
टूट गईं पतवार।।

सब डूबे उल्लास में,
राम मिलन की आस।
कैकेयी नतसिर लिए,
हारी थकी हतास।।

राजा अवस्थी, कटनी
14/01/2018
09617913287

कैकेयी अब बोलती - 24


कैकेयी अब बोलती
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हेर फेर अनगिन तरह,
भरत किए अनुरोध।
उल्टे समझाते रहे,
राम प्रबोध - प्रबोध।।

अवध शक्तिशाली नगर,
बलनिधि अवध कुमार।
बैठे सब त्यागे हुए,
अवध राज्य अधिकार।।

सबने ही कितना कहा,
लौट चलो अब राम।
रघुनंदन राजा बनो,
करो अवध सुखधाम।।

पिता गए जो सौंपकर,
पूरा कर वह काम।
तब ही लौटेंगे अवध,
दृढ़प्रतिज्ञ थे राम।।

भरत किसी भी तरह से,
नहीं चाहते राज।
राम न आना चाहते,
भूप वचन के काज।।

किया - धरा मेरा मिटा,
छोड़ गया बस आग।
भीतर - बाहर सब जला,
लहक रहे अब दाग।।

राजा अवस्थी, कटनी
15/01/2018
9617913287





Saturday, 13 January 2018

कैकेयी अब बोलती - 22


कैकेयी अब बोलती
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भरद्वाज से भरत ने,
करवाई पहचान।
मूढ़ कुलच्छिनि पापिनी,
कैकयि साँप समान।।

कोख जना बेटा कहे,
पापिनि दुष्ट कुलघ्न।
उस माँ का जीना कहो,
होगा कितना भग्न।।

मैं अभागिनी वस्तु सी,
रही सभी के हेत।
पिता संधि में सौंपते,
भूप वरे ज्यों खेत।।

राजमहल की रानियाँ,
रहीं डाह से त्रस्त।
शूलदृष्टियों ने किया,
सहने की अभ्यस्त।।

बरसों की मन की घृणा,
सबने रखी निकाल।
मौका था सबके लिए,
मुझ पर रहे उछाल।।

कण भर भी संवेदना,
न थी किसी के पास।
सबसे ज्यादा भरत ने,
करा दिया अहसास।।

जीवन भर जीती रही,
लेकर जो विश्वास।
वही कपट से भूप ने,
जला दिया ज्यों घास।।

उस क्षण हठ का नाग जो,
उठ बैठा फुँफकार।
ज्ञान, मान, अभिमान सब
दिया उसी ने मार।।

घृणा भरे विष सी दिखे,
पुत्र भरत की दृष्टि।
अवहेला अवमानना,
की है मुझ पर वृष्टि।।

सबने कुछ - कुछ खो दिया,
सबको इसका भान।
मैने तो सब खो दिया,
जीवन बचा मसान।।

राजा अवस्थी, कटनी
13/01/2018
मोबा. 9617913287




Thursday, 11 January 2018

कैकेयी अब बोलती - 21


कैकेयी अब बोलती
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मैं भी अब चाहूँ यही
वापस आएँ राम।
जितने होने थे हुए
तमगे मेरे नाम।।

प्रेम भरे सम्मान संग
विश्वासों की डोर।
ऐसी छूटीं भरत से
हाथ न आता छोर।।

प्रणत रही श्रीराम पर,
तन - मन सब कुछ हार।
वही भावना झेलती,
संदेहों की मार।।

निरपराध डूबे रहे
अपराधों के बोध।
करनी सबसे पड़ रही
बात प्रबोध प्रबोध।।

देखा सबने भरत को,
प्रथम डूब संदेह।
भरद्वाज गुह लखन तक,
का मन शक का गेह।।

निर्णय पल में राम ने
लिया रहें वन माँझ,
वहीं भरत ने अवध का,
त्यागा पल में राज।।

राम त्याग की मूर्ति हैं,
भरत रूप संदेह।
नियति रचे कितने प्रबल,
चक्रव्यूह से गेह।।

संदेहों के तीर से,
बिंधे भरत निरुपाय।
व्याकुल यह निर्मल हृदय,
करने चला उपाय।।

राजा अवस्थी, कटनी
12/01 /2018





कैकेयी अब बोलती - 20


कैकेयी अब बोलती
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रघुवंशी ही थे भरत,
वैसे ही संस्कार।
राजा बनने से किया,
पल में अस्वीकार।।

पिता अश्वपति को दिया,
वचन मुझे था याद।
अगर दिलाया याद तो,
किया बड़ा अपराध।।

आयोजन श्रीराम के,
राजतिलक की बात।
क्या यह छोटी बात थी,
मुझे न थी जो ज्ञात।।

सहज न था यह सभी कुछ,
रहा योजनाबद्ध।
मुझ तक आती हुईं सब,
खबरें थीं आबद्ध।।

एक रात्रि पहले मुझे,
हुआ सभी कुछ ज्ञात।
चुभा विषैले तीर - सा,
लगा हुआ कुछ घात।।

राजा रहते राम ही,
मैं भी करती हर्ष।
कैकेयी से भूप ने,
किया न एक विमर्श।।

प्यार और विश्वास की,
बरसों बरसी बात।
कैसे भूले भूप यह,
हुआ मुझे संताप।।

घरघुस्सू रानी न थी,
कैकय राजकुमारि।
राजकाज में दक्ष थी,
नीति निपुण मैं नारि।।

एक कपट के तीर ने
किया विषैली सोच।
सुख मर्यादा मान सब,
खाया पल में नोंच।।

नीति - रीति में निपुण थे,
भरत वीर सतधीर।
कौसल्या ने जड़ दिए,
उन पर विष के तीर।।

पल भर में ही भरत ने,
निर्णय लिया अकाट्य।
समझ रहे थे हो चुका,
राज अवध का त्याज्य।।

बहुत अमंगल घट चुका,
अब करना परिहार।
सारे निर्णय भरत ने,
लिए यहाँ सुविचार।।

यह निश्चित हो ही गया,
भरत न लेंगे राज।
कैकेयी के शीश ही,
गिरी निरन्तर गाज।।

राजा अवस्थी, कटनी
11/01/2018 

Tuesday, 9 January 2018

कैकेयी अब बोलती - 15


कैकेयी अब बोलती - 19


कैकेयी अब बोलती
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अवधपुरी लौटे भरत,
सुना सत्य सब हाल।
कैकेयी को भी दिखा,
भरत रूप विकराल।।

रघुवंशी ही थे भरत,
रीति - नीति की मूर्ति।
ठान लिया होने न दें,
नारी हठ की पूर्ति।।

कौसल्या ने भरत पर,
छोड़े विषमय तीर।
अपराधी से हो गए,
निरपराध सतधीर।।

अनगिन सपथ उठा - उठा,
अशुभ स्वयं के हेत।
रहा न मुझको ज्ञान यह,
न ही मुझे अभिप्रेत।।

यदि मेरे संज्ञान में,
हो पहले ही बात।
घोर पाप मुझको लगे,
मिले न मुझको प्रात।।

कैकेयी कुल घातिनी,
पापिनि, दुष्ट, निकृष्ट।
नाना के घर किस तरह,
जन्मी ऐसी भ्रष्ट।।

मैं लाऊँगा राम को,
वे ही लेंगे राज्य।
सपथ सहित उद्घोषणा,
राज्य भरत को त्याज्य।।

अब कौसल्या के हृदय,
उमड़ा लाड़ अपार।
हृदय लगा बरसा रहीं,
अँखियाँ अँसुआ धार।।

ज्येष्ठ पुत्र राजा रहे,
मुझे न था इंकार।
किन्तु अँधेरे में मुझे,
रखा गया इस बार।।

रहा भूप को भरत पर,
क्यों ऐसा संदेह।
मुझ तक खबर न आ सकी,
भरत नहीं थे गेह।।

अगर भरत होते यहाँ,
अघट न घटता एक।
अविश्वास था भूप को
रची कपट की रेख।।

पुत्र भरत के लिए मैं,
दुष्ट पापिनी नारि।
शर्म उन्हें आने लगी,
माता मुझे विचारि।।

कैकेयी अब रह गई,
केवल एक सवाल।
अपने ही घर का हुई,
जलता हुआ पुआल।।

राजा अवस्थी, कटनी
10/01/2018




Monday, 8 January 2018

कैकेयी अब बोलती


कैकेयी अब बोलती-18
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दिन निकला पर अवध पर,
रहा रात का फेर।
भूप न जागे रानियाँ,
रूदन करतीं घेर।।

निपट अकेली रह गई,
मैं अपराधिनि एक।
नियति ठठाकर हँस रही,
कैकेयी को देख।।

पहले भी किसके रहा,
आँखों में प्रिय भाव।
अप्रिय बनाकर ही रखा,
मेरा उग्र स्वभाव।।

चिन्तित ऋषि, मुनि, विप्र थे,
दान न हो बिन भूप।
राज्य किसी को सौंपिए,
बने किसी भी रूप।।

इतने दिन बीते हुआ,
सारा अर्थ अनर्थ,
होनी तो थी साधना,
जीवन भर की व्यर्थ।।

अब लेने को भरत को,
भेजे दूत वशिष्ठ।
वैसे हो ही चुका था,
मेरा घोर अनिष्ट।।

पूरा पखवाड़ा गया,
की न भरत की याद।
आ जाते तो भूप का,
कम होता अवसाद।।

राजा अवस्थी, कटनी
09/01/2018


कैकेयी अब बोलती - 17


कैकेयी अब बोलती
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डूब गए इस बोध की,
अकथ ग्लानि में भूप।
पल - पल पीड़ा से भरा,
आगत अंधा कूप।।

पीड़ा चिन्ता ग्लानिवश,
खुलें न दोनों नैन,
राम राम बस राम ही,
रही उचारे बैन।।

राजतिलक की घोषणा,
और दिया वनवास।
विवश भूप के हृदय में,
बढ़ा विकट संत्रास।।

कथा श्रवण की शाप की,
हत्या की साकार।
अपराधों का बोध फिर,
प्रकटा ले आकार।।

बातें सारी वे हुईं,
जो दें मन को मार।
फिर कौसल्या का मिला,
लगातार धिक्कार।।

कौसल्या के सामने,
करबाँधे भूपाल।
रिरियाते करुणा भरे,
ले दो नैना लाल।।

द्रवित हुईं देवी बड़ी,
किन्तु हो गई देर।
उबर न पाए भूप फिर,
लिया मृत्यु ने घेर ।।

अर्ध रात्रि राजा गए,
गईं शोक में डूब।
हुईं नींदवश रानियाँ,
थकन भरी थी खूब।।

राजा अवस्थी, कटनी
08/01/2018




कैकेयी अब बोलती - 16

कैकेयी अब बोलती
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रहते मेरे पास तो,
भूप न तजते प्राण।
मैं दिलवा कर मानती,
उन्हें दोष से त्राण।।

मैने किस विश्वास पर,
धरी कौन सी चोट।
मुझमें ही देखा गया,
क्यों पग - पग पर खोट।।

नहीं राम - आसक्ति में,
तजे भूप ने प्राण।
बोध घृणित अपराध का,
लेकर निकला जान।।

कौसल्या निज शोक में,
बरस रहीं घनघोर।
भूप सहें असहाय - से,
दिन दुपहर निशि भोर।।

राजा अवस्थी, कटनी
07/01/2018

Friday, 5 January 2018

कैकेयी अब बोलती - 15


कैकेयी अब बोलती
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व्यथा भूप की हो गई,
द्विगुणित सौ - सौ बार।
कौसल्या के महल में,
पहुँचे जब सरकार।।

बरसों से मन में फँसे,
धँसे उपेक्षा दंश।
अब वे ही झरने लगे,
क्षण - क्षण कण-कण अंश।।

कौसल्या ने धैर्य की,
की न एक भी बात।
सिर्फ दोष मढ़ती रहीं,
राजा पर दिन रात।।

प्रिय कैकेयी ने दिया,
एक तरफ व्याघात।
और दूसरे दोष की,
निश - दिन हो बरसात।।

धीरज के दो बोल भी,
 सका न कोई बोल।
नष्ट भ्रष्ट सब हो गया,
यही कहा मुँह खोल।।

श्रृंगवेर  से राम ने
वापस किया सुमन्त्र।
कुशल सिया संग लखन की,
रखे नीतिगत मन्त्र।।

अवधपुरी की दुर्दशा,
कहा सुमन्त्र बखान।
राम कुशल की बात तक,
भूल न आई बान।।

सब अपने ही कर्म का,
कुफल समझ भूपाल।
फिर से मूर्छा में गए,
जान अवध बेहाल।।

राजा अवस्थी, कटनी
06/01/2018


Thursday, 4 January 2018

कैकेयी अब बोलती - 14


कैकेयी अब बोलती
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कौसल्या लेकर गईं,
अपने सँग ही भूप।
और वहाँ दिखला दिया,
सौत - डाह का रूप।।

सहते रहे प्रताड़ना,
कैकेयी के नाम।
जैसे दशरथ के न हों,
कौसल्या के राम।।

सुन्न अवध, संताप वश,
जनमन शोक निमग्न।
कल की जग जगमग पुरी,
क्या अब होगी भग्न।।

मैं भी सोचूँ क्या कहीं,
हुआ बड़ा अपराध।
समय बनाने में लगा,
मुझको निष्ठुर व्याध।

नहीं कल्पना में रहा,
राजा का यह रूप।
कितना व्याकुल कर गई,
राम विरह की धूप।।

क्या सचमुच केवल विरह,
रहा भूप को दाह।
या स्थितियों के वचन के,
द्वैत न हुए निबाह।।

एक तरफ तैयारियाँ,
घोषित राजा राम।
एक तरफ पिछले वचन,
खुले हो गए आम।।

एक निभे तो दूसरा,
देकर जाए दाग।
संभवतः राजा जले,
इस दुविधा की आग।।

राजा अवस्थी, कटनी
05/01/2018


कैकेयी अब बोलती - 13


कैकेयी अब बोलती
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सत्ता का पथ निठुरतम,
षड़यंत्रों की कोख।
नींद, चैन, सुख, शांति सब,
एक चाह ले सोख।।

आशंकित पूरा अवध,
भूप भरत के नाम।
रहे भरत का नाम भर,
करे कैकयी काम।।

कैकेयी के राज में,
अवध न रहने योग।
अवध छोड़कर सब चलो,
यही विचारें लोग।

जितनी कुटिल उपाधियाँ,
गढ़ पाईं पुरनार।
कैकेयी के नाम पर,
सब पा गईं प्रचार।।

मैं कैकेयी ही कुटिल,
शेष अवध सतधाम।
जन मन क्या जाने कहाँ,
महल करें क्या काम।।

राजा अवस्थी, कटनी
04/01/2018

Tuesday, 2 January 2018

कैकेयी अब बोलती - 12


कैकेयी अब बोलती
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भरे रहे विश्वास  से,
राम भरत के हेत।
अवध सहज स्वीकार ले,
रही चेतना चेत।।

पुरवासिन्ह को राम ने,
दिया यही संदेश।
भरत अवध के लिए शुभ,
अवध भरत का देश।।

उनको राजा मानना,
करे न कोई क्लेश।
पालन करिहहिं पुत्र सम,
भरत बनें अवधेश।।

भरत अवध के भूप हों,
रहे भूप का मान।
प्रजा पुत्र से भी बड़ी,
उनको है यह ज्ञान।।

राम - भरत के मध्य जो,
रहा प्रेम विश्वास।
फाँस न कोई आ सकी,
घटी न कोई आस।।

राजा अवस्थी, कटनी
02/01/2018